मूवी रिव्यू: ‘मंत्रमुग्ध कर देने वाली दो वीरों की प्रेम कहानी है’ ‘ बाजीराव मस्तानी’

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रेटिंग****

मराठा इतिहास में छत्रपति साहू के शासन काल में बाजीराव वल्हाड़ साहू महाराज के पेशवा थे। बाजीराव ऐसा वीर माना गया है जिन्होंने मुगल साम्रराज्य से जम कर लोहा लिया था उसने करीब चालीस युद्ध लड़े और सभी में जीत हासिल की । बुंदेलखंड की राजकुमारी मस्तानी जो हिन्दुराजा और मुसलमान मां की औलाद थी के बीच हुये प्यार ने बाजीराव को अपनो का ही दुश्मन बना दिया था। इसलिये महज चालीस साल की उम्र में ही इस योद्धा की मौत हो गई थी । संजय लीला भंसाली ने बाजीराव और मस्तानी की वीरता और उनके प्रेम को फिल्म ‘ बाजीराव मस्तानी में कुछ इस तरह दिखाया है कि दर्शक दोनो की वीरता और प्रेम को देखते हुये मंत्रमुग्ध हो रह जाता है ।

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कहानी

बाजीराव, मस्तानी के राज्य को बचाने के लिये उसकी मदद करता है । और बाद में उसकी वीरता से प्रभावित हो उसे अपनी कटार भेंट करता है । लेकिन बुंदेलखंड में इस तरह किसी लड़की को कटार भेंट करना शादी मान ली जाती थी बाद में मस्तानी पूना आ जाती हैं लेकिन पूना आने के बाद मस्तानी को बाजीराव की मां से बहुत अपमान सहना पड़ता है । दरअसल पेशवा बाजीराव जैसे ब्राह्मण के साथ एक मुसलमान लड़की का प्रेम कैसे सहन किया जा सकता था लिहाजा बाजीराव की मां द्धारा मस्तानी को अपमानित करने के लिये पहले उसे वेश्याओं के बीच ठहरा दिया जाता है लेकिन जब बाजीराव को पता चलता है तो वह मस्तानी को अपनी पत्नि मानते हुये उसे उचित सम्मान दिलवाने की कोशिश करता है । यहां उसकी पहली पत्नि काशीबाई और बाजीराव का भाई, बड़ा बेटा तथा उसकी मां सभी एक जुट हो मस्तानी का तिरस्कार करते हैं । लेकिन कहते हैं न कि प्रेम की ना तो कोई जात होती हैं और न कोई धर्म । इसलिये बाजीराव मस्तानी अपने प्यार की खातिर सब कुछ न्यौछावर कर देते हैं यंहा तक अपने आपको भी।

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निर्देशन

आशुतोष गोवारीकर की जोधा अकबर के बाद बाजीराव मस्तानी भी एक जबरदस्त ऐतिहासिक फिल्म हैं जिसमें सजंय ने उस दौर का कल्चर,माहौल पहनावा, आचार विचार तथा सामाजिक और धार्मिकता सभी को छूने की कोशिश की है ।इसके अलावा उन्होंने उस दौर के किरदारों को कुछ इस तरह से गढ़ा है जैसे वे उन्हें निकट से जानते हों । बाजीराव और मस्तानी के अलग धर्मो का होने के बाद मस्तानी द्धारा किया प्रहसन दर्शक को सोचने पर मजबूर कर देता है इसलिये वह भी उस दौर में हुये दो अलग धर्मो के प्रेमियों के साथ हो लेता है । फिल्म की रिसर्च के बारे में बात की जाये तो सजंय और उनकी टीम ने इतनी उम्दा जानकारी फिल्म के माध्यम से प्रस्तुत की है कि उन पर काफी कुछ कहा और लिखा जा सकता है । उस काल के राजा महाराजा,महल और उनकी भव्यता तथा वाद विवाद और युद्ध के दृश्य मन मोहने वाले हैं । सबसे बड़ी बात इस बार भी सजंय द्धारा तैयार किया संगीत मानों कहानी बयान कर रहा है । फोटोग्राफी इतनी सजीव कि जैसे सामने की हर चीज साक्षात सामने खड़ी हो । संजय द्धारा लगाये गये कुछ शाॅट देखते हुये दर्शका का मुंहू खुला का खुला रह जाता है । यानि निर्देशन के साथ इस बार सजंय ने बतौर संगीतकार भी अपना परिचय क्या खूब करवाया है ।

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अभिनय

इस फिल्म के मुख्य पात्र और उनका सजीव अभिनय उन्हें अभिनय के शीर्ष पर ला बिठाता है । बाजीराव की भूमिका में रणवीर सिंह जैसे अपने नाम को सार्थक करते नजर आते हैं उनका युद्ध कौशल देखते बनता हैं युद्ध के मैदान में उनकी सुफुर्ती, घुड़सवारी, तलवारबाजी और आक्रामता देखने लायक है । यही नहीं भावात्मक दृश्यों को भी उन्होंने क्या खूब निभाया है । दीपिका पादुकोण फिल्म दर फिल्म जबरदस्त अदाकारा बनती नजर जा रही है । उन्होंने युद्ध कौशल के अलावा प्रेमिका की कसक को मार्मिक व प्रभावशाली ढंग से दर्शाया है। एक दृश्य में वह अपने आपको और अपने बच्चे को बचाने के लिये वह एक घायल बाघिन सी दिखाई देने लगती है । प्रियंका चोपड़ा की भूमिका काशी बाई के लिये बेशक ज्यादा विस्तार नहीं था बावजूद इसके उन्होंने उसे अहम् बनाये रखा । इनके अलावा महेश मांजरेकर, आदित्य पंचोली,मिलिंद सोमण तथा नितिन कायरेकर आदि कलाकारों का काम भी उल्लेखनीय रहा।

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संगीत

सजयं लीला भंसाली जितने बढि़या निर्देशक हैं उन्होंने इस फिल्म में साबित किया है कि वे उतने ही उम्दा संगीतकार भी है । पिंगा पिंगा, जय गणेश,तथा अब तोहे जाने न दूं जैसे क्लासिक्ल गीत उन्हीें की कंपोजिंग में बने हैं ।

क्यों देखें

अगर आपको पोराणिक तथा ऐतिहासिक फिल्में देखने का शौक है या नहीं भी है तो भी ऐसी फिल्म देखते हुयेे अपने पर एहसान करते हैं । क्योंकि इस तरह की फिल्में रोज रोज नहीं बना करती ।


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Mayapuri

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