मूवी रिव्यू: ‘शिक्षा के व्यवसायीकरण पर प्रशासन  के सामने प्रभावशाली ढंग से तीखे सवाल उठाती’ फिल्म ‘‘चाॅक एन डस्टर’’

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रेटिंग****
सो करोड़ी फिल्मों के जमाने में कभी कभार ऐसी फिल्म भी आ जाती हैं जो दर्शक के अलावा समाज और सरकार तथा उसकी व्यवस्था पर ऐसे नोकीले सवाल छोड़ जाती है कि उसके अलावा समाज और उसमें रहते लोग तक सोचने पर मजबूर हो जाते  है । हमारी सामाजिक व्यवस्था में एक अहम् विभाग हैं शिक्षा, लेकिन आज सरकारी अधिकारियों और मंत्रीयों के बलबूते पर प्राइवेट शैक्षिनिक संस्थाओं ने शिक्षा को व्यापार बना दिया है लिहाजा आज आम आदमी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवाने में असमर्थ है क्योंकि वो इन अंग्रेजी स्कूलों की फीस तथा अन्य खर्चे उसके बुते से बाहर हैं ।निर्माता अमीन सुरानी द्धारा निर्मित जयंत गिलाटर द्धारा निर्देशित फिल्म ‘चाॅक एन डस्टर’में  शिक्षा को लेकर प्रभावशाली ढंग से यही सवाल उठाये गये हैं ।
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कहानी
कांता  हाई स्कूल एक ऐसा स्कूल हैं जंहा अच्छे घरों से लेकर आम घरों के बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हैं । वहां शबाना आज़मी, जूही चावला, उपासना सिंह आदि काफी मेहनती टीचर्स हैं । लेकिन वंहा दिव्या दत्ता एक बेहद घमंडी ऐसी सुपरवाइजर हैं जिसे सारी टीचर्स को सताने में बेहद मजा आता है । सारी टीचर्स पर अपना रौब डालने के लिये वो कभी कभी प्रिंसिपल जरीना वहाब के आदेशो को भी नजरअंदाज करने से नहीं चूकती । उस स्कूल के मालिक का लड़का आर्यन बब्बर जो विदेश से पढ़ाई करके आया ऐसा अति महत्वाकांक्षी शख्स है जो अपने स्कूल को -अपने स्कूल से महज एक किलोमीटर दूर जैकी श्राॅफ के स्कूल जो शहर ही नहीं स्टेट का नंबर वन स्कूल है- से आगे ले जाना चाहता हैं । उसकी इस कमजोरी को भांपते हुये दिव्या उसे अपने वश में कर पहले तो जरीना वहाब को नौकरी से निकाल उसकी जगह खुद प्रिंसिपल बन जाती हैं और इसके बाद उसका टारगेट वे सारे टीचर्स हैं जो उम्र दराज हो चुकी हैं । दिव्या उन्हें तरह तरह से तंग करना शुरू कर देती हैं जिससे वे खुद नौकरी छोड़कर चली जायें । एक बार वो शबाना आजमी से उलझ जाती है शबाना वहां पिछले अट्ठाईस साल से बच्चों को पढ़ा रही एक ऐसी टीचर हैं जिसे आज भी एक बेहतरीन टीचर माना जाता है।  लेकिन दिव्या उस पर अयोग्य टीचर का इल्जाम लगाते हुये उन्हें नौकरी से निकाल देती है । शबाना ये सदमा नहीं सह पाती लिहाजा उन्हें हार्ट अटैक पढ़ जाता है । इसके बाद सामने आती हैं सांइस टीचर जूही चावला। वो किस तरह दिव्या और स्कूल के मैनेजमेन्ट से मुकाबला कर न सिर्फ शबाना को उसका सम्मान वापस दिलवाती है बल्कि मैनेजमेंन्ट से एक क्वीट प्रोग्राम में शबाना के सहयोग से पांच करोड़ रूपये भी जीत लेती है ।
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निर्देशन
जयंत गिलाटर  ने इससे पहले गुजराती फिल्मों मे काफी काम किया है । ये उनकी पहली हिन्दी फिल्म है । जिसमें उन्होंने तकरीबन सभी बड़े और बेहतरीन आर्टिस्ट लिये और उनसे उनके स्तर से कहीं ज्यादा अच्छा काम करवाया । सबसे बड़ी बात की जयंत ने एक ऐसा विषय चुना जो हमारी शिक्षा प्रणाली  को लेकर तीखे सवालों द्धारा प्रशासन और समाज को सोचने पर मजबूर करता है । आज  बेहतर शिक्षा के नाम पर प्राईवेट अंग्रेजी स्कूलों ने जैसे शिक्षा को व्यापार ही बना दिया है । यहां बड़ी डोनेशन और ऊंची फीस के सदके आम आदमी तो इनमें अपने बच्चों को शिक्षा दिलवाने का सिर्फ सपना ही देख सकता है ।  आसान और बिना किसी तकनीक के इन सारे सवालों को कहानी में पिरोकर गिलाटर ने बहुत ही सशक्त तरीके से फिल्म के जरिये दिखाया है । सबसे बड़ी बात की जयंत, शबाना, जूही,जरीना,गिरीश कर्नाड जैसे कलाकारों से बेहतरीन अभिनय करवाने में पूरी तरह कामयाब रहे । लिहाजा ये फिल्म टेक्स माफी के अलावा हर स्कूल में दिखानी चाहिये ।
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अभिनय
एक अरसे बाद एक ही फिल्म में इतने सारे बेहतरीन आर्टिस्टों का जमावड़ा फिल्म की यूएसपी है। बहुत दिनों बाद शबाना आजमी, गिरीश कर्नाड,जरीना वहाब तथा जूही चावला का सर्वश्रेष्ठ अभिनय देखने के लिये मिला । नगेटिव रोल में दिव्या दत्ता ने कमाल का अभिनय किया है । इनके अलावा रिशी कपूर, जैकी श्राॅफ और रिचा चड्डा की भूमिकायें फिल्म को और सशक्त बनाती हैं । आयर्न बब्बर, अदि इरानी तथा समीर सोनी का सहयोग भी उल्लेखनीय रहा।  फिल्म के सभी कलाकारों  का सुंदर अभिनय फिल्म को और ऊंचाईयां प्रदान करता है।
संगीत
संदेश शांडिल्या तथा सोन निगम का संगीत कहानी में जैसे गुथा हुआ लगता है क्योंकि ढेर सारी बातें तो म्यूजिक बताता है । दूसरे शुरू से अंत तक कहीं भी वो कहानी के प्रवाह में रूकावट नहीं बनता ।
क्यों देखें
ये फिल्म महज मनोरंजन के लिये ही नहीं बल्कि हमारी बिगड़ती और बिखरती शिक्षा प्रणाली से भी पूरी तरह अवगत करवाती है । लिहाजा प्रशासन का फर्ज बनता है कि वो इस फिल्म का न सिर्फ टैक्स माफ करे बल्कि इसे हर स्कूल में दिखाने की भी व्यवस्था करे।

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Mayapuri

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