मूवी रिव्यू: विश्वसनीय, लेकिन दिलचस्प नहीं ‘चौरंगा’

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रेटिंग**

कहानी

झारखंड के एक ऐसे गांव का चित्रण है जो आज भी किसी तरह के विकास से महरूम है। वहां आज भी महादलित बड़ी जात वालों के पैर की जूती हैं। ऐसी महादलित दो बच्चों की मां धनिया तनिष्ठा चटर्जी महज इसलिये जमींदार संजय सूरी का बिस्तर बनती रहती है क्योंकि उसे अपने दोनों बच्चों को स्कूल भेजना है। बड़ा बेटा बजरंगी स्कूल जाता है लेकिन छोटे बेटे संटू का किशोर दिल जमींदार की बेटी पर आया हुआ है लिहाजा वह उसे रोज ताकता रहता है। एक दिन वह उसे अपने बड़े भाई से लव लैटर लिखवाकर दे आता हैं वह लैटर जमींदार के हाथ लग जाता है। उसके बाद इस परिवार पर शुरू होता है जमींदार और उसके भाईयों द्वारा जुल्म ।

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निर्देशन

बेसिकली कहानी का आधार एक लव लैटर है। जिसे लेकर निर्देशक बिकास रंजन ने सच के करीब होती इस कहानी को चुना है। दरअसल कुछ अरसा पहले ऐसे ही एक कांड में एक जमींदार के लोगों ने गांव के महादलित किशोर को चलती ट्रेन के आगे फेंक कर मार डाला था। ये घटना निर्देशक के गांव से महज दो तीन किलोमीटर एक गांव में हुई थी। बाद में निर्देशक ने इस घटना को समाज के सामने लाने के लिये ही इस फिल्म का निर्देशन किया। लेकिन निर्देशक से एक चूक ये हुई कि उसने आज को देखते हुये फिल्म को दिलचस्प न बनाते हुये एक डाक्यूमेंट्री की तरह बना दिया है। लिहाजा फिल्म इतनी रीयल हो गई कि उससे दर्शक ने दूर रहना ही उचित समझा। इस बात के लिये बिकास रंजन की तारीफ की जानी चाहिये। 2014 के मामी फिल्मोत्सव में बेस्ट फिल्म के लिये चुनी गई।

churanga

अभिनय

फिल्म में मुख्य चार किरदार हैं जो चार रंग पेश करते हैं। शायद इसीलिये फिल्म का नाम चौरंगा है। धनिया के किरदार में तनिष्ठा चटर्जी ने स्वाभाविक अभिनय किया है, वो पूरी तरह से धनिया लगती है। उसके बच्चों की भूमिका में सोहम, पात्रा ने बढ़िया अभिनय किया है, लेकिन सजंय सूरी अपनी पर्सनेलिटी और भाषा को किरदार में नहीं ढ़ाल पाये। धृतिमान चटर्जी का अंधे शख्स का रोल कन्फ्यूजन भरा है लेकिन उन्होंने उसे सशक्त अभिव्यक्ति दी है।

संगीत और फिल्म

ऐसी फिल्मों में संगीत का प्रयोग सिर्फ बैक्रग्राउंड में ही किया जाता है। रही फिल्म की बात तो चौरंगा विश्वसनीय तो है लेकिन दिलचस्प नहीं।


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Mayapuri

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