मूवी रिव्यू: स्वादहीन ‘कॉफी विद डी’

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रेटिंग**

अंडरवर्ल्ड डॉन दाउद एक वॉटिंड डॉन है जिस पर न जाने कितने अपराध आयत हैं। उस पर अभी तक न जाने कितनी फिल्में बन चुकी हैं जिनमें उसका काफी गुणगाण किया जाता रहा है। इस बार फिर उसे लेकर लेखक निर्देशक विशाल मिश्रा ने फिल्म ‘कॉफी विद डी’ बनाई है। फिल्म में अलग ये है कि इस बार इंडिया एक मशहूर जर्नलिस्ट दाउद को न सिर्फ इन्टरव्यू देने के लिये मजबूर करता है बल्कि डी इन्टरव्यू के बाद अपनी पहचान तक मिटाने के लिये तैयार हो जाता है। फिल्म के सब्जेक्ट को लेकर सुना है फिल्म के लीड एक्टर सुनील ग्रोवर को धमकी भी मिल चुकी है।

सुनील ग्रोवर यानि अर्नब घोष एक चैनल में चीफ एडिटर है वो अपने चैनल पर नोताओं की बेइज्जती करने में महारत हासिल किये हुये है, लेकिन अब लगता है कि उसके इस करतब के बाद भी टीआरपी नहीं बढ़ पा रही है लिहाजा उस पर और चैनल के चीफ राजेश शर्मा पर चैनल की टीआरपी बढ़ाने का दबाव है। यहां अर्नब की क्राइम रिपोर्टर बीवी अजंना सुखानी उसे सुझाती है कि वो अपने चैनल पर ऐसा कुछ करे जिससे कराची में बैठा डी उसे इन्टरव्यू के लिये बुलाने पर मजबूर हो जाये तो ये इन्टरव्यू मीडिया और देश में हंगामा मचा देगा।। आगे ऐसा होता भी है। क्योंकि डी अर्नब द्धारा सोशल मीडिया पर दिखाये जा रहे स्टंट से खुंदक खाते हुये अपने राइट हैंड पंकज त्रिपाठी को आदेश देता है वो अर्नब को इन्टरव्यू के लिये आमंत्रित कर दे क्योंकि वो उसे इन्टरव्यू के दौरान लाइव मारकर  अपना खौफ बरकारार रखना चाहता है। कराची डी के घर जाने पर उसे इन्टरव्यू करते वक्त अर्नब पहले तो कुछ ऐसा नहीं कर पाता जिससे उसे इन्टरव्यू पर फक्र किया जा सके। लेकिन बाद में वो डी को उसी के घर में शब्दों से ऐसा नंगा करता है कि उसे हार्टअटैक हो जाता है। इस प्रकार जो काम आज तक देश विदेश की पुलिस नहीं कर सकी वो एक पत्रकार ने कर दिखाया। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हो पाया?Coffee with d

फिल्म के लेखक निर्देशक विशाल मिश्रा स्वंय फिल्म क्रिटिक्स रह चुके हैं। उन्होंने एक ऐसा सब्जेक्ट चुना जिस पर अभी तक कई फिल्में बन चुकी है। कहानी में इन्टरनेशनल कॅटेगिरी के डी को इतना कमजोर और बेबस दिखाया है जो एक पत्रकार के स्टंट के दबाव में आकर इन्टरव्यू देने के लिये तैयार हो जाता है बल्कि उसी के घर में पत्रकार उसे नंगा करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। ये सारी बातें अपने हाथों मियॉ मिटठू बनने जैसी दिखाई देती है। फिल्म की स्क्रिप्ट काफी लूज है लिहाजा शुरु से अंत तक वो कछुये की चाल से चलती रहती है और दर्शक उसके साथ मजबूरी वश घिसटता रहता है। सबसे बड़ी बात कि फिल्म न तो एन्टरटेन करती है और न ही विषय के प्रति विश्वास दिला पाती है। फिल्म का टाइटल सॉन्ग ठीक है बाकी एक दो गाने भी आते और चले जाते हैं। विशाल चूंकि खुद एक क्रिटिक रहे हैं लिहाजा उन्हें तो बाखूबी पता होना चाहिये कि एक मनोरंजक फिल्म में क्या कुछ होना चाहिये लेकिन किसी फिल्म की जिन कमियों को वे बतौर क्रिटिक बताते आये हैं उनकी फिल्म में वे सभी कमियां मौजूद हैं। -coffee-with-d

सुनील ग्रोवर एक बहुत ही काबिल एक्टर है वो पिछले कई सालों से कॉमेडी कर दर्शकों को हंसाते आ रहे हैं लेकिन दूसरी तरफ उनकी फिल्मों में उनके दूसरे किरदारों को देखते हुये पता चलता कि वे कितने सक्षम अभिनेता हैं। यहां वे वास्तव में मशहूर जर्नलिस्ट अर्नब के नाम का सहारा लिये हुये इसी नाम के जर्नलिस्ट का किरदार निभाते नजर आये लेकिन वे अंत तक अपने ही किरदार से लड़ते नजर आते हैं क्योंकि डायरेक्टर की तरफ से उन्हें जरा भी सहयोग नहीं मिल पाता। लिहाजा वे अपनी भूमिका के तहत जितना भी कर पाये वो अगर डायरेक्टर का डायरेक्शन था तो कहना होगा कि वे पूरी तरह से निराश करते हैं। क्राइम रिर्पोटर बीवी की भूमिका में अजंना सुखानी के लिये कुछ करने जैसा नहीं था। जाकिर हुसैन डी की भूमिका में खूब जंचे हैं और पकंज त्रिपाठी उनके राइटहैंड के तौर पर कुछ जगह हसांने की भरपूर कोशिश करते नजर आते हैं। चैनल चीफ की रूटिन भूमिका को राजेश शर्मा ने कुशलता से निभाया। अंत में मैं अपने मीडिया कर्मी साथी रहे विशाल मिश्रा से माफी मांगते हुये कहना चाहूंगा कि डी के साथ पी गई गई कॉफी पूरी तरह स्वादहीन रही।


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Mayapuri

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