मूवी रिव्यू: अश्लील और घटिया है ‘गुड्डू की गन’

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रेटिंग*

ग्रैंड मस्ती जैसी एडल्ट फिल्म के बाद कुछ मेकर्स को लगने लगा कि ऐसी फिल्में भी चल सकती हैं। इसीलिये लेखक निर्देशक शांतनू राय छिब्बर ने फिल्म ‘गुड्डू की गन’ जैसी वल्गर फिल्म बनाई और उसमें खुलकर घटिया संवादों और दृश्यों का प्रयोग किया।

कहानी

कोलकाता में एक बिहारी वाशिंग पाउडर बेचने वाला सेल्समैन कुणाल खेमू अपनी लच्छेदार बातों से घर घर पाउडर बेचते हुये शादी शुदा औरतों को पटाकर उनके साथ अय्याशी करता है। एक दिन एक लड़की को धोखा देने के जुर्म में उसका दादा अपने काले जादू से उसका प्राइवेट पार्ट सोने का बना देता है। इससे परेशान हो अपने दोस्त के कहने पर कुणाल उस लड़की या औरत को ढ़ूंढता है जिसके श्राप से ये सब हुआ। जब वो उस लड़की तक पहुंचता हैं उसका दादा इतना करता हैं कि वो उसे कहता हैं कि जिस दिन तुम्हें किसी लड़की से सच्चा प्यार हो जायेगा उस दिन से तुम नार्मल हो जाओगे।

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इस बीच उसके बारे में शहर का डॉन और एक अन्य बंदे को पता चलता है तो वे दोनों उसके पीछे पड़ जाते है। उसी दौरान उसे एक लड़की पायल सरकार मिलती है तो उसे देखते ही कुणाल नार्मल हो जाता है लेकिन लड़की थोड़ी बदसूरत है ऊपर से उसका बाप उससे शादी करने के लिये उससे दस लाख की डिमांड करता है तब कुणाल का दोस्त उसे समझाता है कि सूरत से सीरत ज्यादा अहम होती है इसलिये उसे उस लड़की की सीरत पर गौर करना चाहिये न कि सूरत पर। इसके बाद सब कुछ ठीक होता चला जाता है।

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निर्देशन और फिल्म

जंहा तक निर्देशन की बात की जाये तो एक घटिया और अश्लील कहानी पर उतनी ही घटिया फिल्म है। जिसमें सिर्फ एक ही चीज पर ध्यान दिया गया हैं कि किस तरह ज्यादा से ज्यादा अश्लीलता परोसी जाये। फिल्म देखते हुये दर्शक इस कदर खीजता रहता है कि उसका ध्यान और कहीं नहीं रहता सिवाये इसके कि कब फिल्म खत्म हो और वो सिनेमा हॉल से भाग निकले। कुणाल खेमू जैसा आर्टिस्ट अगर इस तरह की फिल्म करता हैं तो उसके लिये कहा जा सकता हैं कि वो हमदर्दी के काबिल है ।

 


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Mayapuri

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