मूवी रिव्यू: कोफ्त पैदा करती है ‘हरामखोर’

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रेटिंग*

कहा जाता है कि बुराई या बुरी चीज से खुद तो बचना चाहिये ही,दूसरों को भी इससे बचाना चाहिये। समानांतर सिनेमा के नाम पर  कभी कभी ऐसा कुछ देखने को मिल जाता है कि वो देखने के बाद समझ नहीं आता कि उसके बारे में क्या कहा जाये। श्लोक शर्मा द्धारा लिखित व निर्देेशित फिल्म ‘हरामखोर’ को देखकर तो ऐसा ही सोचा जा सकता है। फिल्म के विषय को देखते हुये सेंंसर ने  सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया था लिहाजा बाद में कोर्ट ने फिल्म को रिलीज करने की अनुमति दी।-haramkhoras

किसी गांव में एक अध्यापक नवाजुुद्दीन सिद्दीकी जिसका एक पंंद्रह साल की छात्रा से अफेयर हो जाता है। जबकि वो शादीशुदा जिम्मेदार शख्स है लेकिन अपनी अय्याश प्रवृति के तहत वो पुलिस ऑफिसर की नाबालिग लड़की श्वेता त्रिपाठी से अवैध संबन्ध बना लेता है। उस लड़की के पीछे गांव का ही एक नाबालिग लड़का भी लगा हुआ है जिसे गाइड करता है उससे भी छोटी उम्र का लड़का। एक दिन नवाजुु उन लड़कों को अपने घर से कुछ चुराते हुये पकड़ लेता है और आवेश में छोटे लड़के की हत्या कर बैठता है वो सब देख दूसरा लड़का भारी पत्थर से नवाजुु की हत्या कर देता है ।Haramkhor-

निर्देषक का कहना है कि वो इस तरह की घटना देख चुका है जिसमें एक ऐसे ही अध्यापक को उसकी करतूत के तहत गधे पर बैठाकर पूरे गांव में घुमाया गया था। ठीक है ऐसी घटना घटी होगी लेकिन उस पर फिल्म बनाकर निर्देशक क्या बताना चाहता है समझ से बाहर है। एक अध्यापक और एक नाबालिग लड़की के अवैध संबन्ध को निर्देशक ने पूरी बेशर्मी से दिखाया है। रही कलाकारों की बात तो एक भी आर्टिस्ट रजिस्टर्ड नहीं हो पाता है। नवाजुुद्दीन ने पता नहीं क्या सोच कर ये फिल्म की वो भी बिना किसी प्राइस के, क्योंकि न तो उसकी भूमिका में ऐसा कुछ है और न ही उसे कुछ करने का अवसर मिला है। श्वेता त्रिपाठी और नवाजुु के इंटीमेट सीन्स देख खीज पैदा होती है। फिल्म की बेहद धीमी रफ्तार, सुस्त स्क्रीनप्ले तथा इन्हीं से मैच करता संगीत। ये सब देखते हुये  बहुत जल्दी फिल्म से कोफ्त होने लगती है ।


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Mayapuri

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