मूवी रिव्यू: शिक्षा को लेकर दर्शकों को बहुत कुछ बताती है – ‘हिन्दी मीडियम’

1 min


रेटिंग****

आज हमारे  देश में शिक्षा एक धंधा बनकर रह गई है,क्योंकि हर कोई  अपनी जमीनी भाषा हिन्दी को पूरी तरह नजर अंदाज कर अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों से शिक्षा दिलवाना चाहता है क्योंकि उसे लगता है कि अंग्रेजी ही उनके बच्चों का भविष्य है,लेकिन फाइव स्टार स्तर के इन स्कूलों में  भारी डोनेशन या पहुंच पर भी एडमिशन मिलना एक टेडी खीर है। कई स्कूल तो ऐसे हैं जिनमें पहले पेरेन्ट्स की शिक्षा और उनके स्तर को देखते हुये उनके बच्चों को एडमिशन दिया जाता है या पहले परेन्ट्स का बाकायदा इन्टरव्यू लिया जाता है और स्टेट्स का तो ये हाल हैं कि अपने से कम स्तर के पेरेन्ट्स तथा उनके बच्चों के साथ तो कथित ऊंचे स्टेट्स वालों का बात तक करना पंसद नहीं किया जाता यानि आज ये स्कूल, लोगों की जात औकात की भी छानबीन करने  लगे हैं । इन सारी बातों से अवगत करवाती है निर्देशक साकेत चौधरी की फिल्म ‘हिन्दी मीडियम’। फिल्म दिल्ली शहर में  कुछ फाइव स्टार स्कूलों के जरिये बहुत ही सूक्ष्मता से अपनी बात कहती है ।

इरफान खान दिल्ली के चॉदनी चौंक में एक लेडीज पोशाकों का शोरूम चलाता है। उसके यहां बडे़ डिजाइनर्स की नकली पोशाकें मिलती है। इरफान हिन्दी बोलने वाला पक्का दिल्ली वासी बंदा है जबकि उसकी बीवी सबा करीम एक पढ़ी लिखी अंग्रेजी से प्यार करने वाली आधुनिक महिला है। वो चाहती है कि उसकी बेटी की शुरूआत किसी बड़े अंग्रेजी पब्लिक स्कूल से हो। लिहाजा पहले तो वो अपने दुकानदार पति को चॉदनी चौंक से निकाल नई दिल्ली शिफ्ट करती है। उसके बाद वे दोनां दिल्ली के हर बड़े स्कूल में कोशिश करते हैं लेकिन कहीं सफलता नहीं मिल पाती। तभी उन्हें पता चलता है कि एक बहुत बड़े स्कूल में गरीबों के लिये कोटा है लिहाजा इरफान पहले तो अपने आपको गरीब आदमी साबित करने के लिये फर्जी कागजात बनवाता है, लेकिन जब उसे पता चलता है कि जल्द ही स्कूल की तरफ से जितने भी गरीब लोगों ने अप्लाई किया है उनकी बारीकी से जांच होने वाली है। तो वो पत्नि बच्ची के साथ कागजों में लिखवाये गये एड्रेस एक आम कालोनी भारत नगर  के एक कमरे में  गरीब आदमी बनकर रहने आ जाता है। वहां उसकी  मुलाकात एक आम गरीब आदमी दीपक डोबरियाल से होती है । दीपक ने भी अपने बेटे के लिये उसी स्कूल में अप्लाई किया हुआ है। दीपक और उसकी बीवी से मिलने के बाद इरफान और उसकी बीवी को पता चलता है कि अगर मानवता और इन्सानियत बची है तो वो दीपक जैसे लोगों की बदौलत ही है। रिजल्ट लॉटरी द्धारा निकाला जाता है जिसमें इरफान की बेटी सलैक्ट हो जाती है जबकि दीपक का बेटा रह जाता है। बाद में इरफान और उसकी बीवी प्राशचित स्वरूप एक सरकारी स्कूल की अपने द्धारा दिये गये डोनेशन से काया पलट कर देते हैं, उसी स्कूल में दीपक का लड़का भी पढ़ता है। अपने बच्चे को अंग्रेजी बोलता देख दीपक स्कूल की काया पलट कर देने वाले शख्स को ढूढंते हुये इरफान के बंगले तक पहुंच जाता है और असलियत जानने के बाद उनकी कंपलेंड स्कूल में करना चाहता है, लेकिन इरफान की बच्ची को देख अपना इरादा बदल देता है।  बाद में इरफान, दीपक को न्याय दिलाने के लिये अपनी बच्ची को स्कूल से निकाल दीपक के बेटे को एडमिशन दिलाने लिये जब स्कूल जाता है तो स्कूल की प्रिंसिपल अमृता सिंह उसकी बेटी को जनरल क्लास में शिफ्ट कर देती है लेकिन दीपक के बेटे को एडमिशन नहीं देती। प्रिंसिपल की कलई खुल जाने के बाद इरफान सारे पेरेन्टस के सामने बताता है कि आज पढ़ाई के नाम पर ये बड़े स्कूल किस प्रकार धंधा कर रहे हैं। आज इनकी मुठ्ठी में राजनेता, पुलिस अफसर और बड़े अधिकारी तक आ चुके हैं। इसके बाद वो अपनी बेटी का एडमिशन सरकारी स्कूल में करवाता है ।

बेशक इससे पहले भी पाठशाला या चॉक एंड डस्टर जैसी फिल्मों में बिजनिस बनते जा रहे इन स्कूलों की पोल पट्टी बड़े प्रभावशाली ढंग खोली है लेकिन इस फिल्म में धंधा बनते जा रहे इन स्कूलों के जरिये बताया गया है कि किस प्रकार ये हमारी राष्ट्रभाषा को निचले स्तर की भाषा बनाकर उसके ऊपर सफलता पूर्वक अंग्रेजी को बिठाते हुये  साबित करने पर तुले हैं कि उनके बच्चों का भविष्य हिन्दी नहीं बल्कि अंग्रेजी है। अंग्रेजी नहीं तो कल उनके बच्चों का कोई भविष्य नहीं। उनके इस काम में हमारे प्रभावशाली लोग ही मदद कर रहे हैं । निर्देशक ने बहुत प्रभावशाली ढंग से हिन्दी की पैरवी करते हुये दर्शकों और सरकार को जागरूक करने की कोशिश की है तथा अंग्रेजी के सम्मोहन से लोगों को बाहर निकलने का संदेश दिया है । इस काम में सचिन जिगर का संगीत,पटकथा और संवाद भी सहयोगी साबित हुये हैं। फिल्म शुरू से अंत तक दर्शक को बांधे रहती है लिहाजा दर्शक बाहर निलने के बाद पूरी फिल्म दिमाग में लेकर घर जाता है । बेशक फिल्म ने अपने स्तर पर अपना काम कर दिया है, लेकिन अब वक्त आ गया है कि सरकार को इस तरफ गंभीरता से ध्यान देना होगा उसे ऐसे कुछ काम करने होगें जिससे हिन्दी की तरफ लोगों का विश्वास कायम होना शुरू हो, उन्हें अंग्रेजी स्कूलों की तरह अच्छे और प्रभावशाली हिन्दी मीडियम स्कूलों की स्थापना करनी होगी ।

इरफान इतने विलक्षण अभिनेता हैं कि वे जो भी रोल करते हैं उसमें पूरी तरह घुस कर अपनी बात कहते हैं । यहां भी उन्होंने अपने अभिनय से भूमिका को यादगार बना दिया है तथा उनकी आधुनिक बीवी की भूमिका में सबा करीब ने उनका भरपूर साथ देते हुये अच्छे अभिनय का सुबूत पेश किया। दीपक डोबरियाल की बात की जाये तो  वो इतना बड़ा और सक्षम अभिनेता है जो हर भूमिका में शक्कर की तरह घुल जाने का हुनर जानता है । फिल्म में वो एक मानवता से भरे,भले आम आदमी के रोल में दर्शक को हिलाकर रख देता है। संजय सूरी, अमृता सिंह तथा नेहा धूपिया आदि कलाकरों का सहयोग भी अच्छा रहा ।

हर आम और खास दर्शक की पंसद पर खरी साबित होने वाली तथा हमारी शिक्षा प्रणाली का अंग्रेजीकरण दर्शाती इस फिल्म को हर राज्य में  टैक्स फ्री कर देना चाहिये ।


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये