मूवी रिव्यू: अधकचरी कॉमेडी ‘लाली की शादी में लड्डू दीवाना’

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रेटिंग*

आज जबकि रीयल और बेहतरीन फिल्मों का दौर चल रहा है बावजूद इसके जब मनीष हरिशंकर जैसे निर्देशक कॉमेडी के नाम पर ‘लाली की शादी में लड्डू दीवाना’ जैसी अधकचरी फिल्म बनाते हैं वो भी बेहतरीन एक्टरों के साथ, तो उन पर और उनकी सोच पर तरस आता है ।laali-ki-shaadi-mein-laaddoo-deewana

लाली यानि अक्षरा हासन और लड्डू यानि विवान शाह एक दूसरे को प्यार करते हैं लेकिन लड्डू अपनी महत्वाकांक्षाओं को भी पूरा करना चाहता है । दरअसल  अपने बॉस रविकिशन की हेल्प से अच्छावो कमाने लगता हैलिहाजा उसे सफलता का रास्ता मिल जाता है । उसकी सगाई लाली से हो लाती है  लेकिन जब लाली शादी से पहले ही प्रेग्नेंट हो जाती है तो लडडू अपने आगे बढ़ते कॅरियर को देखते हुये उससे शादी करने से इंकार कर देता है।  यहां उसके पिता  दर्शन जरीवाला लाली को अपनी बेटी मानते हुये लडडू को  अपनी जिन्दगी से निकाल देते हैं और उसकी शादी कहीं और करने का प्लान बनाने लगते हैं । उसी दौरान लाली की जिन्दगी में गुरमीत चौधरी का आगमन होता है जो प्रेग्नेंट लाली से विवाह करने को राजी है शायद इसीलिये वह लाली का हर तरह से ख्याल रखता है । दूसरी तरफ लाली के शराबी पिता सौरभ शुक्ला लडडू को गोद ले लेते हैं । यहां अपने किये पर लडडू प्रायश्चित करना चाहता हैं लिहाजा एक ड्रामे के तहत संजय मिश्रा लडडू का साथ दे उसे अपने मिशन में कामयाब बनाते हैं ।laali-ki-shaadi-mein-laddoo-deewana-

मनीष हीरशंकर राज संतोषी और डेविड धवन जैसे डायरेक्टरों के साथ काम कर चुके हैं लेकिन उनके द्धारा बनाई गई ऐसी लचर कॉमेडी फिल्म देखकर आश्चर्य होता है । फिल्म की कथा पटकथा और संवाद सभी कुछ कमजोर है जिनकी एक हद तक अच्छे बन पड़े गाने भी कोई मदद नहीं कर पाते । फिल्म में कलाकाराें की भीड़ है जिनमें कुछ नामवर कलाकार फिल्म को बचाने की असफल कोशिश करते हैं ।laali-ki-shaadi-mein-laaddoo-deewana-

अक्षरा हासन की ये दूसरी फिल्म है । लेकिन फिल्म में वो जितनी सुंदर लगी है उतनी ही उसने खराब एक्टिंग की है, खराब एक्टिंग करने में उसका साथ विवान शाह ने भी बराबर दिया है । सौरभ शुक्ला ने भी जता दिया कि वे इतना खराब अभिनय भी कर सकते हैं । यही हाल दर्शन जरीवाला का भी रहा । छोटी भूमिकाओं में रवि किशन और गुरमीत चौधरी साधारण रहे,वहीं सजंय मिश्रा मनोरजंन के कुछ क्षण जुटाने में कामयाब रहे हैं ।

कहने का तात्पर्य है कि फिल्म दर्शक को दीवाना बनाने की जगह खिजाने का काम ज्यादा करती है ।


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Mayapuri

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