मूवी रिव्यू: हॉलीवुड फिल्म, इंडियन इमोशन – लॉयन

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रेटिंग ****

अक्सर सच्ची घटनाओं पर फिल्में बनती रही हैं और ऐसी फिल्मों के हम आदि भी हो चुके हैं, लेकिन हॉलीवुड की फिल्मों के लिये ये सब नया है। हॉलीवुड डायरेक्टर गर्थ डेविस की फिल्म ‘लॉयन’ एम पी में घटी एक सच्ची घटना पर बनाई गई ऐसी इमोशनल फिल्म है जिसे इस बार ऑस्कर में छह कॅटेगिरीज में नॉमिनेट हुई है ।

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एमपी में एक मुस्लिम मजदूर महिला के तीन बच्चे जिनमें दो लड़के एक लड़की। छह साल के सरू और बड़े बेटे गुडडू के बीच बहुत प्यार है। एक बार गुडडू सरू के साथ एक रेल्वे स्टेशन पर किसी काम से जाता है, वहां सरू सोते हुये रेल गाड़ी से कोलकाता पहुंच जाता है। वहां वो कई गलत लोगों से बचता बचाता सरोज सूद यानि दीप्ति नवल नामक ऐसी महिला से टकराता है जो फाउंडर ऑफ द इंडियन सोसाईटी फॉर स्पांसरशिप एंड अडोप्शन (ISSA) से जुड़ी है। वो पहले तो सरू के परिवार को ढूंढती है लेकिन उनके न मिलने पर वो सरू को आस्टेªलिया के दंपती को गोद दे देती है। सरू के नये मां बाप निकोल किडमैन तथा डेविड वेनहेम बहुत ही अच्छे पेरेन्टस साबित हुये क्योंकि उन्होंने सरू के अलावा एक और गोद लिये दिमागी तौर पर डिस्टर्ब इंडियन बच्चे को बहुत ही बढ़िया ढंग से पाला पोसा।

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सरू यानि देव पटेल बड़ा होकर भी अपने परिवार में खासकर अपनी मां को नहीं भूला। वो आज भी अपनी गर्लफ्रेंड रूनी मरा यानि लूसी सरू के परिवार को तलाश करने में उसकी हर तरह से मदद करती है। एक दिन सरू सटेलाइट नेट के द्वारा अपनी मां को तलाश करने में सफल हो जाता है, वो एमपी के शहर खंडवा की मलीन बस्ती में सरू अपनी मां को ढूंढ निकालता है। मां से मिलने के बाद उसे पता चलता है कि उसका बड़ा भाई गुडडू अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन वो अपनी बहन शकीला से मिलता है। इस प्रकार एक छह साल का बच्चा पच्चीस साल बाद एनआरआई बन अपने परिवार से मिल पाता है।

फिल्म की सबसे बड़ी खासियत है कि वो पूरी तरह से रीयलस्टिक है। फिल्म एमपी के मलीन बस्ती के मुस्लिम परिवार से शुरू होती है जंहा तीन बच्चे अपनी मजदूर मां के साथ रहते हैं । बाद में किस तरह छोटा बेटा सरू भटक कर कोलकाता आ जाता है और वहां कितने ही गलत लोगों के हाथों से बचता बचाता आस्ट्रेलिया के दंपती तक पहुंच जाता है। इस सफर का सजीव चित्रण फिल्म को विश्वसनीय बनाता है। फिल्म में एक और फिल्म स्लमडॉग की तरह बेहतरीन और विश्वसनीय लगने वाली कास्टिंग की गई है। कोलकाता और ऑस्ट्रेलिया की लोकेशन कहानी को और विश्वसनीस बनाती है तथा देशी विदेशी कलाकारों का अभिनय फिल्म का उच्चता प्रदान करता है ।

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छह साल के सरू के रोल में सनी पवार से बहुत ही मासूम अभिनय करवाया गया है। वहीं स्लम डॉग के बाद देव पटेल को देखकर सुखद अनुभूति होती है उसने सरू की भूमिका में अविस्मरणीय अभिनय किया है। अपनी असली मां से मिलने के सीन में वो दर्शकों को रूला देता है। विदेशी कलाकारों में उसके मांबाप के रोल में निकोल किडमेन तथा डेविड वेनेहम ने दृवित कर देने वाला अभिनय किया है वहीं देव की गर्लफ्रेंड के रोल में रूनी ने भी बढ़िया अभिव्यक्ति दी है। मेहमान भूमिकाओं में तनीश्ठा चटर्जी,नवाजूद्दीन सिद्दिकी तथा दीप्ती नवल सुखद अनुभूति दे जाते हैं।

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किसी हॉलीवुड डायरेक्टर ने पहली बार सच्ची इंडियन कहानी पर ऐसी फिल्म बनाई जिसे ऑस्कर में छह कैटेगिरी के लिये नॉमिनेशन मिला है ।

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Mayapuri