मूवी रिव्यू: दो युगो की असफल प्रेम कथा ‘मिर्ज्या’

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रेटिंग**

दिल्ली 6, भाग मिल्खा भाग और रंग दे बंसती जैसी उम्दा फिल्में देने वाले निर्देशक राकेश ओम प्रकाश मेहरा की हालिया फिल्म ‘मिर्ज्या’  दो युगों के प्रेम की दास्तान है। जिसमें प्यार की घटना एक जैसी घटती हैं। फिल्म बताती है प्यार के मामले में आज भी हमारा समाज जरा भी नहीं बदला।

कहानी

फिल्म में दो कहानीयां एक साथ चलती हैं। पुराने युग में मिर्जा और साहिबां एक दूसरे को प्यार करते हैं। मिर्जा एक जबरदस्त तीरअंदाज है लेकिन साहिबां के भाई मिर्जा को पसंद नहीं करते और साहिबा की शादी कहीं और तय कर देते हैं। यहां मिर्जा शादी के दिन साहिबां को लेकर भाग जाता है। साहिबां को पता है कि अगर उसके भाई मिर्जा के सामने आ गये तो वो उन्हें अपने तीरों से बांधकर रख देगा लिहाजा वो उसके तीरों को तोड़ देती है। इसका फायदा उठाते हुये साहिबां के भाई मिर्जा को खत्म करने में सफल हो जाते हैं लेकिन साहिबां मिर्जा के साथ ही जान दे दती है। यही कहानी आज के पात्रों को लेकर राजस्थान में एक बार फिर दौहराई जाती है। जब मनीष और सुचित्रा एक स्कूल में पढ़ते हैं। दोनो एक दूसरे को इस कदर पसंद करते हैं कि जब एक बार टीचर सुचित्रा को पनिश करता है तो मनीष सुचित्रा के कमिश्नर पिता की बंदूक चुरा कर टीचर को गोली मार देता है और फिर बच्चों की जेल से भाग जाता है। उधर सुचित्रा भी लंदन पढ़ने के लिये चली जाती है। जवान हो मनीष अब एक राजा के अस्तबल में घोड़ों की देखभाल करता है। राजा के बेटे युवराज से सुचित्रा की शादी तय है। लेकिन जब सुचि को पता चलता हैं कि उसे घुड़सवारी सिखाने वाला लड़का ही उसके बचपन का साथ मनीष है तो वो उसे पाने के लिये सब कुछ छोड़ शादी के दिन उसके साथ भाग जाती है और एक बार फिर इतिहास दौहराया जाता है क्योंकि इस बार भी दो प्रेमी समाज की परपरांओं की बली चढ़ जाते हैं।mirzya-feature

निर्देशन

इसमें कोई शक नहीं कि राकेश मेहरा एक उम्दा फिल्मकार है। वे ऐसा ही सफल प्रयोग अपनी फिल्म रंग दे बंसती में कर चुके हैं लेकिन इस बार वे दोनों कहानीयों को एकाकार नहीं कर पाये। दूसरे ऐसा महसूस होता है कि जैसे कुछ छूट गया हो लिहाजा दर्शक फिल्म से जुड़ नहीं पाता। गुलजार की काव्यमयी कथा और संवाद तो उन्हीं के स्तर के हैं बावजूद इसके निर्देशक और गुलजार दोनां कहानीयों में तालमेल बिठाने में असफल साबित रहे। फिल्म के दृश्य मनमोहक और नयनाभिराम हैं जो आंखों को भले लगते हैं। बेशक निर्देशक ने फिल्म पर बहुत काम किया है लेकिन फिल्म दर्शक को बांध नहीं पाती। फिल्म की शुरूआत लोहारों की गली से होती है जंहा प्रेम की संगीतमय दास्तान गूंजती रहती हैं ।ऐसा लगता हैं जैसे इस बार राकेश ने एक संगीतमय प्रेम कहानी का फिल्मांकन किया हो क्योंकि तकरीब हर दृश्य के बारे में संगीत के द्धारा बताने की कोशिश की है। सब कुछ होते हुये भी दर्शक को एहसास होने लगता हैं  कि वो कहीं कोई लंबी फिल्म तो नहीं देख रहा है। मिर्ज्या भी लैला मजनू, हीर रांझा या सोहनी महिवाल की तरह एक प्रेम कहानी है लेकिन राकेश मेहरा ने इसे कलात्मक रूप देने की कोशिश की है जो उनकी निर्देशकीय प्रतिभा को तो बेखूबी दर्शाती है लेकिन फिल्म का स्वरूप बिगड़ जाता है।mirzya

अभिनय

फिल्म से अनिल कपूर के बेटे हर्षवर्धन और पूर्व अभिनेत्री उषा किरण की पोती सैयामी खेर ने डेब्यू किया है। जहां हर्षवर्धन दर्शक को प्रभावित नहीं कर पाते। न अपने लुक से और न ही अभिनय से। उससे कहीं ज्यादा अच्छा अभिनय युवराज की भूमिका निभाने वाला कलाकार कर गया। आगे हर्ष को अपना एटीट्यूट छोड़  हिन्दी फिल्मों के अनुरूप अपने आप को ढालना पड़ेगा। सैयामी खेर चूंकि एक मॉडल है और खूबसूरत भी, वो सुचित्रा की भूमिका में जांचती है। पाकिस्तानी कलाकार आर्ट मलिक ने बढ़िया एक्टिंग की है। लोहारन की भूमिका में अंजली पाटिल ने अच्छा काम किया तथा ओमपुरी लोहार के गैटअप में स्वाभाविक लगे। के के रैना भी राजा की भूमिका को अच्छा निभा ले गये।mirzya

संगीत

शंकर एहसान लॉय ने इस बार कुछ अलग करने की कोशिश की है। फिल्म में  उन्होंने गुलजार के शब्दों को अलग अलग सूफी तथा क्लासिकल सिंगर्स से गवाया जिनमें दलेर मेंहदी की दमदार आवाज पूरी फिल्म में गूंजती रहती है और भली लगती है ।

क्यों देखें

रंग दे बसंती, भाग मिल्खा भाग जैसी फिल्मों के फिल्मकार राकेश मेहरा तथा संगीतमय प्रेम कहानीयों के प्रशंसक  को ‘मिर्ज्या’ पसंद आ सकती है।


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Mayapuri

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