मूवी रिव्यू: रिश्तों के नये पहलुओं से परिचित करवाती ‘मुक्ति भवन’

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रेटिंग****

जिन्दगी की धकापेल में मध्यम परिवारों के लोग मजबूरन एक दूसरे से दूर होते चले जा रहे हैं । लिहाजा आपसी रिश्ते धूमिल होते जा रहे है । इन रिश्तों के तहत अकेलपन का एहसास करते एक वृद्ध और उसके  बेहद व्यस्त बेटे के बीच आत्मिक संबन्धों को लेकर महज चोबीस साल के लेखक निर्देशक आशिष भूटियानी ने फिल्म ‘मुक्ति भवन’ जैसी असरदार फिल्म के जरिये भावनात्मक पलों को जीने की अच्छी कोशिश की है ।

परिवार और काम के चक्कर में उलझे  पुत्र राजीव यानि आदिल हुसॅन अपने पिता यानि ललित बहल की  तरफ ध्यान नहीं पाता। जिन्दगी से ऊब चुके पिता को अपना समय नजदीक आने का एहसास होता है तो वे काशी जाकर मोक्ष पाने का निश्चय करते हैं। बाद में पुत्र, बहू और पोती के मना करने पर भी उनका इरादा नहीं बदलता । लिहाजा उन्हें उनका बेटा राजीव कुछ दिनों की काम  से छूट्टी ले काशी ले आता है। वहां उन्हें आश्रम नुमा मुक्ति भवन में पंदरह दिन के लिये कमरा मिलता है । यहां एक साथ रह रहे बाप बेटे एक दूसरे के नजदीक आते है । एक दिन पिता बीमार पड़ते हैं तो राजीव को लगता है कि अब शायद उनका समय आ गया है लेकिन पिता ठीक हो जाते हैं और इस बार वे बेटे को उन्हें अकेला छौड़ कर लाने के लिये कहते हैं । उसके जाने के बाद ही बाप को मोक्ष प्राप्त होता है । Mukti-Bhavan-Adil-Hussain_movie review

न्यूयार्क फिल्म इस्ंटीट्यूट से तालीम प्राप्त कर चुके फिल्म के निर्देशक आशिष भूटयानी ने महज इक्क्सि वर्ष की उम्र में ये कहानी लिखी और चोबीस साल की उम्र में इस फिल्म का निर्देशन किया ।अपनी पहली ही फिल्म में उसने कथा चुस्त पटकथा तथा सटीक स्टारकास्ट का संयोजन किया।  आज की व्यस्त आपाधापी में धूमिल  होते जा रहे रिश्तों का एहसास निर्देशक बहुत ही मार्मिक तरीके से करवाता है ।फिल्म में बाप बेटे के रिश्तों को मजबूत बनाती है पोती। दादा पोती के भावनात्मक रिश्ते को जिस कदर सहजता से दिखाया गया है यहां निर्देशक की सूझबूझ का कायल होना पड़ता है। निर्देशक नेे कही भी फिल्म को नकली नहीं होने दिया ।mukti-bhawan-

आदिल हुसैन एक बेहतरीन अभिनेता हैं लेकिन ये किरदार उनके कॅरियर में मील का पत्थर साबित होगा । उन्होंने एक परिवार और नोकरी की जिम्मेदारी के अलावा पिता के प्रति बेटे के समर्पण को बहुत जबरदस्त तरीके से अभिनीत कर दिखाया है । पिता और दादा की भूमिका  ललित बहल जिस सहजता से निभाते हैं ये उनके बढि़या अभिनेता होने का सुबूत है । पोती की छोटी भूमिका में पालोमी घोष भी प्रभावित करती है  । यही नहीं फिल्म में ‘मुक्ति भवन’ भी एक किरदार की तरह अपने होने का एहसास करवाता है ।

 ‘मुक्ति भवन’ प्रभावी तरीके से रिश्तों के नये पहलुओं से परिचित करवाती है ।

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Mayapuri