मूवी रिव्यू: काल्पनिक संसार में वास्तविकता को दर्शाती – ‘निल बटे सन्नाटा’

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रेटिंग****

एक तरफ जहां हमारी फिल्में भाषा और संस्कृति को लेकर हॉलीवुड फिल्मों की होड़ कर रही हैं वहीं निर्देशिका अश्विनी अय्यर तिवारी ने अपनी पहली फिल्म ‘निल बटे सन्नाटा’ में हिन्दी को क्षेत्रीय भाषा में घोलते हुये उम्मीद जगाने की कोशिश की है कि हम अभी सब कुछ नहीं भूले हैं। मां बेटी को लेकर बनी यह फिल्म बिना कुछ ओढ़े लपेटे जो कहानी कहना चाहती है सरल भाषा लेकिन प्रभावशाली ढंग से कह जाती है।

कहानी

चंदा (स्वरा भास्कर) आगरा में खाना बनाने वाली मिसरानी है अपनी बेटी को अच्छी शिक्षा दिलवाने के लिये वो इसके अलावा मसाला कूटना, जूते पैकिंग तथा अन्य काम भी करती है लेकिन उसकी बेटी अप्पू यानि अपेक्षा (रिया शुक्ला) का ध्यान पढ़ाई से कहीं ज्यादा फिल्मी एक्टरों में है। स्कूल में उसके टीचर श्रीवास्तव जी (पंकज त्रिपाठी) उससे पूरी तरह निराश हैं क्योंकि गणित में तो अप्पू निल बटे सन्नाटा है। जबकि मां उसे हर वक्त पढ़ने के लिये प्रेरित करती रहती है लेकिन अप्पू का कहना है कि जिस प्रकार डॉक्टर का बेटा डॉक्टर, इंजीनियर का बेटा इंजीनियर बनता है उसी प्रकार बाई की बेटी भी बाई ही बनेगी। चंदा परेशान होकर ये बात अपनी मालकिन दीदी (रत्ना पाठक) को बताती है दीदी उसे जो उपाय बताती है वो बाद में पूरी तरह कारगर साबित होता है। इस प्रकार चंदा का अपनी बेटी को लेकर देखा गया सपना पूरा होता है।

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निर्देशक

विज्ञापन जगत से फिल्मों में कदम रखने वाली निर्देशिका अश्विनी प्रसिद्ध लेखक निर्देशक नितेश तिवारी की पत्नि हैं। आगरा में ताज महल के पीछे एक गरीब बस्ती को मुख्य पात्रों की लोकेशन बनाने के पीछे अश्विनी का उद्देश्य ताज था क्योंकि उसका मानना है कि ताज सिर्फ प्रेमियों का ही प्रेरक चिन्ह नहीं बल्कि उस मां का भी है जो अक्सर उसके पीछे बैठकर अपनी बेटी को लेकर सपने बुनती है। यहां चंदा के पीछे कोई कहानी नहीं हैं कि वो क्यों बाई बनी वगैरह वगैरह। कहानी उसके मकसद पर टिकी है कि वो नहीं चाहती कि उसकी बेटी भी उसकी तरह बाई बने। इसके लिये पात्र का अदम्य साहस नकली नहीं बल्कि प्रेरक लगता है। चंदा और उसकी बेटी तथा मास्टर जी और बेटी के सहपाठी, सभी का लुक ऐसा है जैसे वे सभी हमारे आस पास के पात्र हों। बेशक फिल्म का सब्जेक्ट गंभीर है लेकिन फिल्म को कहीं भी गंभीर नहीं होने दिया। अपनी बात फिल्म अपने पात्रों द्वारा बिना किसी भाषण बाजी के असरदार ढंग से कह जाती है। इसलिये इसमें कोई दो राय नहीं कि बॉलीवुड में अश्विनी अय्यर तिवारी के रूप में एक और बेहतरीन निर्देशक का आगमन हुआ है।

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अभिनय

स्वरा भास्कर के साहस की तारीफ करनी होगी कि एक अच्छी भूमिका के लिये उसने पंद्रह साल की बेटी की मां बनना भी स्वीकार कर लिया और अपने बढ़िया अभिनय से उस भूमिका को सजीवता प्रदान की। उसकी भूमिका को निखारने में रत्ना पाठक का भी पूरा पूरा सहयोग रहा। अपनी पहली फिल्म में ही रिया शुक्ला का अभिनय देखते बनता है तथा उसके सहपाठियों की भूमिकाओं में जो कलाकार हैं और गणित पढ़ाने वाले कलाकार ने बहुत ही सुंदर अभिनय किया है। अभी तक गन के साथ मोटर साइकिल पर बैठने वाली निगेटिव भूमिकायें करने वाले कलाकार पंकज त्रिपाठी के हाथ में इस बार गन नहीं बल्कि किताबें दिखाई देगीं। वे हेडमास्टर की भूमिका में न सिर्फ अपनी इमेज धो डालते हैं बल्कि अपनी भाव भंगिमाओं से दर्शकों का मनोरजंन भी करते हैं। छोटी सी भूमिका में सजंय सूरी भले लगते हैं।

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संगीत

फिल्म में निर्देशक के अलावा संगीतकार रोहन विनायक ने भी एडवर्ल्ड से फिल्मों में शुरूआत की है। फिल्म के सभी गीत कहानी में गुथे हुये हैं।

क्यों देखें

काल्पनिक संसार से निकल कर वास्तविकता दर्शाने वाली फिल्मों के प्रशंसक इस फिल्म को कतई मिस न करें।

 

 


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Mayapuri

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