मूवी रिव्यू: प्रभावशाली ढंग से कुछ तीखे सवाल उठाती है ‘पिंक’

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रेटिंग****

इक्कीसवी सदी के बाद भी हम लड़कियों को लेकर कितने संक्रीण विचार रखते हैं। इन सवालों को शूजीत सरकार द्धारा निर्मित तथा अनिरूद्ध राय चैधरी द्धारा निर्देशित फिल्म ‘पिंक’ में प्रभावशाली ढंग से उठाया गया है।

कहानी

दिल्ली शहर में तीन वर्किगं गर्ल्स एक साथ किराये पर रहती हैं। इनमें कीर्ती कुल्हारी यानि फलक अली लखनऊ की रहने वाली है, आंड्रिया तारियांग यानि आंड्रिया शिलांग से हैं और तापसी पन्नू दिल्ली की ही रहने वाली है लेकिन वो अपने पविार के साथ न रहते हुये इनके साथ रहती है। एक बार ये तापसी के स्कूल के दोस्त के कहने पर उसके दोस्तों के साथ सूरज कुंड घूमने फिरने चली जाती हैं लेकिन वहां इनके साथ अंगद बेदी जो एक राजनैतिक घराने से ताल्लुक रखता है तथा उसके साथी इनके साथ बदतमीजी करने लगते हैं लेकिन तापसी अंगद को बुरी तरह घायल कर कीर्ती और आंड्रिया के साथ अपने घर भाग आती है। लेकिन उसके बाद अंगद और उसके दोस्त उन्हें धमकी देते रहते हैं और उनसे माफी मांगने के लिये कहते हैं। लेकिन जब वे उनकी बात नहीं मानती तो अंगद का नेता चाचा तापसी पर अपने भतीजे को जान से मारने का केस दायर कर देता है। यहां उनकी सहायता एक वकील के तौर पर उनके पड़ोस में रहने वाले दीपक सहगल यानि अमिताभ बच्चन करते हैं। कोर्ट में अंगद का वकील पीयूष मिश्रा उन्हें पेशा करने वाली लड़कियां करार देते हुये उन तीनो पर अगंद को ब्लैकमेलिंग तथा जान से मारने की कोशिश का इल्जाम लगाता है। लेकिन बाद में अमिताभ न सिर्फ उन्हें निर्दोष साबित करने में सफल होते हैं बल्कि आधुनिक समाज का लड़कियों को लेकर संकुचित चेहरा भी दिखाने में कामयाब होते हैं।amitabh-bachchan

निर्देशन

पिंक यानि सॉफ्ट। ये कलर औरत के लिये माना जाता है क्योंकि वे भी इसी रंग की तरह नर्म, निर्मल और एक हद तक पुरुषों के मुकाबले कमजोर होती हैं। फिल्म में निर्देशक ने बहुत ही असरदार ढंग से सवाल उठाये हैं कि क्यों आज भी पुरुष और महिला में फर्क रखा जाता है। जो काम लड़के करते हैं वहीं काम लड़कियों के लिये निषेध क्यों हो जाता है। अगर कोई लड़की शराब पी लेती है पार्टियों में जाती है या काफी फ्रैंडली बीहेव करती है तो उसे आसानी से बिस्तर की चीज मान लिया जाता है। वहीं लड़कों पर ये सारी बातें लागू नहीं होती। फिल्म में अमिताभ द्धारा कोर्ट में लड़कियों को लेकर उठाये गये तमाम सवालों भरी इस बहस को सुनने के बाद दर्शक सोचने पर मजबूर हो जाता है। शूजीत सरकार ने इन सभी सवालों के लिये बेहतरीन कहानी का चुनाव किया। लिहाजा फिल्म के सभी मुख्य किरदार असरदार ढंग से अपनी बात रखने में सफल साबित होते हैं। इससे पहले जंहा शूजीत पिकू या विकी डोनर जैसी कहानीयां कहने में सफल रहे हैं वहीं फिल्म के निर्देशक दो नेशनल अवार्ड  विजेता हैं। अपने बढ़िया निर्देशन द्धारा वे साबित कर चुके हैं कि एक बेहतरीन फिल्म मेकर हैं।screen-sho

अभिनय

अमिताभ बच्चन के अभिनय की चमक फिल्म दर फिल्म और ज्यादा बढ़ती जा रही है। वकील सहगल की भूमिका में उनके द्धारा कही हर बात वजनदार है। बेशक उनके सामने पियूष मिश्रा ने भी अपने विशेष अंदाज में अच्छा अभिनय किया है लेकिन वे एक बार भी अमिताभ के सामने खड़े नहीं रह पाते। सबसे उल्लेखनीय तीनों में से दो लड़कियां है कीर्ती कुल्हारी तथा तापसी पन्नू ,जिन्होंने अमिताभ जैसे विशाल कद के अभिनेता के सामने पूरे आत्म विश्वास के साथ बेहतरीन अभिनय किया। तीसरी लड़की आंड्रिया को ज्यादा स्पेस नहीं दिया गया लेकिन उसने भी ठीक काम किया। अगंद बेदी भी नगेटिव शेड में बेहतर काम कर गये।taapsee-pannu-kirti-kulhari

संगीत

शांतनू मोईत्रा ने कहानी में गुंथे हुये कई गीतों को बेहतरीन ढंग से कंपोज किया। इनमें तनवीर गाज़ी द्धारा लिखा एक गीत और एक नज्म जिसे अमिताभ की आवाज में रिकार्ड किया गया अंत में नज्म अमिताभ की आवाज में गूंजती सुनाई देती है ।

क्यों देखें

अमिताभ बच्चन तथा अन्य कलाकारों की बेहतरीन अदाकारी से सजे सवालों से सोचने पर मजबूर करती ये फिल्म मिस नहीं करनी चाहिये।


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Mayapuri

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