मूवी रिव्यू: तेरह साल की बच्ची की सच्ची साहसिक कथा ‘पूर्णा’

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रेटिंग****

हमारे देश में प्रतिभाशाली लड़कीयों की कमी नहीं है अगर उन्हें थोड़ा भी पुश किया जाये तो वे हिमालय को भी जीत सकती हैं। एक्टर प्रोड्यूसर डायरेक्टर राहुल बोस की फिल्म ‘पूर्णा’ तेलगांना के गांव की एक गरीब परिवार की महज तेरह वर्षीय बच्ची के साहस की एक ऐसी सच्ची कहानी पर एक ओजस्वी फिल्म है। जिसमें बच्ची अपने साहत से एवरेस्ट को फतह कर दिखाती है।

तेलंगाना के एक गांव के गरीब आदमी की बेटी पूर्णा यानि अदिति ईनामदार अपने चाचा की बेटी के साथ स्कूल जाती है। एक दिन उसकी चचेरी बहन उसे एक पंपलेट दिखाते हुये बताती है कि ये एक ऐसे स्कूल के बारे में बताता है कि वहां पढ़ाई के साथ साथ अच्छा खाना भी मिलता है लेकिन जब  वे दोनाें घर से भाग कर उस स्कूल में जाना चाहती हैं तो न सिर्फ पकड़ ली जाती है बल्कि चाचा अपनी नाबालिग बेटी की शादी भी कर देता है। पूर्णा अपने पिता से जिद कर उस स्कूल में आ जाती है लेकिन वहां उसे ऐसा कुछ भी नहीं दिखाई देता जो उसकी बहन ने बताया था बल्कि वहां तो बहुत ही नीचे दर्जे का खाना मिलता था लिहाजा वो स्कूल छौड़ भाग जाती है। इधर दो साल तक बाहर स्टडी कर आईपीएस अधिकारी राहुल बोस कुछ समय के लिये एजुकेशन अधिकारी बन उन सब स्कूलों को सुधारना चाहता है जंहा अव्यवस्था के चलते बच्चे या तो स्कूल आना ही नहीं चाहते या स्कूल छौड़ने पर अमादा रहते  हैं। जब राहुल को पूर्णा के स्कूल छौड़ने का पता चलता है तो वो उसे समझा कर वापिस स्कूल ले आता है और बाद में स्कूल में भ्रष्टता फैलाने वाले कर्मचारियाें को लाइन पर लाता है। उसी दौरान उसे पता चलता है कि पूर्णा के भीतर पर्वतारोहण करने की जबरदस्त क्षमता है लिहाजा उसे स्कूल की तरफ से एवरेस्ट की चढ़ाई्र के लिये स्लैक्ट किया जाता है और एक दिन एक मासूम सी गरीब घर की बच्ची पूर्णा एवरेस्ट फतह कर न सिर्फ अपने देश का नाम ऊंचा करती है बल्कि अपने गांव और अपने इस अभियान के अधिकारियों को भी गर्व करने पर मजबूर करती है ।listing-image-medium (2)

राहुल बोस एक अच्छे एक्टर तो ही, इस फिल्म के साथ अब वे अपने आपको एक बेहतरीन निर्देशक साबित कर चुके हैं। ये उनकी दूरदर्शिता ही कही जायेगी कि उन्होंने एक ऐसी सच्ची  और प्रेरक कहानी का चुनाव किया जो गरीब गुरबा घरों की लड़कियों को कुछ अलग करने के लिये उकसाती है । पूर्णा की कहानी को लेकर उन्होंने एक प्रभावशाली और सार्थक फिल्म का निर्माण व निर्देशन किया है। फिल्म की स्टीक कास्टिंग, नयनाअभिराम खूबसूरत  लोकेशसं, सलीम सुलेमान का कहानी में गुुंथा हुआ संगीत  जिसके तहत  कुछ परबत हिलायें,  बाबुल मौरा तथा पूरी कयामत जैसे गीत फिल्म को और ताकतवर बनाते हैं। इसके अलावा बढि़या बैकग्राउंड म्यूजिक भी  फिल्म की जान है।Rahul-Bose

फिल्म की लीडिंग लेडी यानि छोटी बच्ची अदिति ईनामदार ने पूर्णा के किरदार को पूरी तरह जी कर दिखाया है। यानि उसकी पहली कोशिश ही सार्थक साबित हुई । उसकी कजन सिस्टर की भूमिका निभाने वाली अदाकारा का बढि़या काम था । राहूल बोस ने आई ए एस और एजुकेशन अधिकारी की छोटी सी भूमिका बड़ी सहजता से निभाई है । बाकी सहयोगी कलाकारों ने भी अच्छा साथ निभाया ।

इसमें कोई दो राय नहीं कि फिल्म अपने स्लोगन कि ‘लड़कीयां सब कुछ कर सकती हैं’ को तेरह साल की पूर्णा मालावत के द्धारा सही साबित करती है ।


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Mayapuri

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