मूवी रिव्यू: दो इन्सप्रेशनल महिलाओं के चमत्कारिक कारनामे दर्शाती ‘सांड की आंख’

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रेटिंग****

तन बूढ़ा हो सकता है लेकिन मन कभी बूढ़ा नहीं होता। ये कहावत चरितार्थ कर दिखाई यूपी के बागपत जिले के गांव जौहरी की दो साठ वर्ष से ज्यादा की दो महिलाओं चंद्रो तोमर और प्रकाशी तोमर की है। उन्होंने नेशनल लेबल पर निशानेबाजी में न जाने कितने मेडल जीत कर महिलाओं को इस बात के लिये प्रेरित किया कि टेलेंट उम्र का मोहताज नहीं होता। वो किसी भी उम्र में दिखाया जा सकता है। इन दोनों महिलाओं की कथा निर्देशक तुषार हीरानंदानी ने फिल्म ‘सांड की आंख’ में प्रभावी ढंग से दर्शाई है।

कहानी

यूपी के बागपत जिले के अंर्तगत गांव जौहरी का सरपंच परिवार भी परंपरागत तरीके चला आ रहा ऐसा परिवार है, जिसमें औरतें महज घर, बच्चों और खेत तक ही सीमित हैं। इस परिवार में सबसे बड़े हैं सरपंच यानि प्रकाशा झा, उनके दो भाई तथा दोनों छोटे भाईयों की बीवीयां हैं चंद्रो तोमर यानि भूमि पेंडनेकर तथा प्रकाशी तोमर यानि तापसी पन्नू। इन देवरानी जेठानीयों की दो बेटियां हैं  जो डॉक्टर से निशानेबाज बने डा. यशपाल यानि विनीत कुमार से छिप कर निशानेबाजी सीखने की कोशिश करती हैं। उसी दौरान चंद्रो और प्रकाशी में भी डॉ. को निशानेबाजी की असीम प्रतिभा दिखाई देती है। इसके बाद डॉ. के कहने पर दोनों निशानेबाजी को निखारते हुये बाहर प्रतियोगिताओं में जाना शुरू कर देती हैं और महज चार सालों के दौरान 94 मेडल्स जीत लाती हैं। इस बीच उनकी बेटियों भी निशानेबाजी की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू कर देती है । एक दिन उनका सेलक्शन इन्टरनेशनल टूर्नामेंनट में हो जाता है, जिसके लिये उन्हें पेंतालिस दिन ट्रेनिंग के लिये दिल्ली जाना होता है। जब ये बात परिवार के मर्दों को पता चलती है तो वे आसमान सिर पर उठा लेते हैं। यहां घर का एक जवान जो मिलिट्री का जवान हैं सामने आता है और उन्हें बताता हैं कि घर की औरतों के द्धारा मेडल जीतना तो अति सम्मान की बात है।  लेकिन सरपंच नहीं मानते, तो उन्हें पंचायत बैठाने की धमकी दी जाती है। पंचायत में चंद्रो और प्रकाशी खुल कर सामने आ जाती हैं तो उनके तर्को को देखते हुये पंचायत को झुकना पड़ता है लिहाजा दोनों की बेटियां ट्रेनिंग के लिये चली जाती हैं लेकिन चंद्रो और प्रकाशी पर किसी भी प्रतियोगिता में भाग न लेने का प्रतिबंध लग जाता है। क्या प्रकाशी और चंद्रो को दोबारा निशानेबाजी में भाग लेने का मौका मिल पाता है ? क्या उनकी बेटियां बाहर से मेडल जीत कर ला पाती है ? ये सब फिल्म देखते हुये पता चल पायेगा।

अवलोकन

निर्देशक ने फिल्म बनाने से पहले बाकायदा कथा पृष्ठभूमि, रहन सहन,रिति रिवाज तथा बोलचाल पर काफी रिसर्च किया है क्योंकि फिल्म में ये सभी चीजें निखर कर सामने आई हैं, जिससे फिल्म की आभा और बढ़ गई। उसके बाद फिल्म की परफेक्ट कास्टिंग ने फिल्म को और ज्यादा रीयल बना दिया। बेशक पहले भाग में फिल्म की रफ्तार थोड़ी धीमी है लेकिन दूसरे भाग में हर किरदार सजग हो उठता है। अगर बोलचाल की बात की जाये तो किरदार हरियाणवी बोलने की कोशिश करते नजर आते हैं जबकि फिल्म की भाषा का हरियाणवी भाषा से कोई लेना देना नहीं। फिल्म के संवाद बढ़िया रहे और संगीत के तहत  वूमनियां और उड़ता तीतर जैसे गीत पहले ही फेमस हो चुके हैं।

अभिनय

भूमि पेंडनेकर और तापसी पन्नू फिल्म के दो आधार स्तम्भ हैं। दोनों का अभिनय शुरू से लास्ट तक एक दूसरे पर भारी पड़ता दिखाई देता रहा, जबकि भूमि, तापसी से इक्किस रही। दरअसल यहां भूमि को उसकी हरियाणवी मां की भाषा को लेकर ट्रेनिंग काफी काम आई। इसके बाद विनीत कुमार ट्रेनर की भूमिका में बेहतरीन काम कर गये। प्रकाश झा सरपंच के रोल में अच्छे लगे, वे और अच्छा कर सकते थे लेकिन भाषा को लेकर मात खा गये क्योंकि भाषा न बोल पाना उनके किरदार में अखरता रहा। बाकी सहयोगी कलाकार भी उल्लेखनीय रहे।

क्यों देखें

ऐसी दो इंसप्रेशनल ग्रामीण महिलाओं के लिये फिल्म देखनी होगी, जिनके चमत्कारिक कारनामे देख दूसरी महिलायें भी प्रेरित होगीं।

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