मूवी रिव्यू: बेअसर रही सरगोशियां

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रेटिंग**

अभिनेता इमरान खान फिल्म ‘सरगोशियां’ से प्रोड्यूसर, राइटर और डायरेक्टर बनकर सामने आये हैं। राइटिंग और डायरेक्शन में उनकी एसोसिएशन विजय वर्मा के साथ रही। फिल्म, काश्मीर में  आंतकवाद के माहौल में भाई चारे और मानवता का संदेश देती है। फिल्म का टैग है ‘ कुछ कहता है काश्मीर’।

इन्द्रनील सेनगुप्ता एक फोटोग्राफर है लेकिन उसकी मॉडल बीवी एक शाखर्च और ऐशपरस्त ऐसी औरत है जो उसे सिर्फ लूजर समझती है  तथा उससे तलाक के बदले उसका घर चाहती है जो उसने जिन्दगी भर की कमाई से खड़ा किया था। उसका दोस्त  रैना यानि हसन जै़दी एक ऐसा कन्फयूज युवक है जो एक साल में चार नौकरियां छोड़ चुका है। उसकी अपने बाप से कतई नहीं बनती। उसी दौरान इन्द्रनील को  जे एंड के बैंक के कैलडंर का असाइंटमेन्ट मिलता है, तो वह हसन को भी अपने साथ काश्मीर चलने के लिये कहता है। काश्मीर में उसे कैलेंडर के लिये ऐसी जगहों की तस्वीर लेनी है जो काश्मीर की रूह कहलाती है।  बैंक के पीआरओ इमरान खान के  अलावा उन्हें एक लड़की सारा खान भी मिलती है जो यूके से काश्मीर को नजदीक से देखने और समझने के लिये आई है। ये चारों एक टीम बनाकर काश्मीर की अनदेखी लोकेशनों को देखने के लिये निकल पड़ते है। एक दिन भटक कर रैना ऐसे गांव में पहुंच जाता है जो उसका अपना गांव है, जिसे बरसों पहले एक धमकी से डरकर उसके पिता मौहित रैना यानि एहसान खान अपनी बीवी और बच्चे के साथ अपने पिता किशन लाल रैना यानि आलोक नाथ को छोड़ शहर चले गये थे क्योंकि किशन लाल अपना पैतृक गांव छोड़कर नहीं जाना चाहते थे। हसन अपने दादा को पहचान लेता है। दादा के पास एक लड़की पायल रहती है जो अनाथ है उसे उसके दादा ने ही पाला है। इस जर्नी में जहां रैना को अपने दादा से मिलना हो जाता है। इसके अलावा उन्हें सहद्रय औरत फरीदा जलाल मिलती है जिसे पिछले पंदरह वर्षो से अपने बेटे का इंतजार है। उसकी मानवता भरी विशालता को देखकर चारों बेहद प्रभावित होते हैं।  इस बीच उन्हें  टाम ऑल्टर से मिलना होता हैं जो बहुत बड़े फोटोग्राफर हैं। वे  इन्द्र को हमजा नामक पठाक का नाम सुझाते हैं जो उन्हें उस लेक तक ला जा सकता है जिस तक अकेले पहुंचना आसान नहीं  था। इसके बाद उस कठिन लोकेशन पर जाने के लिये उन्हें पठान हमजा यानि शाहबाज खान से मिलना होता है  तो पता चलता है कि हमजा की बीवी मरने से पहले एक बच्ची नूरी को जन्म दे गई थी जो अपाहिज थी। चारों मिलकर नूरी के इलाज के लिये एक कैंपन चलाते है इसके बाद मिली इमदाद से नूरी अपने पैरों पर खड़ी हो स्कूल जाने लगती है।  उधर दादा के मरने के बाद  रैना दादा के अधूरे काम  पूरे करने के लिये गांव में रहने का निश्चय  करता है। इन्द्रनील अपनी बीवी को तलाक दे सारा से शादी कर लेता है उसी प्रकार रैना पायल से शादी कर लेता है।इमरान खान बतौर प्रोडयूसर डायरेक्टर एक ऐसा करंट इशू ले कर चलते हैं जिसमें आंतकवाद की आग में झुलसते काश्मीर के बारे में बताने की कोशिश की गई है कि बेशक वहां आतंकवाद का बोलबाला हैं लेकिन आज भी वहां हिन्दू मुस्लिम का भाई चारा देखते बनता है। चार घटनाओं के जरिये बताने की कोशिश की गई है बिना आतंकवाद को दिखाये। फिल्म भाई चारे की बात मंथरगति से कहती हुई आगे बढ़ती है । फिल्म की पटकथा  ढिली और सवांद साधारण रहे। जिस तरह का माहौल इन दिनों काश्मीर में चल रहा है उसे देखते हुये फिल्म में दिखाई गई घटनाओं पर यकीन नहीं हो पाता। हां रेगुलर तथा कुछ ऐसी लोकेशन जरूर देखने को मिली जो इससे पहले किसी फिल्म में नहीं दिखाई दी  फिल्म के संगीत की बात की जाये तो सिर्फ टाइटल सांग ही पूरी फिल्म में चलता है  और याद रह जाता है।

इमरान खान फिल्म के प्रडयूसर, राइटर और निर्देशक हैं लेकिन पता नहीं इतने सारे काम करते हुये उन्हें एक्टिंग करना क्यों जरूरी लगा वो भी एक साधारण से रोल में । इन्द्रनील सेनगुप्ता, हसन जैदी, सारा खान,अदिति भाटिया,खालिद सिद्दीकी, आलोक नाथ, फरीदा जलाल, शाहबाज खान तथा टॉम ऑल्टर आदि सभी कलाकारों ने ठीक ठाक काम किया है ।

अगर फिल्म के बारे में बात की जाये तो वह अपनी बात तो कहती है लेकिन तरीका असरदार नहीं रहा ।

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Mayapuri