मूवी रिव्यू: कई मसालों का मिश्रण है – ‘सॉरी डैडी’

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रेटिंग**

प्रोड्यूसर वसीम खान तथा विजय पाल द्धारा निर्देशित फिल्म ‘सॉरी डैडी’ उन बेसहारा बच्चों पर आधारित हैं जिन्हें अगवा कर पहले अपंग किया जाता हैं फिर उनसे भीख मंगवाई जाती हैं। फिल्म में बताया गया है कि किस प्रकार यूपी के एक शहर में उन बच्चों की बाकायदा खरीद फरोख्त भी होती है ।

कहानी

शमीम खान एक ईमानदार पुलिस ऑफिसर है जिसकी पत्नि मर चुकी हैं लिहाजा अब उस पर अपनी इकलौती बेटी की जिम्मेदारी हैं जिसे वो पूरी ईमानदारी से निभा रहा है । दूसरी तरफ एक असफल बिजनेसमैन शराबी बन अपनी पत्नि और बच्चे पर जुल्म करता है । बच्चा शमीम की बेटी का क्लासमेट और उसका दोस्त है । शहर में बच्चों को अपंग कर उनसे भीख मंगवाने वाला नेता टीनू वर्मा उनका सप्लायर भी है । एक दिन अचानक शराबी पत्नि के हाथों मारा जाता है । पत्नि को जेल हो जाती हैं और उनका बेटा बेसहारा हो टीनू वर्मा के हाथ लग जाता है । शमीम अपनी बेटी के आगह पर उस बच्चे की तलाश में उन माफियाओं तक पहुंचने के लिये छोटे अपराधियों का सहारा लेते हुये अंत में टीनू वर्मा तक पहुंचता हैं और उसके गैंग को खत्म कर सारे बच्चों को बचाता है । बाद में वो अपनी बेटी के दोस्त बच्चे को भी अपना लेता है ।

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निर्देशन

इससे पहले भी इस तरह के विषय फिल्मों में आते रहे है। लेकिन विजय पाल कमजोर और ढीली ढाली पटकथा के तहत कहानी प्रभावशाली ढंग से नहीं कह पाते। लिहाजा फिल्म टुकड़ो में दिखाई देती है। पहले भाग में हीरो की एंट्री दिखाने के लिये मुकेश तिवारी का इस्तेमाल कर उसे गायब कर दिया गया। दूसरे भाग में टीनू वर्मा की एंट्री दिखाते हुये उसे मेन विलन घोषित कर दिया जाता है ,बावजूद इसके टीनू को मुश्किल से दो या तीन या तीन सीन ही मिल पाये। बीच में रघुवीर यादव को भी एक मलंग के तौर पर कहानी गाते हुये दिखा दिया । इस तरह अंत तक निर्देशक कहानी के हिस्सों को जोड़ नहीं पाता ।

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अभिनय

पुलिस ऑफिसर के तौर पर शमीम खान साधारण रहे जबकि उनके पास काफी कुछ करने के मौंके थे । बाकी मुकेश तिवारी, रघुवीर यादव, रज्जाक खान तथा टीनू वर्मा को कुछ करने का अवसर ही नहीं मिल पाया ।

संगीत

अगर म्यूजिक की बात की जाये तो पूरी फिल्म के हर सीन में हर संवाद के बाद गानों की लाइनें बजती रहती हैं, फिर भी जावेद अली और सोनू निगम द्धारा गाये गीत अच्छे बन पड़े हैं ।

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क्यों देखे

वैसे फिल्म देखने की एक भी वजह नही हैं फिर भी अगली पंक्ति के दर्शक कई मसालों का मिश्रण बनी इस फिल्म में मनोरजंन ढूंढने की कोशिश कर सकते हैं

 

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Mayapuri