“सेक्सी दुर्गा” फिल्म पर बवाल क्यों ?

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डायरेक्टर सनल कुमार शशिधरन की मलयाली फिल्म ‘सेक्सी दुर्गा’ अपने नाम को लेकर अबतक विवादों में छाई हुई है। एक ही रात में शूट की गई और 23 सालों में बनीं ये पहली ऐसी फिल्म है जिसने अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव रॉटरडैम में टाइगर पुरस्कार जीता है। आपको बता दें कि सेंसर बोर्ड ने इस मूवी का नाम ‘सेक्सी दुर्गा’ से बदलकर ‘एस दुर्गा’ करने का आदेश दिया था। इस फिल्म की वजह से लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत ना हों इस वजह से सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म को मुंबई फिल्म महोत्सव में प्रदर्शित किए जाने पर रोक लगा दी थी।

नाम में सब रखा है ?

लेकिन क्या वास्तव में इस फिल्म से लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं, ये एक बड़ा सवाल है। पहली नजर में फिल्म के नाम से तो ऐसा ही लगता है। सवाल उठता है कि आखिर मां दुर्गा के नाम के आगे सेक्सी शब्द लगाना क्यों जरूरी था ? क्या किसी और लड़की के नाम का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था, क्या धर्म विशेष से इसे जोड़कर दिखाया जाना और देखा जाना सही है? क्या सेक्सी दुर्गा की जगह अगर सेक्सी मैरी या फिर सेक्सी फातिमा, फिल्म का नाम रखा जाता तो कोई फर्क पड़ता या सेंसर बोर्ड उसके आगे से भी सेक्सी शब्द हटाने को कहता ?

लेकिन फिर सवाल उठता है कि क्या हमारे देश में किसी आम लड़की का नाम दुर्गा, लक्ष्मी नहीं हो सकता ? क्या उस खास नाम वाली आम लड़की के साथ कोई छेड़खानी नहीं करता या फिर उसके साथ कोई अनहोनी वारदात नहीं हो सकती ? अगर आपके मन में इनमें से किसी भी सवाल का जवाब हां आता है तो आपके मन में ये सवाल भी आता होगा कि क्या दुर्गा नाम वाली उस आम लड़की के साथ गलत हरकतें होते हुए देखते वक्त आपकी या आपके साथ वालों की धार्मिक भावनाएं आहत नहीं होनी चाहिए ?

फिल्म में क्या है ?

इस फिल्म में भी यही दिखाया गया है। जिसमें दुर्गा नाम की एक अप्रवासी लड़की कबीर नाम के लड़के से प्यार करती है और उसके साथ रात को भाग जाना चाहती है। रास्ते में दो गुंडे उन्हें लिफ्ट देने के बहाने से अपनी कार में बैठा लेते हैं और रास्ते में दोनों को परेशान करते हैं। वो लोग बड़े ही गंदे तरीके से लड़की को घूरते हैं और उन्हें कार से उतरने भी नहीं देते।

तो दूसरी तरफ फिल्म में केरल के एक गांव का सीन भी है, जिसमें एक उत्सव के दौरान दुर्गा के रौद्र रूप काली के भक्त खुद को लोहे के हुक और छड़ों से छेदते हैं ताकि वो सभी पाप से मुक्त हो सकें। इस फिल्म में ये दोनों चीजें दिखाने का सिर्फ एक ही मतलब है, कि लोग दुर्गा मां को देवी के रूप में पूजते तो हैं, लेकिन समाज में उन औरतों का सम्मान नहीं करते, जो वास्तविकता में दुर्गा का ही रूप हैं।

समाज का असली चेहरा है सिनेमा ?

फिल्म के माध्यम से कहीं न कहीं समाज को इस सच्चाई से भी रूबरू कराने की कोशिश की गई है, कि एक महिला कहीं भी सुरक्षित नहीं है। आंखों से घूरकर किया गया वो दुष्कर्म, जिसका सामना एक औरत को हर रोज करना पड़ता है। फिल्म में सिर्फ वो खौफ है, जो हमारे देश में शायद हर औरत महसूस करती है। सिर्फ नाम की वजह से किसी फिल्म के बारे में कोई भी राय देना क्या किसी भी हद तक सही ठहराया जा सकता है।

अब एक और सच्चाई, कोर्ट का आदेश आने के बाद बुधवार को फिल्म के डायरेक्टर ने फेसबुक पर लिखा कि “IFFI आदेश के बावजूद मूवी को प्रदर्शित करने के लिए तैयार नहीं है। ऐसा लगता है कि कोर्ट के फैसले को भी अब नहीं माना जाएगा।”

 


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Sangya Singh

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