पर्दे पर राजनैतिक बवंडर को दर्शाती फिल्में

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देश भर में, चुनाव के बाद राजनीति का उठता बवंडर हैरान करने वाला बनता जा रहा है। ताजी चर्चा में है बॉलीवुड की नगरी मुंबई (महाराष्ट्र) के राजनैतिक गलियारे की उठा-पटक।

इससे पहले हरियाणा, कर्नाटक, गोवा, असम.. में विधानसभा चुनाव के बाद सरकार बनाने की सर्कसगिरी को सब देख चुके हैं। पर क्या सामान्य ‘वोटर’ इस सच को समझ पाता है? शायद नहीं। और इसीलिए हम याद दिला रहे हैं अपने पाठकों को कि राजनैतिक गलियारे के बवंडर को समझना हो तो कुछ बॉलीवुड की फिल्मों को देखिए। अनजान भोले दर्शक भी समझ जाएंगे कि पर्दे का सच असली जिन्दगी के सच का ही तस्वीरी रूप होता है।

ऐसी कुछ फिल्में हैं जो राजनीति को दर्शाती हैं- ‘आंधी’, ‘मैं आजाद हूं’, ‘नायक’, ‘सरकार’ (‘सरकार राज’ और ‘सरकार 3’ के रूप में), ‘राजनीति’, ‘युवा’, ‘सत्ता’, ‘गुलाल’। सन् 1975 में आपातकाल को लेकर बनी फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ का तो प्रिंट तक तत्कालीन सरकार के संकेत पर जला दिये जाने की खूब चर्चा हुई थी। संजीव कुमार अभिनीत फिल्म ‘आंधी’ को इसलिए लम्बे समय तक रिलीज से रोका गया था क्योंकि इसमें हीरोइन सुचित्रा सेन का रोल स्व. इंदिरा गांधी से प्रभावित था। गुलजार के निर्देशन में बनी ‘हू तु तु’ और रमेश शर्मा की फिल्म ‘न्यू देहली टाइम्स’ राजनैतिक तोड़फोड़ की फिल्म थी, और वैसी ही एक फिल्म अमिताभ-शबाना को लेकर बनाई गयी थी- ‘मैं आजाद हूं’। अमिताभ बच्चन तो ऐसी कई फिल्मों के नायक रह चुके हैं जिन कहानियों की विषयवस्तु राजनैतिक पृष्ठभूमि ही रही हैं। इनमें ‘मैं आजाद हूं’, ‘इन्क्लाब’ और ‘सरकार’ मुख्य हैं। ‘सरकार’ सीरीज की फिल्मों में उन्होंने शिव सेना सुप्रिमो बाला साहब ठाकरे को पोट्रेट किया था। राजेश खन्ना अभिनीत ‘आज का एमएलए रामअवतार’ भी सेन्सर से काफी रूकावटें पाने के बाद ही थिएटर तक आयी थी। इन फिल्मों में राजनीति की गंदगी को दर्शाया गया था। अनिल कपूर और अमरीशपुरी की टक्कर वाली खुली राजनैतिक लड़ाई की फिल्म थी- ‘नायक’। प्रकाश झा तो ‘राजनीति’ नाम से फिल्म भी बना चुके हैं।

कुछ राजनायकों के जीवन पर भी फिल्में बनी हैं जैसे – महात्मा गांधी पर रिर्चड़ एटनबरो ने बनाई थी, ‘पी.एम. मोदी’, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के ऊपर बनी फिल्म और इंदिरा गांधी पर बनी फिल्म ‘इंदू सरकार’ अथवा सरदार पटेल पर बनी फिल्में ‘सरदार’, ‘पटेल’ आदि पर इन फिल्मों को बवंडर वाली फिल्मों में नहीं रख सकते। तात्पर्य यह कि सिनेमा समाज का सच है। जो दर्शक वोट देने के समय राजनीति का सच नहीं समझते, वे जरूर इन राजनैतिक फिल्मों को समझें। उन्हें अपने वोट की ‘कीमत’ समझ में आ जाएगी!

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