जहां मुर्दे जी उठते है

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मायापुरी अंक 52,1975

मुंबई की फिल्म-नगरी एक ऐसी जगह है जहां हर असंभव काम को संभव कर दिखाया जाता है एक सीन से हीरो के हाथों बड़े-बड़े पहलवानों को पटक कर गिराया जाता है। समुद्री जहाज समुद्र में डूब जाए, हवाई जहाज क्रैश को जाए या किसी मकान में आग लग जाए, हीरो का बाल बांका भी न होगा। उसके बालों की एक लट भी न बिगड़ेगी न ही उसकी पैंट या कमीज की क्रीज बिगड़ेगी। हमारा हीरो गा भी लेता है और हीरोइन के पीछे पेड़ों के इर्द गिर्द चक्कर भी काट लेता है। यही नहीं, युद्ध-स्थल में अकेला हीरो कई-कई दुश्मनों का या यूं कहिए तमाम दुश्मनों का सफाया कर देता है। कहने का सार यह है कि मुंबई फिल्मों का हीरो बाईस कलाओं से युक्त होता है। गाने-बजाने से लेकर मारने पीटने तक का वह हर कठिन काम कर लेता है।

भारतीय दर्शका की सबसे बड़ी ट्रैजडी यह है कि वह अपनी हिंदी फिल्मों का ‘एन्ड’ हंसी-खुशी देखना चाहता है। यह भी चाहता है कि वह हंसता हुआ सिनेमा हाल से बाहर निकले न कि रोता हुआ। यही कारण है कि यदि किसी फिल्म के आखिरी दृश्य में फिल्म के हीरो या हीरोइन की मौत दिखा दी जाये तो दर्शक इसे स्वीकार नहीं कर पाता। ऐसी फिल्म अच्छी होने पर भी पिट जाती हैं आपको

याद होगा, आज से कुछ वर्ष पूर्व फिल्म ‘दर्पण’ अभिनय और कहानी की दृष्टि से काफी जानदार थी। फिल्म के हीरो-हीरोइन थे सुनीलदत्त और वहीदा रहमान। दोनों का अभिनय काफी सराहनीय था। फिल्म हर दृष्टिकोण से अच्छी थी। परंतु फिर भी यह फिल्म फ्लॉप हो गई। कारण सिर्फ इतना था कि फिल्म के अंत में वहीदा रहमान को मरते हुए दिखाया गया था। सारी फिल्म का मजा इसी दृश्य के कारण खराब हो गया फिल्म ‘रेशमां और शेरा’ के अंत में भी हीरो-हीरोइन दोनों अस्वाभाविक रूप से मर जाते हैं और फिल्म फ्लॉप हो जाती है।

वैसे कई फिल्मों में मौत को स्वाभाविक बना कर दिखाया गया है जिसे दर्शकों ने स्वीकार भी किया है। जैसे फिल्म ‘आनंद’ में आनंद की मौत और ‘नमक हराम’ के बदनाम शायर की मौत कौन भूला सकता है। वस्तुत: इन मौतों के फिल्माने के पीछे ठोस कारण था, इसलिए दर्शकों ने इसे स्वीकार किया।

प्राय: फिल्मों में फिल्म के हीरो हीरोइन या दर्शकों के प्रिय कलाकार की मौत दिखाई जाती है जिसे दर्शक सहन नहीं कर पाता। मजबूर होकर फिल्म की अंतिम रोल ही बदल दी जाती है और मरने वाले को जिंदा कर दिया जाता है यानि मुर्दों को भी कब्र से निकाल लिया जाता है।

कुछ माह पूर्व मुंबई में फिल्म ‘जहरीला इंसान’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म में मौसमी चटर्जी और नीतू सिंह दो अभिनेत्रियां हैं वैसे इस प्रकार की हर फिल्म जिसमें दो हीरो और एक हीरोइन हो या दो हीरोइन और एक हीरो हो तो फिल्म के अंत में एक मार दिया जाता है। यही इस फिल्म में किया गया मौसमी चटर्जी को मार दिया गया। फिल्म का अंत दुखद हो गया। फिल्म पिट गई। अब निर्माता महोदय अंत को सुखद बनाने के लिए फिल्म दोबारा शूट कर रहे हैं।

हाल ही में प्रदर्शित फिल्म ‘दो झूठ’ का अंत भी संशोधित हुआ है। पहले इस फिल्म के अंत में प्राण की मृत्यु दिखाई गई थी परंतु दर्शकों को यह अरूचिकर लगा। इसलिए इस रोल को ही बदल देना पड़ा। प्राण साहब अब इस फिल्म के अंत में जीवित दिखाई दिए।

कुछ वर्ष पूर्व अनिल धवन, अमिताभ बच्चन, तनूजा और फरीदा जलाल की एक फिल्म प्रदर्शित हुई थी ‘प्यार की कहानी’ इस फिल्म की नायिका तनूजा एक भोली-भाली मासूम-सी युवती है जो एक बदमाश की चालों की शिकार है। वह उसकी चाल नहीं समझ पाती। उसका भाई भी उसे बुरी लड़की समझ कर घर छोड़ कर भाग जाता है। जिस किसी से भी उसके विवाह की बात चलती है, बदमाश अपनी टांग अड़ा कर शादी की बात खत्म करवा देता है। एक बार फिल्म के नायक का रिश्ता इस घर में तय होता है। वह बदमाशो की बातों में नहीं आता। वह भोली-भाली नायिका पर फिदा हो जाता है विवाह के लिए राजी हो जाता है। पर बदमाशों द्वारा सताई नायिका अपने आपको खत्म कर डालती है। वह ज़हर खा लेती है। नायक उसके घर पहुंचता है मरते हुए उसे मंगल सूत्र पहनाता है। उसे अपना लेता है। वैसे ट्रेजिडी फिल्मों की कहानी तो यही खत्म हो जाती है। कहानी का अंत जानदार हो जाता यदि फिल्म नायिका की मौत पर ही समाप्त हो जाती, पर नहीं निर्माता ने उसी मौत को जीवन में बदल दिया। और अंत में एक रील और जोड़कर नायिका को जीवित कर दिया।

फिल्म ‘बहारों के सपने’ में हीरो राजेश खन्ना को अंत में कुछ व्यक्तियों द्वारा गोलियां मार दी जाती हैं। उसे भीड़ में दबा दिया जाता है। वही उसकी मृत्यु हो जाती है। यही फिल्म की मूल संवेदना थी। यह सशक्त अंत था। पर नहीं, दूसरे शहरों में जब फिल्म प्रदर्शित हुई तो राजेश खन्ना को अंत में जीवित दिखाया गया और पोस्टरों इत्यादि पर लिखा गया अपने प्रिय कलाकार को जीवित देखिए। कहना गलत न होगा कि कलाकारों के जीवित हो उठने के कारण ही फिल्म फ्लॉप हो गई मर-सी गई।

फिल्म ‘बड़ी दीदी’ में नंदा और जितेन्द्र की जोड़ी ने काम किया था। फिल्म की पहली ही रीलों में जितेन्द्र युद्ध के मोर्चे पर मारा जाता है। नन्दा अकेली परिवार का बोझ उठाये परिवार को पालती है। दुख मुसीबतें चुपचाप झेलती है अंत में, परिवार का काम निपटाने के बाद जब उसकी दूसरी शादी होने लगती है तो जितेन्द्र जीवित वापस आ जाता है उसके जीवित दिखाने की रील भी बाद में फिल्माई गई थी। यही अंतिम रील है जो फिल्म के फ्लॉप होने का कारण बनी। जितेन्द्र तो जीवित हो गया परंतु फिल्म मर गई।

फिल्म ‘हसीना मान जायेगी’ में शशिकपूर का डबल रोल था। इस फिल्म में एक की मृत्यु हो जाती है मगर अंत में कोर्ट के दृश्य में वह हाजिर हो जाता है।

इसी प्रकार और भी कई फिल्में हैं जिनमें निर्माता को मजबूरन मरे हुओं को जिंदा दिखाना पड़ा। अब आप ही जरा इस पर सोचिए कि क्या फिल्म का अंत दुखद होना सचमुच दुखदाई है क्या। निर्माता को गड़े मुर्दे उखाड़ने चाहिए? क्या वस्तुत: दर्शक वर्ग की यह मांग है या निर्माताओं का अपना वहम?


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Mayapuri

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