मुश्ताक जलीली की कहानी सुनाने की बेचैनी

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मायापुरी अंक 47,1975

सन 1950 की बात है निर्माता निर्देशक ए.आर करदार की फिल्म ‘दास्तान’ (सुरैया, राजकपूर, वीना) की सफलता ने ए.आर कारदार की शोहरत में चार चांद लगा दिये थे। यह देखकर हैदराबाद से एक नौजवान कहानीकार बनने के लिए मुंबई आया। और कारदार को कहानी सुनाने कारदार स्टूडियो जा पहुंचा। लेकिन गेट पर तैनात गोरखे ने अंदर घुसने ही न दिया। लेकिन नौजवान किसी तरह नज़र बचाकर अंदर घुसने में सफल तो हो ही गया, मगर गोरखे की नज़र उस पर पड़ ही गई। बस फिर क्या था नौजवान आगे-आगे और गोरखा पीछे पीछे! स्टूडियो के लॉन में बैठे एक साहब ने यह तमाशा देखा कि एक शरीफ नौजवान जो कि शेरवानी पहने हुए है गोरखा का शिकार बन रहा है। उन्होंने गोरखा को डांटकर वापस भगा दिया और नौजवान को जो सूरत से ही शरीफ और खानदानी मालूम होता था अपने पास बुलाया। और पूछा क्या बात है?

मैं कारदार साहब से मिलना चाहता हूं नौजवान ने कहा।

किसलिए?

जी मैं उन्हें कहानी सुनाना चाहता हूं नौजवान ने बताया।

ठीक है परसों आजाइयेगा

पर नौजवान निश्चित समय पर पहुंचा। कारदार साहब के दफ्तर में पहुंचने के बाद नौजवान ने देखा वही साहब कुर्सी पर बिराजे हुए हैं।

हां, तो आप कहानी सुनाना चाहते हैं? इतना कहकर वह साहब उठे और तीन अलमारियां खोलीं और कहा आप देखते हैं इनमें क्या रखा है?

जी कागजात आदि रखे हैं नौजवान ने कहा।

जी, ये कागजात नहीं कहानियों की फाईल हैं। अभी तक इनका नंबर नहीं आया और कई कहानी कैसे ले लूं? कारदार ने नौजवान को निराश करते हुए कहा।

नौजवान ने सुना और खून के घूंट पीकर रह गया कि मगर वह ही जवाब देना था तो दो दिन पहले ही मना किया जा सकता था लेकिन फिर भी उसने बड़ी हिम्मत से पूछा साहित्य और कला की कोई सीमा है? क्या कोई यह कह सकता है कि फलां को रचना उच्च साहित्य की आखिरी कला कृति है। और इसके बाद साहित्य नहीं रचा जाएगा?

साहित्य की कोई सीमा नहीं है कारदार साहिब ने कहा।

तो फिर आप यह कैसे कह सकते हो कि जो कहानी लाया हूं वह भी ऐसी ही होगी, हो सकता है मेरी कहानी में इन सब से अलग कोई अनोखी बात कहे। इतना कहकर नौजवान ने कारदार साहब को लाजबाव कर दिया।

कारदार साहब ने हार मानकर कहा। आईए, बैठिए सुनाईये कहानी नौजवान ने कहानी सुनाई लेकिन वह कहानी कारदार साहब को पसंद न आई लेकिन उन्होंने नौजवान की योग्यता परख ली। और उन्होनें नौजवान को अपनी स्टोरी विभाग में रख लिया जहां दो तीन वर्ष तक नौजवान ने स्टोरी विभाग में काम किया।

आज कारदार साहब तो फिल्मों से लगभग सन्यास ले चुके हैं। इस समय वह सिर्फ मेरे सरताज की डायरेक्शन कर रहे हैं। लेकिन वह नौजवान आज सुप्रसिद्ध कलाकार बन गया है उस नौजवान का नाम मुश्ताक जलीली है। शीघ्र ही उनकी फिल्म एक ‘महल हो सपनों’ प्रदर्शित हो रही है। और ‘दो मुसाफिर’ निर्माणधीन है। ‘एक फूल’ दो माली ‘धड़कन’ ‘प्यार का रिश्ता’ ‘अनोखी अदा’‘जिंदगी का नशा’ उनकी लिखी हुई कुछ फिल्में हैं।


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Mayapuri

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