मेरे किरदार विष्णु को काफी पसंद किया जा रहा है- वेद  थापर

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Ved Thappar

बहुमुखी प्रतिभा के धनी वेद थापर बिना किसी शोर शराबे के चुपचाप अपने काम में व्यस्त रहते हैं। वह मशहूर होमियोपैथ डाॅक्टर, अभिनेता, संगीतकार, गायक, गीतकार होने के साथ साथ बच्चों को  डिजास्टर मैनेजमेंट की ट्रेनिंग भी देते रहते हैं। अब तक वह बीस हजार से अधिक बच्चों को इसकी ट्रेनिंग दे चुके हैं। वह बच्चों को ट्रेनिंग देने का नेेक काम निशुल्क करते हैं।

शान्तिस्वरुप त्रिपाठी

मेरठ, उत्तर प्रदेश निवासी वेद थापर जब मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थे, उसी वक्त उन्हें पूरे देश से आए पांच हजार लड़के व लड़कियों के बीच ‘इंपॉ टैलेंट कॉन्टेस्ट’ में चार कलाकारों में उनका भी चयन हुआ था कुछ समय बाद पत्र भेजकर ‘राजश्री प्रोडक्शन ’ वालों ने उन्हें बुलाया था, तब से अब तक वह कई फिल्मो, सीरियल आदि मेंअभिनय कर चुके है, लोग उन्हें सीरियल ‘‘राजा और रंछो’’ से सर्वाधिक पहचानते हैं. इन दिनों वह आस्था वर्मा निर्देशित फिल्म ‘‘द लास्ट राइट्स’’ को लेकर चर्चा में हैं।

प्रस्तुत है वेद थापर से ‘‘मायापुरी’’ के लिए हुई एक्सक्लूसिव बातचीत के अंश
ved thapar
इन दिनों आपकी एक फिल्म ‘द लास्ट राइट्स’ काफी चर्चा में हैं.इस फिल्म के संदर्भ में आप क्या कहना चाहेंगे?
जी हाँ! इस फिल्म को ग्यारह अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में पुरस्कृत किया जा चुका है.इस फिल्म का निर्माण, लेखन व निर्देशन आस्था वर्मा ने किया है, जिनके पिता अनिल वर्मा मूलतः भारतीय यानीकि करनाल, हरियाणा के हैं।
पर पहले वह दुबई में नौकरी कर रहे थे, अब दुबई में उनका व्यवसाय है.आस्था ने न्यूयाॅर्क अकादमी से फिल्म निर्देशन की पढ़ाई करने के बाद औरतों के हक की बात करने वाली फिल्म ‘द लास्ट राइट्स’ का लेखन करने के बाद इसका निर्देशन कर रही थी. यॅूं तो वह लाॅस एंजिल्स में रहती हैं। पर उन्हें अपनी इस फिल्म की विषय वस्तु के अनुरूप इसे बनारस में फिल्माना था।
उन्हें इस फिल्म के अहम किरदार यानी कि काशी के चाचा विष्णु के किरदार के लिए सशक्त कलाकार की तलाश थी. कई कलाकारों से उन्होंने बात की, पर उन्हें किरदार के अनुरूप कलाकार नहीं मिल रहा था। अंततः किसी के माध्यम से उन्होंने मुझसे संपर्क किया।
वास्तव में यह कहानी बनारस के ही एक पंडित/ब्राह्मण परिवार की कहानी है. यह परिवार जीवन में उन्ही संस्कारों का पालन करते हैं, जो कि सदियों से चले आ रहे हैं. इन संस्कारों में लड़के व लड़कियों के बीच काफी भेदभाव है।
इस तरह के परिवारों में जब तक माता पिता नहीं कहेंगे, तब तक लड़की अपनी नजरें भी नहीं उठा सकती, लड़की को अपने माता पिता या परिवार के किसी न किसी पुरूष के इशारे पर नाचना पड़ता है।
यह कहानी काशी की है, जो कि विदेश में पढ़ रही है, उसे वहां पर पता चलता है कि उसकी दादी की मृत्यु हो गयी है. काशी वापस बनारस अपने घर आकर दादी के दाह संस्कार करने की बात कहती हैं।
उसका चाचा ही नहीं पूरा समाज उसके विरूद्ध खड़ा हो जाता है. समाज के लोगों का कहना है कि हमारे धर्म के अनुसार लड़की दाह संस्कार कर्म नहीं कर सकती. इसलिए आप ऐसा नहीं कर सकती। अंत में काशी का चाचा विष्णु उसे ऐसा करने की इजाजत दे देता है, जबकि पहले वही विरोध कर रहा था।
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आप अपने किरदार के संदर्भ में क्या कहना चाहेंगे?
यह काफी चुनौतीपूर्ण किरदार है. इसमें मैंने काशी के चाचा विष्णु का किरदार निभाया है, जो कि सबसे पहले काशी द्वारा अपनी दादी के दाह संस्कार करने का विरोध करता है, पर अंततः वही इसकी इजाजत भी देता है. विष्णु विलेन नहीं है, मगर वह वाराणसी का ब्राम्हण/पंडित है और धार्मिक संस्कारों से बंधा हुआ हैं।
विष्णु बड़े टेढे़ पंडित है. खुद को धर्म व पुराणों आदि का ज्ञाता मानते हैं. उनका काम करने का तरीका यह  है कि हमने जो कह दिया, वही अंतिम सत्य है।
वह कहता है-‘हम जे कहि रहन वही करा.’ पर जब विष्णु हाथ में अग्नि की लकड़ी उठा लेता है और कंधे में मटकी भी रख लेता है, तब काशी मेरी मां यानी कि अपनी दादी का पत्र दिखाती है, तब विष्णु सोचता है कि जब मेरी मां की यह इच्छा है तो मैं रोकने वाला कौन होता है।
तब विष्णु इस बात से सहमत हो जाता है कि समय के साथ बदलाव आना चाहिए और लड़की भी दाह संस्कार कर सकती है.क्योंकि वेदों में कहीं नहीं लिखा है कि एक लड़की दाह संस्कार  नहीं कर सकती इसमें मेरे विरोध के जो क्षण हैं, उन्हें निर्देशक आस्था वर्मा ने बहुत लाजवाब लिखा है।
इस किरदार को निभाने से पहले आपको किसी खास तरह की तैयारी करनी पड़ी?
यूँ तो मैं भी उत्तर भारत का रहने वाला हूँ. इसके बावजूद मुझे बनारसी लहजे की भाषा सीखनी पड़ी. मेरठ में खड़ी भाषा बोली जाती है. मगर उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद के बाद धीरे-धीरे खड़ी बोली कम बोली जाती है, भाषा का लहजा बदलता रहता है और बनारस में काफी बदल जाता है।
भाषा में एक मिठास आ जाती है. बनारस का स्थानीय उच्चारण कमाल का है. मैंने सबसे पहले पटकथा पढ़कर अपने किरदार की बारीकियों को समझा. उसके बाद भाषा पर काम किया. जब मैं बनारस में शूटिंग कर रहा था, तो मेरी भाषा सुनकर वहां के कुछ स्थानीय लोगों ने मुझसे पूछ लिया कि मैं बनारस में कहाँ रहता हूं.तब मैंने उनसे कहा कि मैं तो मुंबई में रहता हूँ।
मगर अभिनेता हूं,तो भाषा के लहजे को पकड़ लिया. हमने बनारस में गंगा नदी के शमशान घाटों पर शूटिंग की।
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अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहो में किस तरह की प्रतिक्रियाएं मिली?
इस फिल्म को टोपाज इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल और इटली के रीवर टू रीवर फ्लोरेंस फिल्म फेस्टिवल में काफी सराहा गया. फिल्म की मुख्य प्रोटोगाॅनिस्ट (जो कि पूरे देश की लड़कियों के लिए लड़ रही है) काशी (कनुप्रिया) के अलावा लोगों ने मेरे किरदार की काफी तारीफ की. सभी ने कहा कि उन्हें विष्णु का किरदार काफी पसंद आया।
लेखक व निर्देशक आस्था वर्मा को लेकर क्या कहेंगी?
आस्था वर्मा उम्र में अभी छोटी हैं, मगर इस सत्रह मिनट की फिल्म का निर्देशन करने के साथ-साथ लेखन भी किया है और बहुत जबरदस्त संवाद लिखे हैं. मैं तो उनकी लेखनी का कायल हो गया. आस्था वर्मा ने यूं ही इस फिल्म का लेखन व निर्देशन नहीं किया है. बल्कि उसने इस विषय पर काफी गहन अध्ययन किया है।
वह बनारस जाकर पंडितों व पुजारियों के अलावा आम नागरिको से भी मिली, उनसे इस मसले पर काफी बातचीत की. सारे तथ्य इकट्ठे किए.उसने बनारस के कल्चर को समझा.उसके बाद इस फिल्म की कहानी व पटकथा पर काम किया. फिर एक कसी हुई पटकथा का उसने बनारस में ही फिल्मांकन किया।
जब आप लोग बनारस के शमशान घाट पर शूटिंग करने पहुँचे,तो किस तरह की समस्याएं आयी थी?
जब हम पहुँचे तो वहां पर पंडों /पुजारियों ने इसका विरोध किया था. तब हमने उन्हें समझाया कि यहां फिल्म की शूटिंग कर रहे हैं, तो वह वहां पर खड़े रहकर अंत तक देखते रहे. पर उन्हें औरतों की मौजूदगी पर घोर एतराज था।
उनका तर्क था कि हमारे वेदों के अनुसार लड़की या औरत ष्मषान घाट नहीं आ सकती और न ही दाह संस्कार कर्म को अंजाम दे सकती है. उन्होंने कहा कि यह वेदों के विरूद्ध है। तो हम लोगों ने कहा कि आप हमें वेद या पुराण में कहीं भी दिखा दीजिए, कहीं न कहीं है. यह तो सभी पंडितों ने एक ढकोसला बना रखा है. हमने उनसे कहा कि वेद नहीं, आप पुराण में ही बता दीजिए।
वेदों में तो बदलाव नहीं किए गए, मगर पुराणों में तो कई बार बदलाव किया गया. समय के साथ पुराणो में बदलाव होते रहे हैं। फिर भी यह बात पुराण में भी नहीं लिखी है. जबकि वेदों में कोई बदलाव नहीं किया गया. उसकी एक एक रिचा महत्व है।

Ved thappar

आप तो कई नाटकों में अभिनय करते रहे हैं?
जी हाॅ! मैंने दिनेश ठाकुर के साथ ‘कन्यादान’नामक नाटक के 1286 शो किए थे.उसके बाद ‘जाने नहीं दूंगी’, ‘यू-ट्यूब सी-ट्यूब दा कॉन्टेस्ट’, ‘तुगलक’, ‘अदल बदल’ सहित करीब 36 नाटको में अभिनय किया. मैंने दिनेष ठाकुर के साथ पूरे विश्व में हिंदी, इंग्लिश व उर्दू भाषा के कई नाटकों के षो किए. फिर दिनेश जी के देहांत के बाद हमारा रास्ता अलग हो गया और हम टीवी में व्यस्त हो गए. कुछ फिल्में की।
इतना ही नहीं जब जीटीवी पर ‘क्लोजअप अंताक्षरी’ आता था, जिसमें अनु कपूर जी एंकर थे. मगर रेडियो पर जो क्लोज अप अंताक्षरी आता था, उसमें मैं एंकर करता हूं. ईश्वर व मेरे पिताजी की कृपा से मैं बहुत अच्छा सिंगर भी हूं. मैं कुछ इंस्ट्रूमेंट भी बजाता हूं।
कौन-कौन से इंस्ट्रूमेंट बजाते हैं?
मैं डफली, चाम, ड्रम सहित कई वाद्ययंत्र बजाता हॅूं. मैं खुद गीत लिखता भी हूं. मेरा लिखा हुआ एक गीत कैलाश खेर जी ने गाया है. एक गीत शान ने गाया है. अभी मिश्र बंधु गाने वाले हैं. मेरे पिता जी भी क्लासिकल सिंगर थे. मैंने पेशावर घराने के पंडित राम प्रकाश थापर से संगीत की ट्रेनिंग ली थी।
इस वक्त नई गतिविधियां क्या हैं?
मेरी नई फिल्म ‘सचिन द अल्टीमेट विनर’ पहले अप्रैल में आने वाली थी. मगर लाॅक डाउन की वजह से रूक गयी थी. अब यह फिल्म जल्द ही प्रदर्शित होने वाली है. यह फिल्म एक ओटीटी प्लेटफार्म पर आने वाली है. द्वीप राज कोचर निर्देशित यह फिल्म क्रिकेट पर है. इसमें मेरी और ग्यारह वर्षीय बालक ध्रुव राज की ही मुख्य भूमिका है. यह एक गरीब लड़के और उसके कोच की कहानी है. आप इस फिल्म को गुरू शिष्य परंपरा की कथानक वाली फिल्म कह सकते हैं।
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