महारथियों  के साथ मैंने खेली थी  होली कभी – अली पीटर जॉन

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नटराज स्टूडियो मेरे दूसरे घर की तरह था और जो लोग नटराज स्टूडियो पर राज करते थे, वे मेरे लिए किसी महाकाव्य के पात्र की तरह थे। यह पहला रियल स्टूडियो था जिसमे मैंने प्रवेश किया था और जो मेरे जीवन का हिस्सा बन गया था! – अली पीटर जॉन

यह नटराज स्टूडियो के महारथियों को जानने के लिए मेरे लिए भगवान के से मिले आशीर्वाद की तरह था। स्टूडियो की शुरुआत में शक्ति सामंत का ऑफिस था जिसने एक स्कूल टीचर के रूप में अपना जीवन शुरू किया था और भारत के अग्रणी फिल्म निर्माताओं में से एक बन गए थे। आगे बढ़ने के साथ, डाॅ. रामानंद सागर का ऑफिस था, जिन्होंने एक कहानीकार और पत्रकार के रूप में अपनी शुरुआत की थी और रामायण और अन्य प्रमुख और छोटे महाकाव्यों को फिर से बनाने के लिए पहचाने जाने लगे थे। आगे सागर का ऑफिस था बंग के सामने, आत्मा राम का ऑफिस था, जो गुरु दत्त के छोटे भाई थे, जो अपने भाई की उत्कृष्टता की चोटी तक कभी भी नहीं पहुंच पाए थे। आत्माराम के ऑफिस के बगल में प्रमोद चक्रवर्ती का ऑफिस था, जो फिल्म्स डिवीजन में टाइपिस्ट थे और अपनी पहली कुछ फिल्मों के साथ उन्होंने खुद को एक व्यावसायिक हिंदी फिल्म निर्माता के रूप में स्थापित किया था, जिनकी सफलता का ग्राफ कोई भी आसानी से नहीं छू सका। और दूसरे छोर पर फकीरचंद मेहरा का बड़ा सा ऑफिस था जो मेवों के विक्रेता के रूप में अफगानिस्तान से मुंबई आये थे जहा उन्होंने न केवल बड़ी फिल्में बनाई थीं, बल्कि शम्मी कपूर के साथ साझेदारी में मुंबई में ‘मिनर्वा’ और दिल्ली में ‘गोलचा’ जैसे सिनेमाघर भी बनाए थे!

वे सभी एक एचीवर्स थे और मैं तब तक एक संघर्षशील पत्रकार भी नहीं था, लेकिन जैसा कि भाग्य या भगवान ने लिखा था, मैं जल्द ही उन सभी के करीब था और मैं उनके सभी अच्छे समय और बुरे समय का अहम हिस्सा बन गया था।

यह घनिष्ठता (क्लोजनेस) ही थी जिसने उन्हें मुझे वहाँ की सभी पार्टियों, इवेंट्स और जन्मदिनों पर आमंत्रित किया था। और होली भी उनमें से एक थी जिसपर मुझे आमंत्रित किया जाता था।

सभी पांच साथी और दोस्त होली मनाने के लिए एक साथ आए। समारोह की शुरुआत सुबह 11 बजे रामानंद सागर के साथ पूजा संपन्न करने वाले पुजारी के रूप में हुई। सभी साझेदारों ने अपने परिवार और दोस्तों को इंडस्ट्री में लाने के लिए और उनके इस समारोहों का हिस्सा बनने के लिए इसे एक पॉइंट बनाया था। उनकी होली पार्टी और बहुत कम रंग और बहुत कम नाचने या पीने के साथ एक उनमे एक अच्छाई की भावना थी, हालांकि सभी मेहमानों के लिए भाँग की व्यवसता थी। मुख्य आकर्षण रामानंद सागर के घर से आया भोजन था जो शाकाहारी और सबसे अच्छा भोजन था। उत्सव दोपहर 3 बजे तक जारी रहा और बाद में वह सभी अपने घरों के लिए रवाना हो गए, जहां उनके पास दूसरे दौर का जश्न भी था जो अगले दिन के शुरुआती घंटों तक चला था।

मेरे पास होली की ऐसी कई यादें हैं इस महारथियों के साथ की, लेकिन एक बात मेरे दिमाग में आज भी ताजा है। जब एक विशाल इम्पोर्टेड कार गेट में प्रवेश कर रही थी और उसमें से जीन्स और रंगीन टॉप पहने एक लंबी महिला निकली थी। और वहाँ मौजूद उन सभी महारथियों ने उन्हें घेर लिया था और उनकी सुंदरता के लिए उनकी काफी प्रशंसा करते रहे थे। और यह देख ऐसा लग रहा था कि वह उन सभी महारथियों को जानती है जो उनकी कार में बेठने तक उन्हें देखते रहे थे। मैं उस पल चकरा गया और जब वह महिला वहा से चली गई थी, क्योंकि मैंने आम तौर पर उन महारथियों से पूछा कि वह महिला कौन थी और वे सभी मेरी ओर ऐसे देख रहे थे जैसे की मैं कोई बहुत बड़ा बेवकूफ हूं, और फिर शक्ति सामंत ने मुझसे कहा, “अरे बेवकूफ, 18 लाख की हीरोइन तेरे बगल में खड़ी होती हैं और तू उसे पहचानती भी नहीं। वो हेमा मालिनी थी।” उस एक घटना ने मुझे इतना जटिल बना दिया कि मुझे अब भी सबसे लोकप्रिय और प्रसिद्ध एक्ट्रेस को पहचानना मुश्किल हो जाता हैं, खासकर जब वे अपने मेकअप में नहीं होतीं, फिर चाहे वह हेमा मालिनी हों या दीपिका पादुकोण या आलिया भट्ट।

होली आएगी और जाएगी, लेकिन क्या ऐसे फिल्म जगत के महारथी वापस आएंगे?

अनु-छवि शर्मा

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