‘‘पवित्र सुगंधा के साथ साथ सेंसुअसनेस का मिश्रण दिखाना चुनौती थी.’’ -नंदना सेन

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मूलतः बंगाली, हाॅरवर्ड युनिवर्सिटी में पढ़ी लिखी, हूर अर्थ शास्त्री अमत्र्य सेन की बेटी नंदना सेन ने बतौर अदाकारा अपनी एक अलग पहचान बना रखी है. लगभग दो साल पहले उनकी एक बंगला फिल्म ‘‘आॅटोग्राफ’’ को जबरदस्त सफलता मिली थी, जिसमें उन्होंने अभिनय करने के साथ साथ इसकी कहानी भी लिखी थी. लेकिन हाल ही में वह उनकी फिल्म ‘‘रंग रसिया’’ रिलीज हुई, जो कि पाॅच साल पहले बनी थी, मगर रिलीज नहीं हो पा रही थी.

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अमरीका में रहते हुए आप हिंदी फिल्मों को मिस करती हैं या नहीं?
-मुझे हिंदी फिल्में देखना पसंद है.पर हिंदी फिल्में नहीं कर रही हॅू. क्योंकि समय नहीं मिल रहा है. पर मैं मुंबई और मुंबई के अपने दोस्तों को ‘मिस’ करती हॅूं. मैं हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को नहीं, मगर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के कुछ लोगों को ‘मिस’ करती हूँ
मेहनत, लगन के साथ फिल्म में अभिनय किया जाए. पर फिल्म की रिलीज लंबे समय के लिए रूक जाए, तब एक कलाकार के तौर पर क्या गुजरती है? क्या अहसास होते हैं?
-जब हम प्यार और पूरे कंविंषन के साथ फिल्म बनाते हैं, कमिटमेंट के साथ, पैशन के साथ फिल्म बनाते हैं, तो हम सभी को इस फिल्म के रिलीज होने का बेसब्री से इंतजार था. मुझे लगता है कि अब यह सही समय पर रिलीज हो रही है. दीवाली और सेलिब्रेशन का समय है. यह नई शुरुआत है. यह वह समय है, जहां हम जिंदगी, रंग, जीत आदि को सेलीब्रेट करते हैं. फिल्म भी सेलिब्रेशन की बात करती है. यह बहुत ही मंगल शुभ मुहूर्त है, हमारी फिल्म के रिलीज के लिए. जिस तरह दीपावली की रोशनी और रंगोली के रंगों से हम जिंदगी का उत्सव मनाते हैं, उसी तरह ‘रंग रसिया’ में जीवन की आजादी का उत्सव मनाया गया है.

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यदि फिल्म ‘‘रंगरसिया’’ के रिलीज में पांच साल की देरी न हुई होती, तो क्या आज आपका कैरियर किसी अन्य मोड़ पर होता?
-मेरे कैरियर में चुनाव हमेशा अलग रहे हैं. मुझे शुरू से पता था कि मैं पूरे समय सिर्फ भारत मे नहीं रह सकती. इसलिए मैं शुरू से अपनी जिंदगी के समय को विभाजित करके चल रही थी. मैं पहले भी मुंबई के अलावा लंदन,न्यूयार्क,केप टाउन या ए ले जाकर छोटी या बड़ी फिल्म करती रही हूँ.मुझे कन्विशनल बालीवुड कैरियर बनाना ही नहीं था. मेरा कैरियर वही बना है, जैसा कि मैं चयन करती रही.
आपने जो फिल्में की हैं, उनमें ‘रंग रसिया’ को कहाॅं रखेंगी?
-बहुत अलग और एक्स्ट्रा आर्डीनरी फिल्म है.पूरे विश्व में इस तरह की फिल्म अब तक बनी नहीं है. मैंने इस फिल्म की हर बात से सहमत हूँ.यह ट्रू विजीनरी राजा रवि वर्मा की सत्य कथा है. उनकी वजह से ही 100 साल पहले लाखों दलितों को अपने ईश्वर या देवी देवता की पूजा करने के लिए तस्वीर मुहैया हो सकी,जिन्हें मंदिर के अंदर घुसने को नहीं मिलता था. उन्होंने हर वर्ग के लिए ईश्वर को डेमोक्रेटाइज किया. इसी के साथ इसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नारी उत्थान की भी बात की गयी है. तो वहीं हिंसा व धार्मिक कट्टरता के खिलाफ बात की गयी है. इन सभी मुद्दों को में इससे पहले उन फिल्मों में भी उठाती रही हूँ,जिनमें मैंने अभिनय किया. यह युनिक फिल्म के साथ साथ उन माॅरल काॅंशस की बात करती है,जो कि मेरी निजी जिंदगी के माॅरल काॅंशस है.

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फिल्म‘‘रंग रसिया’’ में आपका पात्र सुगंधा क्या है?
-मेरी नज़रों में सुगंधा तो कामुकता और पारलौकिकता का खूबसूरत मिश्रण है. सुगंधा ने राजा रवि वर्मा के लिए एक कलाकार के रूप में सीता,शकुंतला और द्रौपदी का किरदार निभाया. लेकिन फिल्म में उसकी अपनी यात्रा भी सीता, द्रौपदी और शकुंतला की यात्रा का आइना ही है.सीता की तरह उसके अस्तित्व को भी चुनौती दी गयी. द्रौपदी की तरह उसका भी अपमान हुआ. सुगंधा का पात्र एक भारतीय क्लासिकल पात्र है.
‘‘सुगंधा’’का किरदार निभाना आपके लिए कितना कठिन रहा?
-बहुत कठिन रहा. इस किरदार को निभाने के लिए मुझे 19 वीं सदी की देवदासियों पर रिसर्च करना पड़ा. राजा रवि वर्मा को और अधिक समझने की जरुरत महसूस हुई. सात किलो वजन बढ़ाया था. नववारी साड़ी पहनना सीखा था. इस किरदार को निभाने की खूबसूरत चुनौती यह रही कि अंदर से पवित्र सुगंधा के साथ साथ सेंसुअसनेस का मिश्रण भी दिखाना था. मैंने इस किरदार को निभया, क्योंकि मैं राजा रवि वर्मा की बहुत बड़ी फैन् रही हूँ
राजा रवि वर्मा का फैन होने की कोई खास वजह थी?
-मुझे पता था कि उन्होंने पहली बार हिंदी देवी देवताओं की पेंटिंग्स बनाकर उन लोगों तक पहुंचायी,जिन्हें पूजा करने के लिए मंदिर जाने की इजाजत नहीं थी. उन्होंने जाति व धर्म की सीमा रेखा को तोड़ने का काम किया. उन्होंने भगवान को हर भारतीय के घर तक पहुंचाया. कला को आम लोगों तक पहुंचाया. उन्होंने औरतों के शरीर के इर्द गिर्द पेंटिंग से साड़ी को लपेटा. आज हमारी माॅडर्न औरतें जिस ढंग की साड़ी पहनती हैं,वह राजा रवि वर्मा की ही देन है.

आप बड़े व सुशिक्षित परिवार से है. तो आप हमारे धर्म में ऐतिहासिक दृष्टिकोण से औरतों को कहां पाती हैं?
-बहुत महत्वपूर्ण सवाल है.मैं सोचती हूँ कि हमारे धर्म में औरतों का हमेशा उच्च दर्जा दिया गया. औरतों को समाज में विविधता के साथ पेश किया गया. यदि आप यह देखेंगे कि हजारों साल पहले सीता, द्रौपदी और शकुन्तला के साथ क्या हुआ था. 110 साल पहले सुगंधा के साथ क्या हुआ था और आज की औरतों के साथ जो कुछ हो रहा है. तो आपको कुछ भी फर्क नजर नहीं आएगा. जबकि कानून बदल रहा है,पर कानून का पालन नहीं हो रहा है.परिणामतः

आपको नहीं लगता कि पेंटिंग्स में संसुआलिटी/ सेक्सुआलिटी का चित्रण करना आसान होता है. इस बात को लेकर पेंटर पर हमले करना भी आसान होता है?
-यह धर्म से जुड़ा मसला है. ऐसे हमले कभी भी कला के नाम पर नहीं बल्कि पोलीटिकली हमले होते हैं. धर्म की आड़ लेकर कुछ कट्टरपंथी इस तरह के हमले करते हैं.पेंटर हो, फिल्मकार हो या कलाकार हो, या उपन्यासकार हों या फोटोग्राफर हों, आपको इस मसले पर गंभीरता के साथ और सावधानी पूर्वक सोचना पड़ेगा. मेरे लिए फिल्म ‘‘रंग रसिया’’ में अभिनय करना एक जिम्मेदारी का निर्वाह करना रहा. नारी शरीर को अब्जेक्ट या नारी को पदार्थ के रूप में पेश करते समय काफी सावधानी बरतनी पड़ी. नारी की मानवता का भी ध्यान रखना था. कहीं भी वह अशलील न होने पाए, यह भी ख्याल रखना था. आप नारी या पुरूष के चरित्र को पूरी डिग्निटी के साथ पेश करते हैं, तो उसमें कोई बुराई नही है.पेंटिंग हो या फिल्म या उपन्यास हो, नारी के आब्जेक्ट न बनाए.

इन दिनों क्या खास कर रही हैं?
-लेखन चल रहा है. बच्चों के लिए कुछ किताबे लिखी हैं, जो कि बहुत जल्द प्रकाषित होंगी. एक फिल्म की स्क्रिप्ट भी लिखी है.

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Mayapuri