मूवी रिव्यू: अदम्य साहस और अपने काम के प्रति ईमानदारी दर्शाने वाली फिल्म है “नीरजा”

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रेटिंग*****

“नीरजा” अभी तक आई बायोपिक या रीयल कहानियों पर बनी अच्छी फिल्मों की अगली बेहतरीन कड़ी है। राम माधवानी द्वारा निर्देशित “नीरजा” 5 सितबंर 1986 में कराची में फिलिस्तीनी आतंकवादियो द्वारा प्लेन हाईजैक में उस प्लेन की एयरहोस्टेस नीरजा भनोट की जांबाजी की साहस पूर्ण सच्ची कहानी है।

कहानी

नीरजा एक पापुलर मॉडल और अपने परिवार की लाडली बेटी है जिसे उसकी मां रमा ने दो बेटों के होते हुये काफी मन्नतों से पाया था। नीरजा एयरहोस्टेस बनती है उसे अपने जॉब से बहुत प्यार है। अपनी पहली फ्लाइट जो कराची होती हुई न्ययॉर्क जाने वाली है के लिये वो काफी उत्साहित है। लेकिन कराची में उस 379 लोगों से भरे प्लेन को फिलिस्तीनी आतंकवादियों द्वारा हाइजैक कर लिया जाता है। वहां किस तरह नीरजा अपने अदम्य साहस और वीरता से 359 लोगों की जान बचाते हुये शहीद हो जाती है।

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निर्देशन

राम माधवानी विज्ञापन जगत का काफी बड़ा नाम हैं। आज से चौदह साल पहले उन्होंने फिल्म “लेट्स टॉक” बनाई थी लेकिन वो फिल्म नहीं चल पाई। अब उन्होंने इस फिल्म से जबरदस्त वापसी की है। इसमें कोई दोराय नहीं कि पर्फेक्ट कास्टिंग के तहत उन्होंने भावनाओं से ओत प्रोत दिल को झकझोर देने वाली फिल्म बनाई है। बेशक फिल्म में मनोरजंन न के बराबर है बावजूद इसके नीरजा का राजेश खन्ना की फैन होना और वक्त वक्त पर उनकी फिल्मों के डायलॉग बोलना एक हल्का सा हास्य तो पैदा करता ही है लेकिन उन्हीं डायलॉग्स के तहत वे अच्छा खासा जीवन दर्शन भी दर्शा जाते हैं जैसे जिन्दगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिये और अपनी मां को आखिरी मैसेज भी डायलॉग के द्वारा देना कि पुष्पा आई हेट टीयर्स तो दर्शकों की आंखें भर देता है। चाहे लोकेशन हो या किरदार उन्होंने उन्हें पूरी वास्तविकता प्रदान की है। कहानी कहते हुये उन्होंने नीरजा के वर्तमान और भूत काल को फ्लैशबैक के जरिये इतनी खूबसूरती और कुशलता से दिखाया है कि कहानी की लय कहीं नही टूटती। नीरजा की शादी शुदा जिन्दगी में उसका कुछ अरसा घुटते रहना और फिर अपने पिता द्वारा दी गई नसीहत कि गलती न तो करना और न ही सहना पर अमल करते हुये अपने शादीशुदा जीवन से किनारा कर लेना बहुत ही कम वक्त में बढ़िया तरह से दिखाया है। फिल्म की पटकथा इतनी कसी हुई है कि पूरी फिल्म में कहीं भी झोल नहीं दिखाई देता। फिल्म कहने का स्टाइल बहुत ही असरदार और प्रभावशाली है।

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अभिनय

इसमें काई अतिशयोक्ति नहीं कि ‘नीरजा’ पूरी तरह सोनम कपूर की फिल्म है और उनका अभिनय देखते बनता है लगता है कि नीरजा की आत्मा ने उनके भीतर घुसकर अभिनय किया है। चाहे उसके शादीशुदा जिन्दगी के सीन हो या घर के या फिर प्लेन हाइजैक के उन्होंने भूमिका में घुसकर काम किया है। शबाना आजमी ने नीरजा की मां रमा भनोट को जैसे साक्षात पर्दे पर ला खड़ा किया है। उनके चहरे पर अपनी बेटी खोने का दर्द दर्शक को भावविह्ल कर देता है। नीरजा के पिता को योगेन्द्र टीकू ने प्रभावशाली ढंग से अभिनीत किया है। एक छोटी सी भूमिका में संगीतकार शेख रजवानी भी बढि़या अभिनय कर जाते हैं।

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संगीत

विशाल खुराना का संगीत फिल्म की कहानी का ही एक हिस्सा है इसलिये जीते हैं चल, अंखियां मिलायेंगे डर से जैसे गीत कहानी के साथ साथ चलते हैं ।

क्यों देखें

सच्ची कहानी और अपने कर्तव्य को पूरी ईमानदारी से निभाने वाली अदम्य साहस का परिचय देती नीरजा को उसके बलिदान के तहत बाद में अशोक चक्र ही नहीं बल्कि पाकिस्तान और अमेरिका में भी वीरता पुरस्कार मिले। उसमें किये गये कमाल के अभिनय और इसकी कहानी के लिये फिल्म को अपने परिवार के साथ देखना न भूले।

 

 


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Mayapuri

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