‘मै किसी की नकल नहीं करता’ लेखक निर्देशक एस.एम.अब्बास

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satta

 

 

मायापुरी अंक 43,1975

भरापूरा शरीर, गोल गोल चमकती गहरी आंखे, आंखो पर ऐनक और ऐनक के साथ चेहरे पर दार्शनिकता की छाप। लंबी नाक, छितेर घुंघराले बाल और बालों की सघनता के बीच मुस्कुराता चेहरा व्यक्तित्व में पुरुषत्व का आकर्षण।

आज से बीस वर्ष पहले इस व्यक्तित्व में अवश्य ही जादू भरा आकर्षण रहा होगा अन्यथा वे फिल्मों में अभिनेता बनने के लिए न आते।

यह एक संयोग की बात है कि राजनीति, दर्शन, कथा साहित्य आदि में अभिरुचि रखने वाले एस.एम.अब्बास उर्दू में एम.ए. करने के बाद भी फिलॉसफर या लेक्चरार बनने की बजाय इलाहाबाद और लखनऊ रंगमंच के प्रसिद्ध अभिनेता बने। यह भी एक संयोग की बात है कि रंगमंच पर अपनी अभिनय कुशलता का रंग जमा कर जब वे फिल्मों में अभिनेता बनने के लिए आये तो फिल्म वालों ने उनकी कल्पनाओं और बौद्धिकता को थाह लेते हुए उन्हें लेखक और निर्देशक बना दिया।

एस.एम.अब्बास सन् 1955 में अभिनेता बनने के लिए मुंबई आये थे और डेढ़ वर्षो के संघर्षो के बाद वे निर्देशक शाहिद लतीफ के सहायक नियुक्त हो गये। शाहिद लतीफ के अतिरिक्त उन्होंने ए.आर.जमींदार और कालीदास के पास भी सहायक के बतौर काम किया। जितना वे फिल्मों में आगे बढ़ना चाहते थे, भाग्य उन्हें और भी अधिक तेजी से आगे बढ़ाने लगा। सहायक बने मुश्किल से कुछ समय बीता होगा कि निर्माता महीत राय शाह की निर्माण संस्था रूप कला पिक्चर्स के लिए ‘परवरिश’ फिल्म लिखने का उन्हें अवसर मिल गया जिसके प्रमुख कलाकार थे राजकपूर, माला सिन्हा और महमूद। यह भी भाग्य का चमत्कार कि उनकी लिखी यह पहली फिल्म हिट हो गई और हिट फिल्म लेखक के रूप में उनका सिक्का चल पड़ा।

एस.एम.अब्बास के फिल्म लेखन की गति उनकी कलम की गत्यात्मकता के साथ बड़ी गतिशील रही है। ‘परवरिश’ के बाद उन्होंने सामाजिक फिल्म लिखी। ‘सट्टा बाजार’ जिसके कलाकार थे स्व.बलराज साहनी और मीना कुमारी। उसके बाद आई ‘क्या यह मुंबई’ यह भी उनके लिए गर्व की बात है कि मुस्लिम होते हुए भी उन्होंने सन 1963 में बाबू भाई मिस्त्री के निर्देशन में बनी ‘कण कण में भगवान जैन’ हिट फिल्म लिखी। उसके बाद ‘मजबूरी’ ‘पूर्णिमा’ ‘सहेली’ ‘हसीना मान जायेगी’ ‘एक हसीना दो दीवाने’ ‘हिम्मत’ ‘कहानी किस्मत की’ ‘पारस’ ‘चोर’ मचाये शोर’ जैसी कामयाब फिल्में लिख कर उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि वे एक ही सांचे में ढली फिल्में लिखने वालों में से नहीं हैं बल्कि विविध विषयों पर विभिन्न प्रकार की फिल्में लिखने की क्षमता रखते हैं।

पिछले दिनों होटल में उनसे मुलाकात हुई तो मैंने उनसे सीधा प्रश्न किया, आप फिल्मों की कहानियां किससे प्रेरित होकर लिखते हैं विदेशी फिल्मों, विदेशी उपन्यासों या

मैं अपना प्रश्न कर भी नही पाया कि अब्बास साहब ने जरा उत्तेजित स्वरों में कहा जनाब, मैं किसी की नकल नही करता, न किसी का आइडिया चुराता हूं। फिल्मों की कहानियों की प्रेरणा के लिए हमारी जिंदगी ही काफी है। आसपास की जिंदगी में, और जिंदगी के आसपास दिल को छूने वाली सैकड़ो कहानियां होती हैं जिनको लेकर फिल्में बनाई जायें तो नई-नई कहानियों का खजाना कभी कम नही होगा।

पर आज तो एक ही पैटर्न पर कहानियां बन रही हैं?” मेरी इस बात पर उन्होंने मुस्कुरा कर कहा कभी-कभी ऐसा भी होता है पर जब दर्शक एक ही तरह की फिल्मों से ऊब जायेंगे तो कहानियों के पैटर्न भी बदलने लगेंगे। मेरा ख्याल है कि फिल्म की कहानी में जितनी अधिक मौलिकता और नवीनता होगी उसकी कामयाबी भी उतनी अधिक होगी।

आप प्रपोजल पर कहानी लिखते हैं या आपकी लिखी कहानियों के प्रपोजल बनते हैं? मेरे इस प्रश्न पर अब्बास साहब कुछ गंभीर हो गये और बोले मैं कहानी लेखक हूं, प्रपोजल मेकर नही है। पर हां, कभी कभी निर्माता-निर्देशक खास किस्म की कहानी चाहते हैं। उनके लिए वैसी ही कहानी लिखता हूं। कहानी लिखने के लिए कहानी नही लिखता बल्कि कहानी लिखता हूं।“

कहानी लिखने के बाद उसके फिल्म निर्माण में यदि निर्देशक या कलाकार हस्ताक्षेप करते हैं तो क्या वह उचित है?”

“अब्बास ने तेज स्वरों में उत्तर दिया नही पर हां मैं पसंद करता हूं कि फाइनल स्क्रिप्ट तैयार होने के पहले निर्देशक के साथ सलाह मशविरा कर लिया जाये और उनके दृष्टिकोण को भी समझ लिया जाय। आखिर फिल्म निर्देशक ही बनाता है और उसकी भी अपनी सीमाएं होती हैं। अपने स्वार्थ के लिए और अपनी भूमिका को बढ़ाने या महत्वपूर्ण बनाने के लिए कलाकारों द्वारा किये जाने वाले हस्तक्षेप को मैं पसंद नही करता।“

अपनी नई फिल्मों की चर्चा करते हुए अब्बास साहब ने बताया कि निर्माणाधीन फिल्मों में उनकी लिखी हुई महत्वपूर्ण फिल्में हैं यश कोहली की ‘कलाबाज’ ’अनूप शर्मा’ की ’एक और एक ग्यारह’ आत्म प्रकाश की ‘जिंदा तथा अर्जुन हिंगोरानी’ मोहन सहगल, के.पी. सिंह और रतन मोहन की आगामी फिल्में। यह मेरा सौभाग्य है कि मैं इस वक्त कुल मिलाकर 22 फिल्में लिख रहा हूं।

मुझे आश्चर्य हुआ कि अधिकाधिक सफल फिल्में लिखने वाले एस.एम.अब्बास अपनी कामयाबी का ढोल क्यो नही पीटते? उनकी जगह अन्य कोई लेखक होता तो फिल्मी दुनिया में न जाने कितना जबरदस्त हंगामा खड़ा कर देता।

अचानक मुझें ख्याल आया कि वह केवल फिल्म लेखक ही नही, निर्देशक भी हैं। मैंने आखिर पूछ ही लिया क्या आप किसी हीरो या हीरोइन की कृपा से निर्देशक बने हैं?”

यह सवाल अब्बास साहब को चुभ गया। वे तिल मिला उठे क्योंकि उनके कथनानुसार उनकी दृष्टि में आत्मसम्मान ही सबसे बड़ी चीज है। अपने निर्देशक बनने के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा यह भी संयोग और भाग्य की बात है मैंने निर्माता महीपत राय शाह के लिए ‘परवरिश’ फिल्म लिखी थी उन्होंने ही मुझें सन् 1960 में ‘श्रीमान सत्यवादी’ फिल्म का निर्देशक भी बना दिया। उस फिल्म के मुख्य कलाकार थे राज कपूर, शकीला, महमूद आदि। ‘श्रीमान सत्यवादी’ के बाद मैंने एक भोजपुरी फिल्म ‘सैया से नेहा लगइबे’ का निर्देशन किया।“

आपके निर्देशक में बनी महत्वपूर्ण फिल्में कौन सी हैं?

इस प्रश्न के उत्तर पर अब्बास साहब ने मुस्कुरा कर कहा मैं अपनी हर फिल्म को चाहे मैं उसका लेखक हूं या निर्देशक महत्वपूर्ण समझता हूं। वैसे मेरे निर्देशन में बनी बॉक्स ऑफिस की दृष्टि से सफल फिल्में ‘हंगामा’ और ‘एक बेचारा’ है जिनमें क्रमश: आज की ग्लैमर हीरोइन जीनत अमान और रेखा ने अपने ग्लैमर्स रूप को काया पलट करते हुए और केवल अंग प्रदर्शन करने की प्रवृति के बदले पहली बार संवेदनशील अभिनय किया है।

अब्बास साहब क्या यह सच है कि ‘हंगामा’ की हीरोइन जीनत अमान से आपकी खटपट हो गयी है?

अब्बास साहब थोड़ी देर के लिए शांत रहे और फिर बड़ी गम्भीरता बोले मेरी फिल्मों में राजकपूर, माला सिन्हा, स्व. बलराज साहनी, स्व. मीना कुमारी, महीपाल, अनिता गुहा, धर्मेन्द्र जीतेन्द्र, शशिकपूर आदि न जाने कितने बड़े छोटे कलाकारों ने कार्य किया है, पर अब तक किसी के साथ किसी बात को लेकर कभी खटपट नही हुई। ‘हंगामा’ में मैंने जीनत को कुशल अभिनेत्रियों के रूप में प्रकट करने के लिए खूब मेहनत की, इमोशनल एक्टिंग करते हुए सही उच्चारण बोल सके तो इसके लिए मैंने बाकायदा उन्हें एक जगह से ट्रेनिंग दी पर लगता है कि वह एहसान को भूल गयी और कुछ कामर्शियल सफलता पाकर मेरे बारे में कुछ अनडाइजेस्टिव कमेंट्स करने लगीं। मुझे यह बात अच्छी नही लगी। वैसे किसी ने मुझें शिकायत नही है और मुझें सभी आर्टिस्टों का पूरा कॉऑपरेशन मिला है।

मैंने फिर पूछा आप लेखक हैं और निर्देशक भी क्या कभी आपके भीतर का लेखक आपके निर्देशक से नही टकराया?”

अब्बास साहब मेरे पास इस सवाल पर मंद ही मंद मुस्काने लगे। फिर बड़े इतमिनान से बोले डुअल पर्सनेलिटिज में क्लैश तो कहीं न कही होगा ही पर दोनों में बड़ा अंडरस्टेडिंग है।“

कैसे?”

 

स्क्रिप्ट तैयार होने तक लेखक हावी रहता है पर स्क्रिप्ट तैयार हो जाने के बाद खामोश हो जाता है पर लेखक को हमेशा यह अहसास रहता है कि वह फिल्म लिख रहा है और निर्देशक को हमेशा यह अहसास रहता है कि वह किसी की लिखी हुई स्क्रिप्ट को फिल्मा रहा है। यदि फिल्म स्क्रिप्ट अपने आप में पूर्ण हो तो कहना।

फिल्म स्क्रिप्ट अपने आप में पूर्ण कब होती है?

जब वह फिल्म की तरह तैयार कर ली गयी हो यानि सीन के साथ शॉट डिवीजन ही, कैमरा प्लेसिंग और एगंल्स बताये गये हों, सैटिंग प्रोप्रटीज़ और करैक्टराइजेशन के बारे में भी उसमें सब कुछ लिखा हुआ हों, कहने का मतलब यह कि स्क्रिप्ट ऐसी हो कि उसके आधार पर सामान्य से सामान्य कैमरामैन या डायरेक्टर उसे हुबहू फिल्मा सकें।

अंत में एस.एम.अब्बास ने अपनी आने वाली फिल्म ‘सेवक’ की चर्चा की जिसके लेखक निर्देशक वही हैं। उस फिल्म के हीरो हैं विनोद खन्ना और नायिका हैं नीतू सिंह। इस फिल्म की कहानी में बताया गया है व्यक्ति परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए अपने आप को कितना बदला डालता है। मानव मन के भीतर का विस्फोट कब तक शांत रहता है और कब ज्वाला मुखी बन जाता है। उसी की कहानी है ‘सेवक’ इस फिल्म में विनोद खन्ना ने नये अंदाज में भूमिका की ही है, पर ग्लैमर हीरोइन नीतू सिंह पहली बार भावुक एवं संवेदनशील अभिनेत्री के रूप में सामने आ रही हैं ‘फरिश्ता या कातिल’ अब्बास साहब के कथानुसार ये दोनों फिल्में जिंदगी को छूने वाली फिल्में हैं।

सच है वह फिल्म ही क्या जो जिंदगी को न छू सके !


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Mayapuri

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