फिल्में आत्म संतुष्टी के लिए नही बिजनेस के लिए बनाई जाती है जितेन्द्र

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jeetendra

 

 

मायापुरी अंक 43,1975

मेहबूब स्टूडियो से हम ‘उम्र कैद’ के दफ्तर को जा ही रहे थे। (‘उम्र कैद’ जीतेन्द्र के बहनोई सोबती की फिल्म है जिसमें उन्होंने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है) कि सैट से निकलते ही जीतेन्द्र से भेंट हो गई। जो आजकल ‘खुश्बू’ को रिलीज़ करने की तैयारियों में व्यस्त हैं।

हमने उनसे पूछा।

निर्माता बनने का आप का अनुभव कैसा रहा ?

बड़ा ही सख्त अनुभव है। दो फिल्में बना कर मैंने देख लिया कि एक फिल्म बनाने में बेचारा निर्माता मानसिक रूप से किस कदर अत्याचार सहन करता है। जीतेन्द्र ने बताया।

बतौर निर्माता अब तक आपने ‘परिचय’ ’खुश्बू’ जैसी नान फार्मूला फिल्में बनाई हैं किंतु सुना है ‘कसम खून की’ यह आम फार्मूला फिल्म की तरह की एक फिल्म है। क्या इतनी जल्दी नई डगर छोड़कर भाग लिये? हमने पूछा।

डगर नही छोडूंगा गुलज़ार के साथ मैं भी एक फिल्म ‘पानी’ एनाउंस कर रखी है। लेकिन फिल्म आत्म संतुष्टी के लिए नही। बिजनेस के लिए बनाई जाती हैं और ‘परिचय’ जैसी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर उतना बिजनेस नही कर पाती जितना कि भाई हो तो ऐसा ‘फर्ज’ जैसी फिल्में करती हैं। इसीलिए ‘कसम खून की’ शुरू की है।

इसके बावजूद आप उसे आम फार्मूला फिल्म से अलग ही पायेंगे, हालांकि उसमें चलने वाला पूरा मसाला है। जीतेन्द्र ने बताया।

अच्छे शादी-शुदा जीवन का क्या अनुभव है? आप शादी के बाद किसी प्रकार का तनाव तो नही महसूस करते?

हमने पूछा।

“तनाव किस बात का? बड़ी हंसी खुशी में जिंदगी गुज़र रही है। शोभा को मैं आज से नही स्कूल जमाने से चाहता आया हूं। वह मुझे अच्छी तरह जानती हैं और मैं उन्हें। यही कारण है कि वह जानती है कि मुझे किस तरह खुश रखा जा सकता है और घरवालों को क्या पसंद है? उन्हें किस प्रकार खुशी दी जा सकती है। जहां इस कदर अंडरस्टैन्डिंग हो, वहां घर तो स्वर्ग ही बन जाएगा। और इसीलिए मेरा गृहस्थी का अनुभव बड़ा खुशगवार है”। जीतेन्द्र ने बताया।

अच्छा यह और बता दीजिए कि जबकि आपके घर नन्हा मेहमान आने वाला है कि आप लड़का चाहते हैं या लड़की? हमने जीतेन्द्र को जाने के लिए व्याकुल देखकर यह आखिरी सवाल पूछा।

मुझे तो लड़का ही चाहिए। और उम्मीद भी उसी की है। लेकिन शोभा की तमन्ना लड़की की मां बनने की है। अब देखिये भगवान क्या देता है? जीतेन्द्र ने कहा।

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Mayapuri