कौन कहता है मैं रोमांस में बिजी हूं – किरण कुमार

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मायापुरी अंक 43,1975

मुंबई की बरसात और मुंबई की बायको (मराठी शब्द ‘बायको’ का मतलब है औरत) का कोई भरोसा नही है ऐसा कहा जाता है। यहां मैं एक शब्द और जोड़ना चाहूंगा कि मुंबई के फिल्म पत्रकारों का भी कोई भरोसा नही कि कब किस कलाकार के घर जा पहुंचे। लेकिन इस बार मैंने ऐसा नही किया हालंकि अक्सर मैं बिना किसी पूर्व एपायमेंट के कलाकार के घर जा पहुंचता हूं।

किरण कुमार को फोन (532133) किया तो उन्होंने शनिवार की प्रात : 10 बजे का समय दिया, मगर मैं जा न पाया। आखिरकार खुद फोन किया तो उनके सेक्रेटरी लॉरी ने कहा कि वे अभी बाहर गये हुए हैं। पर आप अभी आ जाइए।

मैंने अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए अगले दिन दस बजे पहुंचने का वायदा किया।

और अगले दिन ठीक दस बजे मैं जीवन किरण के यहां पहुच गया

लुंगी कुर्ता पहने किरण ड्राइंग रूम में अपने फोन के करीब बैठे थे। यह देख कर मैंने कहा पूछा,

किसी के फोन का इंतजार है क्या?

हां कहकर किरण मुस्कुरा दिया।

मैंने पूछा,

किसका?

सुनकर किरण ने कहा,

यह पर्सनल (निजी) मामला है।

आपको बताना नही चाहता।

ठीक है कोई बात नही, लेकिन मैं जानता हूं कि किसका फोन आने वाला है।

बताइए, किसका फोन आने वाला है?

मैं भी नही बताऊंगा।

इस पर हम दोनों ही हंस पड़े किरण ने कहा,

यह तो खराबी है पत्रकारों में कि हर बात का मतलब निकाल लेते हैं। जबकि हकीकत यह है कि मुझे फोन का नही आप ही का इंतजार था।

अच्छा तो गोया हम आपकी.. से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गयें। खैर यह बताइए कि शादी-वादी के बारे में क्या सोचा है?

फिलहाल तो कोई इरादा नही है। अभी तो मुझें अपने करियर का ज्यादा ख्याल है। इसीलिए शादी का तो सवाल ही पैदा नही होता।

लेकिन रोमांस करने या रोमांस में बिजी रहने से आपका करियर बनने से रहा?

शायद किरण को मेरा यह सवाल बुरा लगा उन्होंने उत्तेजनापूर्ण उत्तर दिया,

कौन कहता है कि मैं रोमांस में बिजी हूं। कमाल करते हैं ये पत्रकार लोग क्यों मुफ्त में किसी को बदनाम करते हैं? दोस्ती को रोमांस का नाम देना बहुत गलत है। हमने कॉलेज में कई लड़के-लड़कियों से दोस्ती की, लेकिन इसका मतलब यह तो नही कि उन सब लड़कियों के साथ मैं रोमांस करता था।

माहौल में गंभीरता आने लगी तो मैंने तुरंत बात का रूख हवा की तरह पलटा,

आपने कौन-से कॉलेज में शिक्षा पायी है?

यही मुंबई के नेशनल कॉलेज में, लेकिन अपनी पढ़ायी पूरी नही कर पाया, क्योंकि इस बीच मैंने फिल्म इंस्टीट्यूट पूना में एडमिशन के लिए इंटरव्यू दे दिया था, और मेरा सलेक्शन हो गया तो मैने पढ़ायी छोड़ दी और पूना में एडमिशन ले लिया।

क्या आपका जन्म मुंबई में ही हुआ?

जी हां, 20 अक्टूबर 1951 को मेरा जन्म मुंबई में ही हुआ। बचपन का मेरा नाम दीपक है। किरण कुमार तो मैं बाद में बना।

अगर आपने फिल्मों में सफलता प्राप्त कर ली तो अपनी सफलता का श्रेय आप किसे देंगे? जीवन साहब को या ख्व़ाजा अहमद अब्बास को जिनकी वजह से आप फिल्मों में आयें?

मेरे इस प्रश्न के उत्तर में किरण ने बताया,

दोनों में से किसी के नही, बल्कि अपने इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर रोशन तनेजा का मैं जरूर आभारी रहूंगा, जिन्होंने मुझें अभिनय की शिक्षा दी। इन्होंने हमें यह भी सिखाया कि अपने प्रोफेसन का आदर करना चाहिए। अभिनय की बारीकियां भी समझायी। चेहरे पर किस तरह उतार-चढ़ाव एंव भावभिव्यकित आने चाहिए। यह सब हमने उन्हीं से सीखा। इसके अलावा मै ख्व़ाजा अहमद अब्बास को भी नही भूल सकता, जिन्होंने मुझे अपनी फिल्म ‘दो बूंद पानी’ में अभिनय का भरपूर मौका दिया। मैं जीवन साहब का बेटा हूं, इसलिए मुझे फिल्में मिली हो, ऐसी बात नही है। यदि ऐसा होता तो आज सभी फिल्म स्टार्स के बेटे हीरो बन गये होते। कई ऐसे हीरो भी, हैं जो अपने वक्त के बड़े-बड़े स्टार्स के बेटे होने के बावजूद स्ट्रगल कर रहे हैं। हालांकि स्ट्रगल तो भी मैं भी कर रहा हूं। और सही मानो में कलाकार को उम्र भर संघर्ष करना ही पड़ता है। और यही हमने इंस्टीट्यूट में सीखा है।

आप अपने इंस्टीट्यूट के कलाकारों और पुराने कलाकारों में क्या अंतर मानते हैं?

हम लोग एक-दूसरे के बहुत सहायक सिद्ध होते हैं। यहां तक कि एक दूसरे के लिए सब कुछ कर सकते हैं। यहां तक कि कई उदाहरण हैं कि किसी इंस्टीट्यूट के हीरो के पास ज्यादा फिल्में हैं तो वह हर आने वाले प्रोड्यूसर को अपने साथी कलाकारों को ही लेने को कहेगा और इसके बिल्कुल विपरीत पुराने कलाकारों में तगड़ा कंपीटिशन उनमें सहयोग की बात तो दूर, एक-दूसरे के खिलाफ उटपटांग बातें छपवाकर उसे नीचा दिखाने का प्रयत्न करते हैं।

इसका मतलब यह हुआ कि आप को पुरानी पीढ़ी के कलाकार पसंद नही हैं?

जी नही, मेरा आशय यह नही है। आप मेरी बात का गलत मतलब निकाल रहे हैं। मैंने तो सिर्फ नयी और पुरानी पीढ़ी में अंतर बतलाया है। पुरानी पीढ़ी के कलाकारों में मुझें दिलीप कुमार बहुत पसंद हैं। दिलीप साहब मेरे प्रिय कलाकार हैं। जिस ऊंचाई तक वे पहुंच चुके हैं, इस ऊंचाई तक पहुंचने में दूसरे कलाकारों को बरसों लग जाये, और शायद तब भी नही पहुंच पायें।

मैंने आपकी कई फिल्में देखी हैं। आपका अभिनय देखकर ऐसा आभास होता है कि आप राजेश खन्ना को कॉपी कर रहे हैं, इस विषय में आप क्या कहेंगे?

इसका सीधा-सा जवाब यह है कि जिन दिनों हमारी फिल्में रिलीज़ हुईं, उन दिनों चारों तरफ राजेश खन्ना के नाम का जादू फैला हुआ था, जिसे देखो वह राजेश खन्ना का प्रशंसक बना हुआ था। जिसका नतीजा यह हुआ कि उस दौरान सिर्फ मैं ही नही, जितने नये कलाकारों की फिल्में रिलीज़ हुई उन सबके बारे में यह कहा जाने लगा कि यह नया हीरो राजेश खन्ना की नयी कॉपी करता है। एक बात और आपको बता दूं कि मैं राजेश खन्ना का बहुत जबरदस्त फैन हूं। मुझे राजेश खन्ना का अभिनय बहुत अच्छा लगता है मैंने राजेश की तकरीबन सभी देखी हैं।

कहा जाता है कि राजेश खन्ना अपनी फिल्म में गानों में बहुत बढ़िया परफॉर्मेंस देते हैं। क्या आप बताएंगे कि यह बात कहां तक सही हैं और आपको उनका कौन-सा गीत-अभिनय पसंद है?

किरण ने उत्तर दिया,

यह बिल्कुल सही बात है और मेरे विचार में उनके इसी बढ़िया परफॉर्मेस की वजह से वे करोड़ो लोगों के चहेते स्टार बन गये हैं। मुझे फिल्म ‘प्रेमनगर’ में ‘बाय-बाय मिस गुड नाइट’ का उनका परफॉर्मेस बहुत पसंद है।

हमारी फिल्मों का भविष्य क्या है?

बहुत उज्जवल है। परिवर्तन तो आयेगा ही। यह परिवर्तन धीरे-धीरे ही लोगों को पसंद आयेगा।

लेकिन यहां सैक्सी फिल्मों की ज्यादती?

 

ज्यादती-वादती कुछ नही है। यह बहुत जरूरी है। सैक्स मनुष्य के जीवन का आवश्यक अंग है। सैक्स को दबाना नही चाहिए। छिपाना नही चाहिए। हम अगर इसे दबायेंगे या छिपायेंगे तो एक दिन स्वयं बाहर आ जायेगा और तब इसका रूप भयंकर होगा। इसलिए फिल्मों में सैक्स बहुत अनिवार्य है, जिसकी शुरूआत अब हुई है जबकि शुरू से ही सैक्स फिल्मों में दिखाया जाना चाहिए था। हमारे निर्माताओं को चाहिए कि वे बराबर सैक्स की शिक्षा फिल्म के माध्यम से दें ताकि हमारे नौजवान पथ भ्रष्ट न हो।

इसका मतलब यह कि अब सिर्फ सैक्सी फिल्में ही बननी चाहिए?

लीजिए आपने फिर गलत मतलब निकल लिया। मेरा मतलब यह कि हमारी फिल्मों में जहां आवश्यक हो वहीं सैक्स का प्रदर्शन किया जाये। गलत जगह सैक्स तो सबको ही बुरा लगेगा। कहानी की मांग के अनुसार इसका उपयोग अवश्य होना चाहिए।

अभिनय के अलावा आपकी फिल्म के किस क्षेत्र से लगाव है? मेरा आशय़ यह है कि क्या भविष्य में निर्देशन या किसी फिल्म का निर्माण करना पसंद करेंगे?

भविष्य की बात मैं कह नही सकता। फिलहाल मुझें अभिनय में रूचि है और इसी क्षेत्र मैं जमना चाहता हूं। और चाहता हूं दर्शक मुझें स्टार न समझकर एक कलाकार माने और सफलता पाने के लिए मैं उचित भूमिका की प्रतीक्षा कर सकता हूं। मुझें विश्वास है कि एक न एक दिन अवश्य मैं अपने मकसद में कामयाब रहूंगा।

आपकी पसंद क्या है?

स्वीमिंग, ड्राइविंग और शिकार खेलना मुझें बहुत पसंद है।

यह तो हुई आपकी पसंद, लेकिन आपकी क्या पसंद नही है?

एक तो मुझें एयर-कट्स बिल्कुल पसंद नहीं, दूसरे परीक्षाएं पसंद नही, तीसरा मुझें वे लोग पसंद नही, जो बेकार में बहुत बोलते हैं,

अरे आपने अगर मुझें पहले ही यह बता दिया होता तो मैं आपका इंटरव्यू नही लेता मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

मेरा मतलब आपके बोलने से नही। अगर आप बोलते नही तो इंटरव्यू कैसे करतें।

ठीक है तो लीजिये अब मैं चलता हूं।

और में किरण कुमार से विदा लेकर लौट आया। यह सोच रहा था कि कुछ लोगों को कितना गलत समझ लिया जाता है जबकि वे होते नही हैं!


Mayapuri