कामिनी कौशल की प्रेम कहानियां

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मायापुरी अंक 20,1975

आज बूढ़ी कामिनी कौशल और प्रेम नाथ के रोमांस के चर्चे है। किन्तु जब कामिनी कौशल जवान थी तो उनका दिलीप कुमार के साथ जबरदस्त रोमांस चलता था दोनों की फिल्में जनता में बड़ी प्रसिद्ध थी। बात उन दिनो की है जब दोनों ’शहीद’ में काम कर रहे थे। एक दिन ‘शहीद’ की शूटिंग समय से पूर्व ही खत्म हो गई। दिलीप ने शेष समय का फायदा उठाने का प्रोग्राम बनाया। निर्देशक रमेश सहगल को जब इस प्रोग्राम का पता लगा तो उन्होनें अपनी गाड़ी पेश कर दी। (उस समय तक दिलीप कुमार ने कार नही खरीदी थी और लोकल ट्रेन में सफर करते थे) रमेश सहगल की कार नाज नखरों वाली हसीना की तरह चलती थी। वह जब चल पड़ती थी तो रुकती न थी और रुकती थी तो चलने का नाम न लेती थी।

रमेश सहगल की उस विचित्र कार में बैठकर दिलीप कुमार और कामिनी कौशल फिल्म स्टारों की उठने बैठने की जगह यानी पर्शियन डेरी (जहां आज मनु नारंग का टाक ऑफ दी टाउन होटल है) के लिए चल पड़े। कार गोरे गांव से विलेपार्ले ही पहुंची थी कि वह एक अदा के साथ रुक गई। रमेश सहगल ने दिलीप कुमार की तरफ देखा (मतलब यह था कि धक्का लगाओ ताकि गाड़ी चले) लेकिन कामिनी कौशल की मौजूदगी में दिलीप कुमार कार को धक्का कैसे लगा सकते थे (हालांकि वह पहले कई बार धक्के लगा चुके थे) यह देख कर रमेश सहगल ने कामिनी कौशल से कहा तुम नीचे उत्तर आओ। कामिनी कौशल ने उतरते हुए दिलीप कुमार से भी उतरने के लिए कहा। उन्हें मजबूरन उतरना पड़ा। रमेश सहगल ने कहा दिलीप तुम्हारी ताकत के बगैर शायद यह गाड़ी अपनी जगह से हटेगी नही।“ अब तो दिलीप कुमार की प्रेस्टिज की बात आ गई।

दिलीप कुमार कार को धक्का लगाता रहा और कामिनी कौशल हंसती रहीं, खिलखिलाती रहीं। दिलीप कुमार मन ही मन कुढ़ते रहे कार चली किन्तु उसी तरह ‘अट्ठखेलिया’ करती हुई। उसके साथ जब वह चर्च गेट पर स्थित पर्शियन डेरी पहुंचे तो रात हो गई थी। कामिनी कौशल वहां से तुरन्त घर चली गई क्यों कि उस समय उनके पति ने उन पर काफी सख्ती कर रखी थी। बेचारा दिलीप कुमार लोकल ट्रेन से बान्द्रा चले गये। और रमेश सहगल अपनी ‘हसीना’ के साथ अपने घर की ओर चलते बने।

‘शहीद’ रिलीज हुई और बहुत ज्यादा सफल हुई उसने पिछली तमाम फिल्मों के रिकॉर्ड तोड़ दिये। उसके बाद दिलीप कुमार भी एक अदद कार के मालिक बन गये। कार लेने के पश्चात दिलीप कुमार ने सबसे पहले रमेश सहगल को अपनी कार में बिठाया। और पर्शियन डेरी का प्रोग्राम बनाया संयोग से पर्शियन डेरी के पास पहुंचने से पूर्व ही वह कार भी रमेश सहगल की ‘हसीना’ की तरह अकड़ कर खड़ी हो गई। दिलीप कुमार कार के रुकने का कारण मालूम करने के लिए नीचे उतरे तो एक शोर मच गया। और ऑटोग्राफ लेने वालों ने चारों तरफ से उन्हें घेर लिया यह देखकर रमेश सहगल ने कहा लाओ मैं देता हूं ऑटोग्राफ

“अरे यह तो झंडे वाला है।“ और रमेश सहगल के हाथ से लड़के ने ऑटोग्राफ बुक छीन ली। और सब हंसने लगे। (रमेश सहगल ‘शहीद’ में दिलीप की अर्थी के साथ झंडा लेकर चले थे) रमेश सहगल को इस बात पर बड़ा गुस्सा आया। उन्होंने कहा “मैं दिलीप कुमार का बाप हूं”

एक्स्ट्रा होकर दिलीप कुमार का बाप बन रहा है।“ एक लड़के ने फिकरा कसां।

“हां साहब देखिये, शराफत का जमाना खत्म हो गया है” दिलीप कुमार ने अवसर का लाभ उठाते हुए आनन्द लेते हुए कहा। “मैनें इसे गाड़ी में लिफ्ट क्या दी यह मेरा बाप बन बैठा।“

दिलीप की बात पर लड़के हंसने लगे और रमेश सहगल जल भून कर रह गए। लेकिन ऑटोग्राफ देने के पश्चात दिलीप कुमार ने स्वयं ही लड़कों को बता दिया कि वह ‘शहीद’ के निर्देशक रमेश सहगल हैं। तब लड़के समझ गए कि उन्होनें खुद को दिलीप कुमार का बाप क्यों कहा था। दिलीप कुमार आज जिस स्थान पर विराजमान हैं वह स्थान उन्होंने बड़ी कुर्बानियां देकर हासिल किया है। आज के हीरो तो पलक झपकते स्टार बन जाते हैं और अनगिनत फिल्मों के अनुबंध स्वीकार करके हर तरह से पैसे बटोरने लगते हैं। गाड़ियां और बंगले खरीद लेते हैं किन्तु दिलीप कुमार शुरू से ही कम फिल्मों में काम करने के सिद्धांत पर चले आ रहे हैं। इसी वजह से उनके पास पैसों की वह रेल पेल कभी नही रही जो आज के छोटे मोटे और बड़े कलाकारों के पास रहती है हद तो यह हैं कि एक बार केवल तेरह सौ रुपयों के लिए उसके नये बंगले पर सील लग गई थी।

यह बात 1954 की है। 17 मार्च 1954 की सुबह 9 बजे इलाहाबाद के फ्रुट मर्चेन्ट और आड़तिया इबादुल्लाह शाह कोर्ट के वेलीफ देवकर और दूसरे पट्टे वालों को साथ लेकर दिलीप कुमार के नये बंगले पर पहुंच गये। दिलीप कुमार के पिता फूलों का धंधा करते थे। इबादुल्लाह की यह रकम उनकी कम्पनी सरवर एण्ड सन्ज पर बकाया थी। उसे वसूल करने के लिए इबादुल्लाह शाह ने अपने वकील की सहायता से इलाहाबाद हासिल कर ली। दिलीप के पिता के देहांत के पश्चात कंम्पनी बंद कर दी गई थी। इबादुल्लाह शाह ने दूसरे दूसरे भाइयों की बजाए दिलीप कुमार के पास डिग्री ले जाना उचित समझा। उनका ख्याल था कि फिल्म स्टार के पास इतनी मामूली रकम तो मिल ही जायेगी किंतु उन्हें बड़ी निराशा हुई।

दिलीप कुमार उनके हस्तक्षेप पर बड़े आग बबूला हुए उन्होंने अपने वकील और करीबी पठानों को बुलवा भेजा, लेकिन बेलीफ देवकर अपनी बात पर अड़े रहे। दिलीप कुमार ने 45 मिनट की मुहलत मांगी किंतु वह दो घंटे में भी 1300 की रकम न जुटा सके और अंत में दिलीप कुमार ने शाम को चार बजे स्मॉल कॉलेज कोर्ट में मतलूबा खूब दाखिल करके उस उलझन से मुक्ति पाई।


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Mayapuri

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