दादा मुनि से प्रेरणा लेने वाले –राजेन्द्र कुमार

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मायापुरी अंक 46,1975

समय समय की बात है कि राजेन्द्र कुमार इतने भाग्यशाली हीरो थे कि उनकी हर फिल्म सिल्वर जुबली हुआ करती थी। कहते हैं उन्होंने एक लाइन से 38 फिल्में हिट दी हैं। इसलिए अच्छे अच्छों की राजेन्द्र कुमार के सामने सिटी पिटी गुम हो जाती थी। किंतु वही राजेन्द्र कुमार बी.आर.चोपड़ा की फिल्म ‘कानून’ के लिए अनुबंधित होने पर मुहूर्त के दिन जब स्टूडियो पहुंचे तो शूटिंग के पहले ही दिन न केवल नर्वस हो गये बल्कि निराश भी हो गये और निर्देशक से बोलने लगे कि फिल्म में मैं यह भूमिका न निभा पाऊंगा। दरअसल उस दिन के सीन में राजेन्द्र कुमार को वकील के रूप में एक पन्ने के लम्बे संवाद बोलने थे। और पूरा दिन गुजरने पर भी वह संवाद पूरी तरह अदा नहीं कर सके थे। शाम को बिना सीन टेक कराये ही वह घर भी पहुंच गये। उन्होंने दिन भर का हाल अपनी पत्नी को सुनाया और बोले, मुझसे यह रोल कभी नहीं हो सकेंगे मैंने बहुत कोशिश की और इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि वाकई यह रोल बड़े कठिन हैं। और मैं इसे कर न सकूंगा मैं इस योग्य नहीं हूं।

और इस निर्णय के बाद राजेन्द्र कुमार बी.आर.चोपड़ा से मिली साइनिंग अमाउंट (10,000)को उठाकर उनके घर जा पहुंचे, और बोले चोपड़ा जी मुझसे यह रोल न हो सकेगा, आप किसी बड़े अदाकार को ले लीजिये और मुझे क्षमा कर दें।

यह सुनकर बी.आर.चोपड़ा के चेहरे पर मुस्कुराहट दौड़ गई। उन्होंनें तुरंत अशोक कुमार को फोन किया। जो कि ‘कानून’ में जज का रोल कर रहे थे। दादा मुनि को चोपड़ा जी ने बताया कि राजेन्द्र कुमार मात्र अभिनीत करने में असमर्थता प्रकट कर रहे हैं। और किसी दूसरे अदाकार को लेने के लिए कह रहे हैं।

दादा मुनि ने जवाब दिया कि राजेन्द्र को रोक कर रखो, मैं वहीं पहुंच रहा हूं।

दादा मुनि थोड़ी ही देर में वहां पहुंच गए दादा मुनि के आने पर राजेन्द्र कुमार लगभग रो दिये और बोले दादा मुनि मुझसे यह रोल नहीं होगा, मुझे माफ कर दीजिएगा।

अरे बेवकूफ तुम्हें बहुत सोच विचार के बाद लिया गया है। हम जानते हैं कि यह रोल सिर्फ तुम्हारे लिए ही बना है और तुम्हारे बिना दुनिया का कोई अभिनेता यह रोल नहीं कर सकता। मूर्खता छोड़ो और कल सैट पर आ जाओ।

दादा मुनि बड़ी मुश्किल से राजेन्द्र कुमार में आत्म विश्वास पैदा कर सके। इसके बाद राजेन्द्र कुमार रात को घर जाकर काफी रात तक उन संवादो को रटते रहे और सुबह होने पर निश्चित समय पर स्टूडियो पहुंच गये। और जब शूटिंग शुरू हुई तो उन्होंने इस जोश और विश्वास के साथ संवाद अदा किये। पहला ही टेक ओ.के. हो गया और पूरा सैट तालियों से गूंज गया। इसके बाद राजेन्द्र कुमार ने उसी सैट पर निरंतर 35 दिन शूटिंग की। फिल्म सम्पूर्ण होने के पश्चात जब रिलीज हुई तो राजेन्द्र की प्रशंसा में लोगों ने जमीन आसमान एक कर दिये। प्रीमियर के समय स्व.मेहबूब खान जज्बात में बेकाबू होकर चिल्लाए कहां है हमारा बेटा?

इतने में राजेन्द्र कुमार सामने आये तो स्व. मेहबूब खान ने उन्हें भींच कर सीने से लगा लिया। और पीछ थपथपाकर बधाई देते हुए कहा साला क्या कमाल कर दिया है!

आज राजेन्द्र कुमार को जब यह घटना याद आती है तो वह किस्मत की सितम जरीफी पर मुस्कुराए बिना नहीं रहते।


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Mayapuri

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