बलराज साहनी का पहला फिल्मी कान्ट्रैक्ट

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Balraj_Sahni

 

मायापुरी अंक 41,1975

1946 में भारतीय फिल्मों के इतिहास मे एक बड़ी उल्लेखनीय घटना हुई।

उस वर्ष निर्माता निर्देशक चेतन आनन्द को फिल्म ‘नीचा नगर’ का फ्रांस में आयोजित अंतराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में प्रदर्शन हुआ और उसकी बड़ी सराहना की गयी। शायद यह फिल्म और भी अधिक महत्वपूर्ण बन जाती यदि उसके नायक बलराज साहनी बन जाते जैसा कि स्वयं चेतन आनन्द चाहते थे।

बात यह हुई कि उन दिनों बलराज साहनी बी.बी.सी. की नौकरी छोड़ कर वापस भारत आ गये थे और अपने भावी कार्यक्रम के बारे में सोच रहे थे। एक दिन वे शाम को झेलम नदी के किनारे अपने दोस्त चेतन आनंद के साथ टहल रहे थे तो उन्हें चेतन साहब ने अपनी प्रस्तावित फिल्म ‘नीचा नगर’ की कहानी सुनाते हुए कहा तुम फिल्मों में क्यों नहीं आते? मेरी इस फिल्म के हीरो बन जाओ, मैं मुआवजे में बीस हजार रुपये दूंगा।“

बीस हजार रुपये की राशि उनके लिए बहुत बड़ा आकर्षण नही था बलराज साहनी के लिए पर हां फिल्मों में कार्य का आकर्षण उनके लिए जरूर था लेकिन वे ना कर सके इस बारे में उन्होनें अपने एक लेख में इस घटना का जिक्र करते हुए लिखा है चेतन ने मुझें नीचा नगर’ की कहानी विस्तार से सुनायी। मैं उनकी इस अफसानावीसी से बहुत प्रभावित न हो सका परन्तु कथावस्तु में हद दर्जे का यथार्थ था। वही जो मैं गोर्की की कहानियों और रूसी फिल्मों में देखता हुआ आया था। कई दृश्य चेतन ने ऐसी खूबी से बयान किये कि मेरी कल्पना में बार-बार घूमने लगे। निस्संदेह चेतन एक साहसपूर्ण कदम उठाने वाले थे जिसमें उनका साथ देना किसी लिहाज से भी गलत नही कहा जा सकता।“

योजनानुसार फिल्म पूना में बनने वाली थी। नवयुग स्टूडियों के मालिक डब्ल्यू.जैड अहमद फिल्म के निर्माता बने। और चेतन आनंद बने उसके निर्देशक।

बलराज साहनी को फिल्मों में कार्य करने का निर्णय लेने में अधिक देर नही लगी। यह निर्णय लेते समय उनकी विशेष मानसिक स्थिति थी जिसके बारे में उन्होनें बड़ी ईमानदारी से जिक्र किया है “विलायत से वापस आकर मैंने अंग्रेजी साम्राज्य का निडरता से खुलमखुला विरोध करना शुरू कर दिया। यहां तक की मेरे दोस्त कभी कभी मेरा ध्यान डिफेंस ऑफ इंडिया रुल्स की ओर भी दिलाते परन्तु इसका यह मतलब नही था कि मैं सब कुछ छोड़ छाड़ कर स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने के लिए तैयार हो चुका था। मेरी यह प्रतिक्रिया केवल मेरा घमण्ड था। विलायत जाकर मैं अपने को अंग्रेजो के बराबर समझने लगा था। इस घमण्ड के संबंध में उस समय की एक और तस्वीर भी मेरे सामने आती है। विलायत जाने से पहले मेरी कहानियां ‘हंस’ में बाकायदा प्रकाशित होती रहती थी। मैं उन भाग्यशाली लेखकों में था जिनकी भेजी कोई भी रचना अस्वीकृत नही हुई थी। विलायत में चार साल तक मैंने एक भी कहानी नही लिखी थी। अभ्यास टूट चुका था। अब मैंने उसे बहाल करना चाहा। एक कहानी लिख कर ‘हंस’ को भेजी लेकिन वह वापस आ गयी। मेरे स्वाभिमान को गहरी चोट लगी। इस चोट का घाव कितना गहरा था, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उसके बाद मैंने कोई कहानी नही लिखी। चेतन के फिल्मों में काम करने के निमंत्रण ने जैसे इस चोट पर मरहम का काम किया। फिल्मों का मार्ग अपनाने का कारण वह अस्वीकृत कहानी भी थी”

‘नीचा नगर’ में कार्य करने का फैसला करने के बाद जब पूना से चेतन आनंद का खत आया तो बलराज साहनी को बड़ी निराशा हुई। न तो कांट्रैक्ट न साइनिंग अमांउट न पूना पहुंचने का किराया न कोई स्पष्ट वायदा।

फिर भी फिल्मों में कार्य करना था, इसलिए अपने घर वालों को नाराज कर बलराज साहनी कश्मीर से पूना के लिए रवाना हो गये। स्टेशन पर कृष्ण चंदर उन्हें लेने आये थे पर चेतन आनंद नही आये। इस बात से भी उन्हें निराशा हुई।

दूसरे दिन चेतन आनंद मिले और उन्हें नवयुग स्टूडियों ले गये। वहां अनेक परिचितों से उनकी मुलाकातें हुई और उन्हें लगा कि वे अपने ही लोगों के बीच आ गये हैं।

बलराज साहनी को सबसे पहली मुलाकात इनाक्षी रामराव तथा उनके पति मिस्टर भवनानी से हुई जिनकी फिल्म ‘हिमालय की बेटी’ शायद पहली फिल्म थी जिसकी शूटिंग कश्मीर में हुई थी और उस शूटिंग की इजाज़त बलराज साहनी ने ही अपने प्रभाव से दिलायी थी भवनानी के साथ डेविड से भी उनकी मुलाकात हुई जो अब चोटी के सितारे बन चुके थे। जब कश्मीर में बलराज साहनी से डेविड की मुलाकात हुई थी तो उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि फिल्म में एक्ट करने के लिए डेविड को केवल डेढ़ सौ रुपये माहवार मिल रहे है। पर इस बार की मुलाकात से उन्हें यह जानकर खुशी हुई कि वे अब एक फिल्म के दस हजार ले लेकर पन्द्रह हजार रुपये तक लेने लगे हैं। करन दीवान से भी उनकी मुलाकात हुई जो ‘रतन’ की कामयाबी के बाद लोकप्रिय हीरो बन चुके थे। बलराज साहनी को सबसे अधिक खुशी प्रसिद्ध गीतकार हमीद भट्ट से मिलकर हुई जिन्होंने लखनऊ में एक गोष्ठी में अपने गीत सुना कर उन्हें मोहित कर लिया था।

ये मुलाकातें तो होती रहीं पर काम की बात नही हो रही थी। लोगों से गपशप करते हुए वे उकता से गये। वे फिल्म वातावरण के लिए एकदम नये नये से थे उन्हें क्या मालूम था कि फिल्मों इंसान बनने के लिए मक्खियां मार-मार कर समय बिताने की आदत डालना अत्यंत आवश्यक है।

बलराज साहनी जब काफी बोर हो गये तो एक व्यक्ति ने आकर कहा आप मेकअप कर लें। आपके फोटे लेते हैं। अहमद साहब आपको दो बजे मिलेंगे।“

वे मेकअप रूम में चले गये यह उनका पहला मेकअप था। इस अनुभव के बारे में उन्होनें स्वयं अपने संस्करण में लिखा है कि “कॉलेजों के ड्रामों में, शांति निकेतन के ड्रामों में जो मेकअप किया जाता था उसमें और इस मेकअप में काफी अंतर था। यह उससे हजार गुना अधिक स्वाभाविक। सुन्दर एवं कलात्मक था। देखते-देखते ही मेकअप मैन ने मेरा चेहरा ऐसा मुनव्वर कर दिया कि मैं स्वयं तारीफ किये बिना न रह सका। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि मेकअप मैन की जितनी भी बढ़ चढ़ कर तारीफ करता उतना ही वह चेहरे पर व्यंग्यात्मक हंसी के साथ दूसरी ओर देखने लगता। असल में रोजाना की बात थी उस मैकअप मैन ने कोई असाधारण कारनामा नहीं किया था।“

मेकअप के बाद बलराज साहनी के फोटो खींचे गये। फोटो खींचने के कई घंटो बाद भी अहमद साहब ने उन्हें भीतर नही बुलाया तो वे बुरी तरह खीझ उठे उनकी इच्छा हुई कि वे यहां से भाग चलें। उन्हें अपने आप पर और खास कर चेतन आनंद पर बड़ा गुस्सा आया। बिना सोचें समझें सपनों में खोये इस तरह मुंबई चले जाना कितना गलत हो गया। वे अब घर लौट कर क्या मुंह दिखायेंगे? उन्होंने तो सोचा था कि ज्योंही वे स्टूडियों पहुंचेगे वहां उनका फूल मालाओं से स्वागत होगा। पर अब उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे वे कोई नौकरी के उम्मीदवार हैं।

अंत में, लगभग छ: बजे अहमद साहब ने बलराज साहनी को भीतर बुलाया। उन्होंने सिगार का लंबा कश खींचते हुए एक टाइप किया हुआ कांट्रैक्ट उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा देखिये चेतन साहब की पिक्चर बनाने का फिलहाल मेरा इरादा नही हैं। पहले मैं महाभारत बनाना चाहता हूं। उसमें कृष्ण जी का रोल मैं चेतन साहब को देना चाहता हूं और अर्जून का आपको चेतन साहब को डेढ़ हजार माहवार देने का इरादा है और आपको एक हजार। अगर मंजूर हो तो इस कांट्रैक्ट पर दस्तख्त कर दीजिये।

पर बलराज साहनी तो देर से बुलाये जाने पर भिन्नाये हुए थे। उस पर यह अर्जुन का रोल। वे तो ‘नीचा नगर’ के हीरो बनने आये थे। यह सब क्या हो गया? वे यह सब बर्दाश्त नही कर सके और गुस्से में बोल पड़े “नौकरी और तनख्वा का जिक्र करने से पहले मुझें उम्मीद थी कि आप मुझ से चार घण्टे इंतजार कराने को माफी मांगेगे। बहरहाल में आपसे अर्ज करना चाहता हूं कि मैं यहां सिर्फ चेतन को पिक्चर में काम के ख्याल से आया हूं। मेरा अर्जुन वर्जन बनने का कोई इरादा नही है।

अहमद साहब खामोश हो गये। वे सोच ही नही सकते थे कि बलराज साहनी इतने मुंह फट होंगे। वे अचानक सह्रदय हो उठे और बोले साहनी साहब, आपकी फोटो के डेवलपिंग में कैमरा डिपार्टमेंट वालों ने कुछ देर कर दी। मैं चाहता था कि आपका कांट्रैक्ट तैयार करने के पहले फोटो देख लें। देर होने पर आपको जहमत उठानी पड़ी। कोई जल्दी नही है साहब, आप सोच लीजिये। हमारी महाभारतमहज धार्मिक पिक्चर नही होगी। उसके कुछ तरक्की पसन्द पहलू होगें जिन्हें आप जरूर पसन्द करेंगे।“

बलराज साहनी अपने फैसले पर अड़े रहे। उन्होंने कहा, मैंने अपना इरादा आपको बता दिया है। इससे ज्यादा मुझें कुछ नही कहना।“

यह कह कर वे बाहर चले आये। वे चेतन को पकड़ना चाहते थे। पर वह कही नजर नही आये। उनकी प्रतीक्षा में वे इधर-उधर टहलते रहे। अंत में चेतन साहब अहमद साहब के दफ्तर से निकलते हुए बाहर आये और बोले, भई, मैं तो कांट्रैक्ट साइन कर आया हूं।“

बलराज साहनी चकित रह गये। उन्हें लगा जैसे धरती उलट गयी। उन्होंने तेज स्वरों में कहा, मैंने तेरे खातिर उसे मुंह नही लगाया और तू कांन्ट्रैक्ट पर साइन कर आया।“

चेतन आनंद यह सुनते ही तिलमिला उठे। दरअसल अहमद साहब ने बलराज साहनी द्वारा कांट्रैक्ट ठुकराये जाने की बात का जिक्र तक नही किया था। वे फौरन दौड़ कर अहमद साहब के पास गये और बोले, मेरा कांट्रैक्ट भी फाड़ दीजिए। जब बलराज साहनी नही, तो मैं भी नही।

अहमद साहब ने कांन्ट्रैक्ट तो नही फाड़ा पर वायदा किया कि वे चेतन आनंद पर‘महाभारत’ फिल्म में कार्य करने के लिए दबाव नही डालेंगे।

इस तरह दोनों के कान्ट्रैक्ट बने बनाये रह गये। दूसरे दिन बलराज साहनी, चेतन आनंद तथा उनके और दोस्त दक्कन क्वीन में बैठ कर ठन ठन गोपाल की हालत में पूना से मुंबई चले आए।

बलराज साहनी के मन पर इस पहले कांट्रैक्ट की घटना का गहरा असर पड़ा। वहां से तो हारे हुए आए पर उस हार में भी उनकी विजय थी। अब फिल्मों में काम करने का संकल्प पहले से भी अधिक दृढं हो गया था। जब पूना से मुंबई आये तो उनके चेहरे पर आशा की किरणें फूट रही थी। उनका मन कह रहा था कि फिल्मों में वे अवश्य ही कामयाब होगें।


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Mayapuri

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