गोवा की हसीन वादियों से आई गुलजार की ‘खुश्बू’

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JallianWalaBaghGulzar

 

मायापुरी अंक 42,1975

‘खुश्बू’ से मुझें सबसे बड़ी शिकायत है कि इसकी कहानी इसकी पृष्ट भूमि में उभर नही पाई।

सही लोकेशन का चुनाव किसी फिल्म के लिए कितना जरूरी होता है और निर्देशक के ऊपर इसकी कितनी बड़ी जिम्मेदारी होती है, ‘खुश्बू’ देखते समय यह बात बार-बार सामने आती है। हालांकि अपने आप में गोवा की हसीन वादियां बहुत सुन्दर हैं और कैमरे ने कई एक दृश्य तो बहुत खूब पकड़े हैं। पर कहानी का बंगालीपन फिल्म में छिप नही पाता। कितना अच्छा होता, अगर गुलजार ‘खुश्बू’ की शूटिंग के लिए गोवा के सुन्दर दृश्यों का मोह छोड़ पाते और बंगाल के किसी गांव में अपनी फिल्म की लोकेशन ढूंढते तो निश्चय ही‘खुश्बू’ अधिक सुन्दर बनती।

इस फिल्म की बात करने से पहले ही मुझें पृष्ठ भूमि की बात इसलिए कहनी पड़ी, क्योंकि गुलज़ार को मैं हमेशा हिन्दी फिल्मों के अच्छे निर्देशकों में गिनता रहा हूं। बिमल राय ग्रुप से जो दो अच्छे निर्देशक हमें मिले हैं, उनमें ऋषिकेश मुखर्जी के बाद दूसरा स्थान गुलजार का ही है। उन्होंने ‘मेरे सपने’ से लेकर ‘आंधी’ तक एक से एक अच्छी फिल्में दी हैं। कमजोर तो‘खुश्बू’ भी नही रही लेकिन कमी लोकेशन की रही है। विशेषकर फिल्म का मांझी गीत, जिसके लिए बंगाल की पृष्ठ भूमि को बहुत जरूरत थी।

गुलजार पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि उनकी फिल्मों की कहानियां चुराई हुई और पुरानी होती हैं। गुलजार स्वयं इस बात को स्वीकार करते हैं।

दरअसल गुलजार मूल रूप से एक शायर हैं। बिमल राय की फिल्मों में उन्होंने एक गीत लेखक के रूप में अपना फिल्मों से करियर शुरू किया था। उनके गीतों ने प्रशंसा भी प्राप्त की। रात और चांद विषय को लेकर उन्होंने भिन्न-भिन्न कल्पनाओं द्वारा इसे कई भावनाओं में बांधा। जब उनके गीत चल निकले तो उन्होंने फिल्मों में संवाद लिखने शुरू किये। फिर पटकथायें लिखी और एक दिन एकाएक वह निर्देशक बन गये।

निर्देशक बनने तक गुलजार उन सब रास्तों पर अच्छी तरह चल चुके थे जो एक निर्देशक के लिए आवश्यक हो जाता है। इसलिए जब उनके निर्देशन में ‘मेरे सपने’ बनी, तो फिल्म में एक नये निर्देशक कीकमजोरी कही नज़र नही आती थी। मीना कुमारी की अविस्मरणीय भूमि का इस फिल्म मे थी।‘मेरे सपने’ तपन सिन्हा की बंगाली फिल्म ‘अपुन जान’ की कहानी पर बनी थी। उसके बाद बनी ‘परिचय’ अंग्रेजी फिल्म ‘साउंड ऑफ म्यूजिक’ का हिन्दी रूपान्तर था। गूंगे-बहरे को लेकर बनी ‘कोशिश’ एक जपानी फिल्म ‘ऑल अस फार हैप्पीनेस अलोन’ की कहानी ही थी, केवल उसका अंत बदल दिया गया था।‘आंधी’ पर तो जैसा कि बार-बार चर्चा उठाई गयी थी, प्रधान मंत्री के जीवन की घटनाओं को लेकर तैयार की गयी है।

गुलजार स्वंय मानते हैं कि वह एक अच्छे लेखक नही हैं। इसलिए उन्हें अपनी फिल्मों की कहानी के लिए दूसरों की कहानियों की जरूरत पड़ती हैं। उन कहानियों को लेकर वे उनसे अपनी पटकथा तैयार करते हैं और फिर उसे अपने नाम से फिल्मा देते हैं। इस हम चोरी नही कह सकते, क्योंकि गुलजार स्वंय ही बता देते हैं, फलां फिल्म की कहानी उन्होंने किस देशी या विदेशी फिल्म से ली है।

‘खुश्बू’ में भी ऐसा ही है। इस पटकथा पर लेखक गुलजार का नाम है। पर कहानी उनकी अपनी नही। दरअसल यह कहानी बंगाल के प्रसिद्ध उपन्यासकार शरतचंद्र के एक उपन्यास पर आधारित है। जैसे भावना-प्रधान और नारी जीवन का चित्रण करने वाले उपन्यास शरतचन्द्र के होते हैं, वैसी ही इस फिल्म की कहानी है। गांव में छोटी उमर में नायक और नायिका (हेमा मालिनी जितेन्द्र) की शादी हो जाती है। नायक महत्वकांक्षी हैं। शहर जाकर पढ़ाई शुरू करता है। वहीं नौकरी पर लग जाता है। गांव वाली अपनी पत्नी को भुलाकार शहर में ही शादी रचा डालता है। पर नई पत्नी बच्चे के जन्म के समय मृत्यु को प्राप्त हो जाती है। हताश नायक गांव लौट जाता है। पर तब नायिका उसके साथ रहने से मना कर देती है। आखिर उसका अपना स्वाभिमान भी तो है।

‘खुश्बू’ में गुलजार ने हेमा मालिनी के ग्लैमर को बुरी तरह तोड़ा है। ठेठ गांव की औरत के रूप में, मेकअप के बिना भी वह कितनी सुन्दर लग सकती हैं, बस उतना ग्लैमर ही उन्होंने फिल्म में भरा है। अभिनय की दृष्टि से निर्देशक ने फरीदा जलाल से खूब काम लिया है।

जितेन्द्र को तो वैसे भी गुलज़ार का अहसानमन्द होना चाहिये, गुलजार ही उन्हें‘जिगरी दोस्त’ के लगे पच्चा-सी झटके और ‘फर्ज’ के जेम्स बांड जैसे रोलों में से निकलकर ‘परिचय’ में पहली बार एक गम्भीर युवक की भूमिका में लाये थे। ‘खुश्बू’ में भी जितेन्द्र का रोल गम्भीर ही है और छोटी-छोटी मूंछो वाले उनके चेहरे पर यह गम्भीरता सजी भी खूब है गुलजार ने इस पात्र पर मेहनत की है। दर्शक उनके उस रोल को पसंद भी खूब करेंगे।

निर्माता प्रसन्न कपूर की फिल्म ‘खुश्बू’ मूल रूप से एक निर्देशक की फिल्म है। पूरी फिल्म पर निर्देशक हावी रहता है। गुलजार के निर्देशन का जो कमाल दर्शक ‘परिचय’ और ‘अचानक’ जैसी फिल्मों में देख चुके हैं, उन्हें ‘खुश्बू’ में इस निर्देशक के कुछ और नये रूप देखने को मिलेंगे।

‘खुश्बू’ के बाद गुलजार ‘मौसम’ लेकर आ रहे हैं। इधर वह स्वयं एक फिल्म में अभिनय के लिये अनुबंधित हुए हैं। इस फिल्म में वह एक क्रांतिकारी की भूमिका निभाएंग यानि गीतकार, संवाद तथा पटकथा लेखक और निर्देशक के बाद अब वह अभिनेता भी बन गये हैं। हमारे दर्शकों को केवल इसी बात का इंतजार है कि अपनी किसी फिल्म में वह अपनी पत्नी राखी को लेंगे। राखी उनके निर्देशन में कैसा अभिनय कर पाती हैं, अगर कभी अवसर मिला तो यह समय बतलायेगा।


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Mayapuri

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