इतने महान थे गुरुदत्त

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044-33 Guru Dutt

 

मायापुरी अंक 44,1975

बात उस जमाने की है जब भारतीय फिल्मोद्योग अपनी बाल्यावस्था से निकल कर जवानी की दहलीज पर खड़ा था। अर्देशिर ईरानी ‘आलमआरा’ से फिल्म इंडस्ट्री को आवाज प्रदान कर चुके थे। कई खूबसूरत हीरो फिल्म आकाश पर सितारों की तरह जगमगा रहे थे। उन दिनों। आजकल की तरह, जिंदगी इतनी तेज न थी, अत: प्रत्येक हीरो के चेहरे पर सौम्यता सरलता बरसती थी और देखते ही बरबस उनकी और खिंचे चले आने को तबीयत कर आती थी, क्योंकि उनके चेहरे पर आजकल के अधिकांश नायकों की भांति जनानापन नही झलकता था।

उसी ज़माने में पृथ्वीराज कपूर, ई. बिलिमोरिया, प्रेम नजीर जैसे नायकों का दर्शकों को ‘क्रेज’ था। इन्हीं में एक खूबसूरत नौजवान थे, निसार, मास्टर निसार, ‘मास्टर’ शब्द का प्रयोग बहुत सम्मान जनक व्यक्ति के लिए किया जाता था। मास्टर निसार अपने समय के जुबिली स्टार भी कहे जाते थे क्योंकि उनकी फिल्मों को सफलता की गारंटी जैसे जन्म से ही प्राप्त थी। तब आजकल की तरह सितारे दौलत से तहखाने भरने के फेर में नही रहते थे। न ही कोई नम्बर दो का धंधा या पैसा ही लेन देन का रिवाज था। हर सितारा अपनी पहुंचा के भीतर पूरी शान शौकत से रहता, दोस्तों-यारों के बीच गुलछर्रे उड़ातें, आये दिन रंगीन पार्टियां होती जिसमें पानी की तरह शराब बहती थी। तात्पर्य यह कि एक हाथ से पैसा लेकर दूसरे हाथ हवा में उड़ा दिया जाता था। फिर धीरे-धीरे वक्त गुजरता गया, न जाने कितने पतझड़ व बसन्त आये और चले गये। इसके साथ ही समाज में भारी उथल पुथल व परिवर्तन आये, नये-नये प्रतिमान व मूल्य स्थापित हो गये। गुजरा ज़माना एक सपना-सा बनकर कहीं खो गया। अशोक कुमार, दिलीप कुमार, श्याम, राजकपूर, देव आनंद जैसे नये सितारों की तेज रोशनी के समक्ष पुराने सितारों की जगमगाहट खत्म-सी हो गयी।

सन् 1954-1955 के आस-पास की बात है, उस समय के प्रसिद्ध व युवा निर्माता-निर्देशक-अभिनेता गुरूदत्त फिल्मोद्योग को पहली सिनेस्कोप फिल्म ‘कागज’ के फूल का निर्माण कर रहे थे। एक सैट पर गुरूदत्त को कुछ एकस्ट्रा कलाकारों की जरूरत पड़ी एकस्ट्रा सप्लायर ने फौरन गुरूदत्त के सामने बहुत से एकस्ट्रा पेश कर दिये। गुरूदत्त अपनी फिल्म में प्रत्येक पात्र व स्थान आदि का चयन बहुत ही सूक्ष्मता व सावधानी से करते थे, यही कारण था कि उनकी तमाम फिल्मों की कथावस्तु, पृष्ठभूमि, पात्र आदि जिंदगी के बहुत करीब के प्रतीत होते थे। एकस्ट्रा कलाकारों को गुरुदत्त जी ने अपनी पैनी निगाह से परखना शुरू कर दिया। एकाएक गुरूदत्त जी की निगाहें अपलक एक चेहरे पर जम गयी। वह धीरे-धीरे उस चेहरे के करीब आकर खड़े हो गये। अधेड़ावस्था के उस चेहरे पर दयानीयता की लकीरें थी। बुझी-बुझी आंखो में निराशा के साथ-साथ काम मिलने की आशा झलक भी किसी कोने में मौजूद थी। एकाएक गुरूदत्त जी ने मुझे और उस एक्स्ट्रा कलाकार की चरणधूलि मस्तक पर लगा ली। सैट पर उपस्थित तमाम लोग खामोश व फटी-फटी निगाहों से आश्चर्यचकित हो यह नजारा देख रहे थे। वह एकस्ट्रा कलाकार और कोई नही थे, वक्त की धूल की मोटी परतों तले दबे हुए अपने वक्त के मशहूर अदाकार मास्टर निसार थे, जिन्हें गुरूदत्त ने उनके इस फटेहाल अवस्था में भी पहचानने में भूल नही की थी। मास्टर निसार यह सब देख गदगद हो गये, गला रूंघ गया, आंखो में अजीब-सी खुशी के आंसू भर आये। सारे शब्द गले में अटक गये। उन्होंने गुरूदत्त को भाववेश में आकर सीने से चिपटा लिया। गुरूदत्त भी भाववेश में आ गये। उनकी आंखे मास्टर निसार को इस अवस्था में देखकर छलक आयी। बोले मास्टर जी दुनियां आपको भूल सकती है, लेकिन मैं नही भूल सकता। मैं नही भूल सकता कि आपका (फिल्म इंडस्ट्री) में कभी एक छत्र राज था। आप आज भी मेरी निगाहों में एक पूजनीय अदाकार हैं। इसलिए आपका स्थान एकस्ट्रा कलाकारों की लाइन में नही बल्कि इस कुर्सी पर है। गुरूदत्त का इशारा निर्देशक वाली कुर्सी की ओर था। गुरूदत्त कहते जा रहे थे और मेरा स्थान आपके चरणों में है। आप मेरी फिल्म में काम नही करेंगे। बल्कि रोजाना आया करेंगे, और इसी कुर्सी पर बैठा करेंगे, जब तक कि फिल्म पूरी नहीं हो जाती।

यह सम्मान पाकर मास्टर निसार फूले नही समाये। खुशी का समन्दर उनके अंदर इस तेजी से हिलोरे लेने लगा कि उनका शरीर कांपने लगा। परंतु दूसरे ही क्षण मास्टर निसार के अंदर का ज्वार ठंडा पड़ गया। शरीर निस्तेज-सा होने लगा। चेहरे पर खिंची लकीरें गहरी हो गयीं और आंखे पुन: निराशा से बुझ-सी गयी। दरअसल मास्टर निसार की माली हालत बेहद खस्ता हो चुकी थी जिस की वजह से उन्हें एक्सट्रा कलाकारों की लाइन में खड़ा होने के लिए मजबूर होना पड़ा था। इंसान सिर्फ सम्मान पाकर तो पेट की ज्वाला को शान्त नही कर सकता। और पैसे तभी तभी मिल सकते हैं, जब काम किया जाये। मास्टर निसार एक अजीब-सी उलझन में फंस गये। फिर कुछ हिम्मत करके झिझकते हुए बोले नही नही, मैं खाली नही बैठ सकता। कोई काम जरूर करूंगा। यह काम नही तो कोई दूसरा ही दे दो।

पर गुरूदत्त जी ने मास्टर निसार की याचिका को ठुकरा दिया। बोले मास्टर जी, मेरे पास इस वक्त आप के लायक दूसरा काम भी तो नही है। एक्सट्रा का कार्य आप से करवा कर मैं आपका अपमान नही कर सकता। आप नही जानते मास्टर जी, आपके यहां बैठने से मुझे कितनी प्रेरणा मिलेगी। आपके सुझाव मेरे लिए कितने बहुमुल्य होंगे। आपका आशीर्वाद पाना मेरे लिए फख्र की बात होगी। आप यहां रोजाना बैठेंगे और शूटिंग खत्म होने पर अपना पारिश्रमिक लेकर जाया करेगें। जब तक कि फिल्म पूरी नही हो जाती।

यह सुन कर मास्टर निसार अपने दिल के अंदर की खुशी के तूफान को रोक न सके और फूट-फूट कर रोते हुए गुरूदत्त के चरणों में गिर पड़ने को हो गये, लेकिन गुरूदत्त जी ने उन्हें ऐसा न करने दिया।

मुझे यह घटना अपने समय के प्रसिद्ध नायक-खलनायक-निर्माता राम सिंह जी ने सुनाई थी। इसे सुनाने व सुनने के बाद छायी एक लम्बी चुप्पी के दौरान मैं उनके ह्रदय में छिपे दर्द का अंदाजा लगाता रहा था।

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Mayapuri