अनेक जिंदगियां जीने वाले लेखक-निर्माता-निर्देशक रामानन्द सागर

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मायापुरी अंक 42,1975

लेखक-निर्मात-निर्देशक रामानंद सागर का जीवन एक रोमांचक उपन्यास की तरह है। उन्होंने 29 दिसम्बर, 1916 से लेकर आज की तारीख तक न जाने कितनी जिंदगियों के तूफानी उतार-चढ़ाव देखें हैं। वह प्राय: अपने अपने बारे में कहते हैं कि जब मैं पैदा हुआ तो रोया नही, बल्कि खामोश रहा।

जब रामानंद सागर बड़े हुए तो उनकी यह खामोशी हल्की मुस्कुराहट में बदल गयी और वह जिंदगी की भयानक से भयानक परिस्थितियों में भी खामोशी के साथ मुस्कुराते रहे।

सागर साहब का जन्म श्रीनगर में हुआ था पर उनका मूल घराना पेशावर का था। उनके परदादा लाला शंकरदास चोपड़ पेशावर से श्रीनगर जाकर बस गये थे। उनके पिता दीनानाथा चोपड़ा शायर थे जिन्होंने अपना उपनाम रखा था ‘पेशावरी’ सागर साहब भी पहले बड़े होने पर अपने नाम के आगे चोपड़ा ही लिखते थे। नाना की गोद में जाने पर उन्होंने अपना नाम रामानंद बेदी कर लिया। जब कश्मीर की महकती शीतल हवाओं ने उनकी तरुणाई को महकाया तो वह रामानंद बेदी से रामानंद कश्मीरी हो गयें और फिर समय की धड़कनों का अहसास करते हुए सभी जाति वर्ग और सम्प्रदायों को अपने में समेटने वाले रामानंद सागर हुए।

बचपन से ही सागर साहब का अपनी मां से विछोह हो गये थे। इस विछोह के बाद तो उनके जीवन में कष्टो की ऐसी आंधी आयी कि यदि उनके स्थान पर और कोई होता तो वह जीवन के सामने हार कर आत्मसमर्पण कर देता। यद्यपि उनके घनिक नाना ने उनको गोद लिया था पर उनकी छत्रछाया में उन्हें वह प्यार और संतोष नही मिला जिसकी उन्हें जरूरत थी। वह उसकी तलाश में लाहौर की खाक छनते फिरे। छोटी सी उम्र में ही उन्हें एक सुनार की शर्गिर्दी करनी पड़ी उन्होंने साबुन बेचने का धंधा भी किया, फिर ट्रकों के क्लीनर बने, क्लर्क बने, टाइपिस्ट बने और जिंदगी को ऐसे अनुभवों से सींचा कि जिनकी वजह से ही रामानंद सागर रामानंद सागर बने। उन्होंने हर कठिनाई का सामना करते हुए फारसी भाषा का सबसे ऊंचा अंग्रेजी के एम.ए. के बराबर वाला ‘फज़ल’ का डिप्लोमा प्रथम श्रेणी में प्राप्त किया। पर जीवन-संघर्षो से लड़ते-लड़ते वह तपेदिक के शिकार हो गये। इस मरणासन्न स्थिति में भी उन्होंने हार नही मानी। मृत्यु से लड़ते हुए उन्होंने बिस्तर पर पड़े-पड़े ‘टी.बी के एक मरीज की डायरी लिखी’ जो उर्दू ‘मिलाप’ में प्रकाशित हुई। उस डायरी के छपते ही सागर साहब भावुक एवं संवेदनशील कथाकार के रूप में एकदम प्रसिद्ध हो गये। उसके बाद वह स्वस्थ हो कर ‘मिलाप’ के संवाददाता और कॉलम राइटर बने। पत्रकार जीवन के अनुभवों का स्मरण करते ही वह गर्व के साथ कहते हैं, “मुझे अभिमान है कि मैं पत्रकार भी रहा हूं”

रामानंद सागर अपनी भावुकता के कारण संवेदनशील कथाकार बने और जीवन के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण रखने के कारण वह कुशल पत्रकार बने। लाहौर पहुंचते ही सागर साहब की गणना उर्दू के श्रेष्ठतम लेखकों में होने लगी थी। उस समय के कृष्णचंदर, राजेन्द्र सिंह बेदी, इस्मत चुगताई, ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे टी.बी कलाकारों के साथ उनका नाम लिया जाने लगा। उर्दू के प्रसिद्ध लेखकर और टीकाकर प्रो.कन्हैयालाल कपूर ने उन दिनों अपने एक लेख में लिखा था जवान लेखक और लेखिकाओं में कृष्ण चंदर के बाद यदि मुझ पर किसी का प्रभाव पड़ा है तो रामानंद सागर का..

सन् 1947 में देश की आजादी के साथ ही देश के विभाजन से उनका भावुक मन कराह उठा। मानव मन को कलुषित करने वाले जहरीले स्वार्थो से, संकीर्ण धार्मिक भावनाओं से और अंधविश्वासों के वहशीपन से उनका कोमल मन कराह उठा। वह व्यथित हो उठे और उनकी सारी वेदना ‘और अंद कार इंसान मर गया’ उपन्यास के एक-एक शब्द में फूट पड़ी। इस मार्मिक उपन्यास ने देश की आत्मा को छुआ और न जाने कितने लोगों को सहजल किया।

विभाजन के बाद जब सागर साहब भारत आये तो उनके पास कथाओं से भरे एक सूटकेस के सिवा कुछ नहीं था। श्रीनगर में सीमा अधिकारियों ने उन्हें वही रोक लिया और उस सूटकेस को वही छोड़ने को कहा। यह भला कैसे हो सकता था? यही तो उनके जीवन का खज़ाना था। यही तो उनका जीवन था जिसे बनाने के लिए उन्होंने न जाने कितनी रातें जागते-जागते काट दी थी। उन्होंने बड़े साहस से कहा यह सूटकेस उस पार जा सकता है तो मैं जाऊंगा वर्ना मैं उसी के साथ बलिदान हो जाऊंगा यही मेरी जिंदगी है। अंत में, सागर साहब की जीत हुई और वह अपनी उन कहानियों को लेकर भारत आये।

भारत में आते ही वह फिल्मी क्षेत्र में आ गये। वैसे उनकी फिल्मी-जिंदगी की शुरूआता लाहौर में ही हो चुकी थी। यह जिंदगी उन्होंने पंचोली स्टूडियोज में एक ‘क्लेपर बॉय’की हैसियत से शुरू की। बाद में उनके सुन्दर रूप को देखकर पंचोली साहब ने उन्हें अपनी फिल्म ‘कोयल’ में हीरो बनाना चाहा पर अचानक देश विभाजन के कारण सारी योजना खटाई में पड़ गयी।

इसके बाद की जिंदगी पर रोशनी डालते हुए स्वयं सागर साहब ने लिखा पकिस्तान बना और मैं दिल्ली चला आया। एक दिन मौलाना आजाद ने संदेश भिजवाया कि सरकार उन्हें ‘पब्लिकेशन्स डिवीज़न’ में नौकरी देना चाहती है इंफॉरमेशन ऑफिसर की ग्यारह सौ रुपये मासिक लेकिन अपुन को यह भी नही जमा अर्जी लिख तो दी, दो दिन के बाद जॉइन करने की भी तैयारी कर ली थी। पर न जाने क्यों, अर्जी डाक में डालने से पहले ही फाड़ कर फेंक दी। और मुंबई चला आया। सोचता रहा क्या करूं, क्या नही? अचानक एक दिन पृथ्वी थियेटर्स चला गया और पृथ्वी राज कपूर से उनके लिए अच्छा-सा नाटक लिखने की बात कर आया। कुछ ही दिनों में यह नाटक तैयार हो गया जिसका नाम रखा ‘कलाकार’ पृथ्वी थियेटर्स में काम करते हुए मैंने एक और नाटक लिखा जिसका नाम था ‘गौरव’ तभी एक दिन संयोग से राज कपूर से मुलाकात हुई। बातों ही बातों में मैंने उनके लिए ‘बरसात’ लिखने की हां भर ली हालांकि इसके पहले महबूब खां से फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखने की ना कर आया था, पर जाने भाग्य का ऐसा चक्कर चला कि तीस से भी ज्यादा फिल्मों की कहानियां और पटकथाएं लिख डाली। आज भी मैं ना-ना करते हुए हां भरने के उस दौर के बारे में सोचता हूं तो आश्चर्य करता हूं।

राज कपूर की ‘बरसात’ की सफलता से प्रेरित होकर रामानंद सागर भी बड़े उत्साह से फिल्मी दुनियां में कूद पड़े उन्होंने कथा लेखन के साथ-साथ निर्माण-निर्देशन का काम भी शुरू किया। उनकी पहली फिल्म थी ‘मेहमान’ जिसमें उस समय के प्रसिद्ध कलाकार प्रेमनाथ और निम्मी की जोड़ी थी। पर ‘मेहमान’ की यह जोड़ी ‘बरसात’ की राज कपूर और निम्मी की जोड़ी की तरह ‘हिट’ नही हुई। तब उन्होंने बलराज साहनी और सुलोचना जैसे मंजे हुए कलाकारों को लेकर ‘बाजूबंद’ बनायी। दुर्भाग्य से वह भी हिट नही हुई।

रामानंद सागर के फिल्मी-जीवन को गहरा आघात लगा। इसी बीच एक घटना ने उनके जीवन को नया मोड़ दिया। भारत सरकार की ओर से उन्हें कुछ साहित्यकारों और फिल्मी हस्तियों के साथ भारत-भ्रमण का निमंत्रण मिला। इस प्रतिनिधि-मंडल में जैमिनी स्टूडियोज के मालिक और अनेक कामयाब फिल्मों के निर्माता एस.एस. वासन भी थे। वह उन दिनों ‘चंद्रलेखा’ जैसी भव्य फिल्म बना रहे थे। बातों ही बातों में वासन साहब रामानंद सागर की बातों से प्रभावित हुए और उन्होंने उन्हें अपनी फिल्मों की कहानियां लिखने का निमत्रंण दिया। स्व. वासन की निर्माण संस्था जैमिनी के लिए सागर साहब ने पहली फिल्म लिखी ‘इंसानियत’ जिसमें दिलीप कुमार, देव आनंद और बीना रॉय जैसे चोटी के कलाकारों ने अभिनय किया था। इसके बाद जैमिनी के लिए उन्होंने ‘घूंघट’‘पैगाम’ और ’जिंदगी’ जैसी उल्लेखनीय फिल्मों की कहानियां लिखीं जिनमें ‘घूंघट’ और जिंदगी का निर्देशन भी सागर साहब ने किया था। ‘घूंघट’ में उस समय के प्रसिद्ध कलाकार बीनारॉय, आशा पारेख, प्रदीप कुमार और भारत भूषण थे। ‘जिंदगी’ के कलाकार थे राजेन्द्र कुमार, राज कुमार और वैजयंती माला ‘पैगाम’ का निर्देशन स्वंय वासन ने किया था, जिसमें दिलीप कुमार, राज कुमार और वैजयंती माला ने अपनी जिंदगी की बेहतरीन भूमिकाएं की थी। इनके अतिरिक्त उन्हीं दिनों रिपब्लिक फिल्म्स कॉरपोरेशन की और दिलीप कुमार ने अभिनय जीवन की श्रेष्ठतम फिल्म ‘कोहिनूर’ की कहानी भी सागर साहब ने लिखी जिसका निर्देशन एस.यू.सन्नी ने किया था। दिलीप कुमार और मधु बाला की रोमांटिक जोड़ी की लोकप्रियता आर.सी तलवार की फिल्म ‘संगदिल’ से आसमान को छूने लगी थी जिसका पटकथा का श्रेय सागर साहब को ही है।

‘घूंघट’ और ‘जिंदगी’ की लोकप्रियता से रामानंद सागर सफल लेखक के साथ-साथ कुशल निर्देशकों की श्रेणी में भी आ गयें। उन्होंने सागर आर्टस के नाम से फिल्म निर्माण संस्था भी खोली जिसके अंतर्गत अब तक उनके निर्देशन में ‘आरजू’’आंखे’’गीत’‘ललकार’ और जलते बदन जैसी फिल्में प्रदर्शित हो चुकी हैं और ‘चरस’ फिल्म निर्माणधीन हैं।

रामानंद सागर की सभी फिल्मों में चाहे वे उनके द्वारा लिखी गयी हों या जिनका निर्माण-निर्देशन भी उन्होंने ही किया हो, मानवीय आदर्शो की बड़ी ऊंचाइयां हैं। उनकी फिल्मों में इंसान के गिरने और उठने की मार्मिक कथायें हैं। यहां तक कि उनकी फिल्मों का प्यार भी सतही नही है वह प्यार जीवन का संगीत है, और ऐसा प्यार है जो शाश्वत है और आगे भी शाश्वत रहेगा। उनकी ‘आरजू’ में एक मित्र अपने मित्र के लिए त्याग करता है। उसमें खलनायक कोई नही है। ‘पैगाम’ में उन्होंने देश के मजदूरों की समस्या को गांधीवादी विचार धारा के संदर्भ में प्रस्तुत कर मजदूरों को सही रास्ता दिखाने की कोशिश की है। उन्होंने अपनी फिल्म आंखे द्वारा जिसमें धर्मेन्द्र और माला सिन्हा ने ह्रदय स्पर्शी भूमिकायें की थी, देश की सीमाओं पर मंडराते खतरों, विदेशी गुप्तचरों के षडयंत्रो, देश द्रोहियों के इरादों और देश की आर्थिक परिस्थितियों पर प्रहार करने वाले तस्करियों से सावधान रहने का सामयिक संदेश दिया है। सागर साहब की रोमांटिक फिल्मों में प्रमुख हैं गीत जिसमें राजेन्द्र कुमार और माला सिन्हा की रोमांटिक जोड़ी के साथ कुमकुम ने भी महत्वपूर्ण भूमिका की हैं। ‘गीत’ आज भी जब कभी रेडियो पर बजते हैं तो उस फिल्म के अनेक कोमल दृश्य हमारी आंखो के सामने नाचने लगते हैं पर उस फिल्म में भी प्रेम के नाम पर शारीरिक हवस की आग नही थी जैसी कि इस ढंग की बनी अधिकांश फिल्मों में देखी जाती है। गीत के बाद सागर साहब के निर्माण-निर्देशन की उल्लेखनीय फिल्म थी ‘ललकार’ जिसमें धर्मेन्द्र, राजेन्द्र कुमार, माला सिन्हा और कुमकुम इन चारों कलाकारों की प्रमुख भूमिकाएं थी। उस फिल्म से आदर्शवादी सागर साहब ने प्रेम कहानी के माध्यम से देश प्यार की भावना को जगाकर दुश्मनों के प्रति जनता को सावधान रहने का महत्वपूर्ण संदेश दिया है। इसी तरह ‘जलते बदन’ से पुराने और नये आदर्शो और मूल्यों के भावनात्मक संघर्ष को पृष्ठभूमि के बीच देश के नौजवानों को संदेश दिया है। आज के युवक किस तरह नये विचारों को ग्रहण करने की ललक में और आधुनिकता का स्वाद चखने की भावुकता में नशीली जिंदगी के शिकार होकर अपने को मिटा रहे हैं इसका ज्वलंत चित्रण हुआ है ‘जलते बदन’ में पर ये दोनों फिल्में‘ललकार’ और ‘जलते बदन’ बॉक्स ऑफिस पर कामयाब नही हुई। सागर साहब को फिर धक्का लगा। फिर भी उनके चेहरे की सदाबहार मुस्कुराहट समाप्त नही हुई। अब वह धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी की जोड़ी के साथ चरस के अंतर्राष्ट्रीय तस्कारी बार लेकर बड़ी रोमांचक फिल्म ‘चरस’ बना रहे हैं।

सागर साहब शक्ति पूजक हैं। वह शिव भक्त हैं। सोमवार को शंकर जी पूजा करने के बाद ही अन्न ग्रहण करते हैं। स्नान करने के बाद वह रामायण का पाठ भी करते हैं। वह अपनी पत्नी लीला सागर, अपने बेटे सुभाष सागर, शांति सागर, आनंद सागर, शांति सागर, आनंद सागर, मोठी सागर और प्रेम सागर सबको प्रेम करते हैं और उनका घरेलू जीवन बड़ा सुखी है। वह अपने जरूरत मंद दोस्तों की भी मदद करते हैं।

रामानंद सागर केवल निर्माता निर्देशक और लेखक ही नहीं, अपने आप में सम्पूर्ण संस्था हैं।


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Mayapuri

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