हिंदी सिनेमा के संगीत के मसीहा मदन मोहन

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madanmohan23

 

मायापुरी अंक 47,1975                                                            

गज़ल के बादशाह, संगीत निर्देशक मदन मोहन जिंदगी की गज़ल गाते गाते सदा के लिए सो गये। उनके होंठ शायद यही गुनगुनाते हुए खामोश हो गये, मेरी याद में तुम न आंसू बहाना पर कभी न कभी कहीं न कहीं उनकी याद आ ही जाएगी और सजल आंखे उनके दर्द भरे संगीत को याद करके यही कहेंगी जाना था हमसे दूर बहाना बना लिया। कुछ ही दिनों पहले ही बात है कि उनके कुछ दोस्तों ने यह फैसला किया था कि उनके मधुर संगीत का यह जुबली वर्ष ‘मौसम’ के प्रदर्शन के अवसर पर गज़लों की शानदार महफिल के रूप में मनाया जाए। उनके संगीत निर्देशन की पहली फिल्म थी ‘आंखे’ जो सन 1950 मे बनी थी। तब से लेकर ‘मौसम’ तक वे दिल को छूने वाली गज़ल ठुमरी और शास्त्रीय संगीत की मधुर धुनों से फिल्म संगीत को सजाते रहे। पर अब बिना उनके वह महफिल कैसे जुड़ेगी?

कौन हमारे बीच बैठकर हारमोनियम पर थिरकती उंगलियों के साथ स्वरों को छेड़ कर कहेगा अब गम को बना लेंगे जीने का सहारा (निर्मोही) अब तो बस आंख मूंद कर ही, दूर से आती हुई उनकी वह आवाज़ सुनते रहेंगे हमारे बीच महफिल में ये अफसाने बयां होंगे….

स्वं मदन मोहन फौजी अफसर होने के बाद भी बंदूक न थाम सके और अपने प्रिय हारमोनियम की ओर लौट आये।

मदन मोहन ने अपनी फौजी वर्दी उतार कर संगीत निर्देशक की सादी ड्रेस पहन ली। वे पहले लखनऊ और दिल्ली रेडियो स्टेशन पर संगीत निर्देशक बने पर वहां भी उनकी प्यास न बुझी। वे अपने साथ सारी जनता को संगीत मे डुबा देना चाहते थे। इसलिए रेडियो से फिल्मों में आ गये।

कौन जनता था कि कसे हुए बदन पर आधी बांहों की रंग बिंरगी जर्कीन टाइट पैंट, पावों में नोकदार जूते पहन कर छोटी-छोटी पैनी नजरों से दुनिया की थाह लेते हुए मदन मोहन अपने संगीत में सारी दुनिया का दर्द समेट लेंगे?

कौन जानता था कि संगीत निर्देशक मदन मोहन 70 से अधिक फिल्मों में संगीत निर्देशक के रूप में अपनी कामयाबी में झण्डे गाड़ देने के बाद भी, हमेशा के लिए विशुद्ध भारतीय संगीत के समर्थक सृजनशील संगीत निर्देशक बने रहेंगे?

कौन जानता था कि संगीत निर्देशक मदन मोहन व्यावसायिक फिल्मों के व्यावसायिक संगीत की चमक दमक के बीच अपने शास्त्रीय संगीत की जोत को अक्षुण्क बनाये रख सकेंगे? कौन जानता था कि उनकी पहली फिल्म ‘आंखे’ का यह गाना, ‘मेरी याद में तुम न आंसू बहाना’ हिट हो जायेगा। और 1970 में ‘दस्तक’ तक पहुंचते-पहुंचते वे फिल्म संगीत का राष्ट्रीय पुरस्कार जीत लेंगे? यह कौन जानता था बिना किसी तरह का हंगामा किये वे फिल्मों में भारतीय संगीत के प्रवर्तक के रूप में लाखों श्रोताओं का दिल जीत लेंगे?

सच तो यह है कि स्व. मदन मोहन ने फिल्मों के माध्यम से शास्त्रीय संगीत को जनप्रिय संगीत बनाया अब तक न जाने कितनी सार्वजनिक संस्थाओं ने उनका सार्वजनिक सम्मान किया। मुस्कुरा कर वे यही कहते रहे कि यह मेरा नहीं, भारतीय संगीत का सम्मान है।

पिछले दिनों भारतीय फिल्में और संगीत की चर्चा करते उन्होंने अपनी छोटी-सी मुलाकात में बताया हमारी फिल्मों में पाश्चात्य संगीत का कोई स्थान नहीं है। सरकार को भारतीय फिल्मों में पश्चिमी संगीत पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए।

यदि फिल्म की कहानी ही ऐसी हो कि जिसमें पश्चिमी संगीत का उपयोग जरूरी हो तो? मैंने पूछा।

मनमोहन ने तमतमा कर दृढ़ स्वरों में कहा तो ऐसी कहानियों पर ही पाबंदी लगा देनी चाहिए।

दो पात्रों को बातचीत के दरमियान कितना टाइम स्पेस रहना चाहिए कि पृष्ठ संगीत से कहानी के प्रभाव और वातावरण को भी उभारा जा सके, यह ज्ञान बहुत कम निर्देशकों को रहता है। यही वजह है कि हमारी फिल्मों का पृष्ठ संगीत पक्ष बहुत ही कमज़ोर है,

ऐसे सुलझे हुए संगीत निर्देशक मदन मोहन हमारे बीच नहीं रहे, पर उनका संगीत हर वक्त हमारे साथ गूंजता रहेगा और हम बार-बार उनके अमर गीतों को गुनगुनाते रहेंगे आइये, आप भी हमारे साथ बैठकर उनके श्रेष्ठ गीतों को गुनगुना कर उनकी याद ताजा कर ले। कौन आया मेरे मनमेरे मन के द्वारे (देख कबीरा रोया), वो भूली दास्तां (संजोग), यू हसरतों के दाग़ मोहब्बत में धो लिए, (अदालत,) कभी न कभी कहीं न कहीं, (शराबी), आपकी नज़रों ने समझा प्यार के काबिल, (अनपढ़) जो हमने दास्तां अपनी सुनायी, (वह कौन थी?) तू जहां जहांचलेगा,(मेरा साया) मेरी आवाज़ सुनो, (नैनिहाल) जाना था हमसे दूर बहाने बना लिये (अदालत), खेलो न मेरे दिल से (हकीकत), सपने में सजन से दो बातें (गेट वे ऑफ इंडिया), हम प्यार में जलने वालों को (जेलर), बयां न करो (दस्तक)…आदि

ये गीत हैं जो हम बार-बार सुनते हैं। फिर भी चैन नहीं पड़ता।

पिछले दिनों उनके संगीत में और भी अधिक ताजगी और संजीदगी आ गयी थी, जिसकी झलक दिखायी पड़ी थी ‘हंसते जख्म’‘हिंदुस्तान की कसम’ ‘हीर रांझा’ और ‘दस्तक’ में इन फिल्मों के संगीत को सुन कर लगा जैसे मदन मोहन के भीतर से एक और नये मदन मोहन का उदय हुआ है जो हमारे फिल्म संगीत को न जाने कितनी ऊंचाइयों पर ले जाने वाला है… कहते हैं‘मौसम’ में सचमुच उनके संगीत ने नया मौसम पैदा कर दिया है।

पिछले दिनों ‘गजल क्वीन’ बेगम अख्तर ने अपनी जिंदगी के बैचेन क्षणों में आधी रात को मदन मोहन को फोन किया और दर्द भरे स्वर में आग्रह किया ‘मदन, आज तुम मुझे फोन से ही वह अपना गीत किधर जाना था.. सुना दो न मदन मोहन भला उनकी बात कैसे टाल सकते थे? पर इस गीत को सुनाने के कुछ ही दिनों बाद ‘बेगम अख्तर’ किधर जा ना ना… गाते हुए न जाने किधर चली गयीं…

और अब … मदन मोहन भी न जाने किधर चले गये


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Mayapuri

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