संगीतकारों की लोकप्रिय जोड़ी शंकर जयकिशन

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ShankarJaikishan

 

मायापुरी अंक 46,1975

कहानीकार जोड़ी में जो लोकप्रियता सलीम-जावेद ने अर्जित की है, कभी ऐसी प्रसिद्धि संगीतकारों में शंकर-जयकिशन को हासिल थी। किंतु संगीतकारों में वह पहली जोड़ी न थी। उनसे पूर्व हुस्न लाल भगत राम की जोड़ी ने कयामत बरपा की थी। हुस्नलाल-भगतराम की फिल्म बड़ी बहन के गीत चुप चुप खड़े हो जरूर कोई बात है.. आदि आज भी सुनिये, एक अजब नशा-सा छा जाता है। जो स्थान आज लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का है उससे कई अधिक पॉजीशन किसी वक्त हुस्नलाल-भगतराम की थी। इसीलिए संगीतकार शंकर (शंकर जयकिशन फेम) बाकायदगी से उनके पास जाया करते थे। और संगीत विद्या सीखा करते थे। शंकर ने उनकी कई फिल्म में उस जमाने में तबला बजाया है। संगीतकार बनने से पूर्व आखिरी बार उन्होंने हुस्नलाल-भगतराम के निर्देशन में फिल्म मिर्जा साहिबा (हीरोइन-नूरजहां) में तबला बजाया था। उन दिनों निर्माता निर्देशक पी.एन. अरोड़ा (हेलन के भूतपूर्व पति) साउंड रिकॉर्डिस्ट हुआ करते थे। नूरजहां अपने गानों के कारण ‘बुलबुल हिन्द’ कहलाती थी। लेकिन एक समय ऐसा आया कि हुस्नलाल-भगतराम की शोहरात का सूर्य अस्त हो गया। पंडित हुस्नलाला मुंबई छोड़कर दिल्ली चले गए। बाद में वहां उनका देहांत हो गया। उनके भाई भगराम ने हालात से मजबूर होकर ‘टेक’ बजाने आरम्भ कर दिये। लेकिन उन्हीं के चेले शंकर ने जब जयकिशन के साथ जोड़ी बनाकर ‘बरसात’ में संगीत दिया तो उन्होंने संगीत की दुनिया में तहलका मचा दिया। उनकी सफलता पर राजकपूर ने खुश होकर कहा था खुदा ही तोड़ेगा तो यह साथ छूटेगा।

और ऐसा ही हुआ। जयकिशन को आंखे बंद होते ही राजकपूर ने शंकर से आंखे फेर ली। और 24 वर्षो का साथ पानी के बुलबुले की तरह खत्म होकर रह गया।


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Mayapuri

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