सैक्स और अश्लीलता में फर्क नापना जरूरी है।

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मायापुरी अंक 20,1975

सामाजिक उद्देश्य और स्वस्थ मनोरंजन सोने में सुहागा पर ऐसे कितने निर्माता निर्देशक हैं जो ईमानदारी से इस पर चलते है। अचानक मेरी आंखो के सामन नाम उभरता है शक्ति सामंत। मैं जब कभी नटराज स्टूडियो जाता हूं सबसे पहले मेरी दृष्टि उन्हीं के कार्यालय की ओर जाती है। शक्ति दा का नाम याद आता है और अनेक फिल्मों के अनेक दृश्य उभर आते हैं, अराधना, कटी पतंग, अमर प्रेम, अनुराग, अजनबी और ताजी फिल्में चरित्रहीन अमानुष

संगीत प्रधान फार्मूला टाइप फिल्म बनाने वाले शक्ति दा में यह परिवर्तन कैसे हुआ ? वे जंगल छोड़ कर अचानक बगीचे में कैसे आ गयें? वे खुद बदल गये या जमाने ने उन्हें बदल दिया ?

इसलिए जब शक्ति दा से उनके कार्यालय में भेंट हुई तो मैनें सीधा एक ही सवाल किया जेम्स बांड टाइप फार्मूला फिल्म बनाते बनाते आप ‘अराधना’ और ‘चरित्रहीन’ या ‘अमानुष’ तक कैसे आ पहुंचे?

उन्होनें बड़ी ईमानदारी से स्वीकार किया दर्शकों की बदलती हुई अभिरूचि ने मुझे बदल डाला। हिन्दी फिल्मों में पिछले दस सालों में भारी परिवर्तन आया है यदि कोई फिल्म देखते समय दर्शक उस फिल्म की कहानी, उसके पात्र और उसके वातावरण के साथ अपना आत्मसात नही कर पाते तो तकनीकी दृष्टि से वह फिल्म श्रेष्ठ होते हुए भी पसंद नही की जायेगी। विभिन्न तरह की फिल्में बनाने के बाद मैं अब इस परिणाम पर पहुंचा हूं कि जिंदगी की वास्तविकता को स्पर्श करने वाली भावनात्मक कहानी पर सवेंदनशीन फिल्म बनायी जाय तो वह दर्शकों को अवश्य प्रभावित करेगी वह फिल्म अवश्य हिट होगी।

अपनी फिल्मों की सफलता पर गर्व करते हुए उन्होंने कहा आप ‘अराधना’ से लेकर ‘चरित्रहीन’ तक कोई फिल्म उठा कर देखिये सब में आप और आपकी जिंदगी होगी वह जिंदगी जो भावुकता के सागर में हिचकोले खा रही है, वह जिंदगी जो सुख दुख की घाटियों पर चढ़ती है और फिसलती है, वह जिंदगी जो वास्तविकताओं से लड़ती है और स्वप्नों में खोयी रहती है। यही कारण है कि मेरी इन फिल्मों की कहानियों और पात्रों को सभी वर्ग के (आम और खास) दर्शको ने सराहा है। मैंने देखा है कि मेरी फिल्में देखने वाले स्त्री पुरुष बच्चे बूढ़े जवान, सभी तरह के दर्शक फिल्मों के दृश्यों अनुसार खिलखिला कर हंसे हैं, तो कभी खूब रोये हैं। कभी मुस्कुराये हैं तो कभी गमगीन होकर खामोश हो गये हैं। यहां तक कि कभी कभी उन्हें क्रोध भी आया और थियेटर से

सैक्स और अश्लीलता का फर्क नापना जरूरी हैं यह कहते हुए निकले हैं…”ऐसा न होता तो अच्छा रहता”

शक्ति दा से यह सब सुना, फिर भी एक शंका रह गयी। मैनें प्राय: उनकी सभी फिल्में ‘अराधना’ से लेकर चरित्रहीन तक देखी हैं सब फिल्मों में किसी न किसी मात्रा में बिना किसी आवश्यकता के भी सैक्स, नाच गाने और हल्के फुल्के हास्य की तरंग देखी है। तो क्या वे अब तक जिस ‘जंगल’ से निकल कर आये हैं, उसके प्रभाव से पूर्णरूप से मुक्त नही हुए ?

जब मैंने इसकी चर्चा की तो उन्होंने कहा फिल्मों को ‘हिट’ करने के लिए, उन्हें थियेटरों पर चलाने के लिए, उनकी बाजारू ‘मार्केट वेल्यू’ प्राप्त करने के लिए थोड़ा बहुत मसाला डालना ही पड़ता है। पर मेरी फिल्मों का यह मसाला यानी सैक्स नाच गाने फिल्म की कहानियों पर हावी नही हैं। सैक्स, नाच गानों का उपयोग मैनें सामजिक विटामिन को स्वादिष्ट बनाने के लिए किया है और फिर वे भी तो हमारी जिंदगी के रस हैं। फिल्मों में जिंदगी के सभी रस होने चाहिए

शक्ति दा से बातचीत करने के बाद कई दिनों तक मेरे मस्तिष्क में सवाल घूमता रहा तो क्या फिल्मों में सैक्स जरूरी है ? क्या सैक्स के बिना जिंदगी अपूर्ण है?

‘फिल्मों में सैक्स’ यह प्रसंग उठते ही निर्माता निर्देशक बाबूराम इशारा का घनीदाढ़ी से भरा दार्शनिक चेहरा मेरे सामने घूम गया जिन पर यह आरोप लगाया गया है कि वे फिल्मों की नयी धारा और नयी सामाजिक चेतना के नाम पर सैक्सी फिल्में बना कर नयी पीढ़ी को गुमराह कर रहे हैं। ‘चेतना’ से लेकर ‘बाजार बंद करों’ तक उनकी सारी फिल्में हिट कहलायी हैं। इतना ही नही, सैंसर बोर्ड भी उनके नाम पर चौंकता है और जब भी उनकी फिल्म उनके सामने जाती है वह अपनी कैंची को और अधिक तेज कर लेते हैं। उनकी ‘बाजार बंद करों’ जैसी एकाध फिल्म को छोड़कर शेष सभी फिल्मों पर सैंसर बोर्ड ने अपनी सारी कानूनी धाराओं को जीवित करके तेज प्रहार किया। इतना ही नही उन्होंने‘सोसायटी’‘नयी दुनियां नये लोग’ यह सच है जैसी फिल्मों को तो बैन ही कर दिया सैंसर से मुक्ति पाने के लिए बाबूराम इशारा ने न जाने कितनी बार फिल्मों की नये सिरे से शूटिंग कर नये संस्करण तैयार किये हैं।

बाबूराम इशारा की पहली फिल्म ‘चेतना’ आयी तो सारे देश में हंगामा हुआ। कालगर्ल की साहसिक, संवेदनशील, जिंदगी के दर्द से, अतुप्त इच्छाओं से कसमसाती उस फिल्म की साहसिक कहानी ने समाज के सड़े गले नासूर की चीर फाड़ की तो पूरा समाज तिलमिला उठा। और फिर उसके बाद तो बाबू ने समाज को तिलमिलाने वाली तेज और गरम फिल्मों का ऐसा सिलसिला शुरू किया कि उनकी ओर उंगलियों उठने लगी और लोग कहने लगे बाबूराम इशारा न्यूडिटी की न्यू वेव लाकर समाज को पथभ्रष्ट कर रहे हैं।“

बाबूराम इशारा पहले निर्माता-निर्देशक हैं जिन्होनें फिल्मी दुनियां में प्रचलित स्टार सिस्टम की परवाह नही की और न उन्होनें प्रतिष्ठित मान्यताओं की परवाह की छोटे बजट की तेज फिल्में बनाकर उन्होंने‘फिल्मों में सैक्स’ के प्रति सबको सजग कर दिया। उन्होनें अपनी प्राय:सभी फिल्मों (‘जरूरत’’मान जाइये’‘मन मेरा तन तेरा’‘दिल की राहें’‘नयी दुनिया नये लोग’‘सोसायटी’‘समर्पण’‘कागज की नाव’‘सोने का पिंजरा’ आदि) से समाज के आडम्बर का सामाजिक सड़ी गली मान्यताओं का, सामाजिक विकृतियों और विषमताओं का पर्दाफाश किया पर माध्यम वही सैक्स गोया सैक्स जिंदगी की ऐसी गलियारा है जिसके भीतर जाकर ही जिंदगी की वास्तविकताओं को देख सकते हैं।

बाबूराम इशारा से मुलाकात होने पर जब मैनें इसी प्रसंग पर बातचीत शुरू की तो उन्होनें बड़ी गम्भीरता से कहा लोगो ने मेरी फिल्मों को सही ढंग से नही समझा और शायद इसी कारण मैं गलतफमियों का शिकार हुआ हूं। मैं स्वीकार करता हूं कि मैं न तो आर्ट फिल्म मेकर हूं न मैं मेलोड्रामा में विश्वास करता हूं आंसू लाकर दर्शकों को भुलावे में डालना फिल्मों की इस प्रवृति का मैं विरोधी हूं। मैं जिंदगी को उसके कटु सत्यों के साथ अभिव्यक्त करना चाहता हूं। आज हमारी जिंदगी बड़ी तेज हो गयी है और इस तेज जिंदगी में सैक्स बड़ी पार्ट प्ले करती हैं। उस सैक्स की आड़ में बड़े बड़े कारनामे और हथकण्डे होते हैं। में उन्हीं का भण्डाफोड़ कर रहा हूं। चूंकि मै तेजी से भागती हुई जिंदगी की सच्चाइयों को पेश करना चाहता हूं तो स्वाभाविक रूप से तेजी से भागती हुई जिंदगी पर जो मुलम्मा लगा है उसे मुझे स्पर्श करना ही पड़ता है। यही गलतफहमी हो जाती है। सैक्स में नग्नता में, अश्लीलता में, मादकता और उत्तेजना में सभी में बड़ा फर्क है और जब तक वह फर्क सही रूप से नापा नही जायेगा, मेरे बारे में इसी तरह की गलतफहमियां पैदा होती रहेंगी और आज का समाज उसी तरह मेरी ओर उंगलियां उठाता रहेगा और समाज की झूठी मान्यताओं का शिकार सैंसर बोर्ड भी उसी तरह मुझे करघरे में खड़ा करता रहेगा। मैं तो इतना ही कह सकता हूं कि मेरी नीयत साफ है। मैं समाज की गंदगी हटाना चाहता हूं गंदगी फैलाना नही चाहता बस इतना ही।

मैनें देखा इस तरह गंभीर विचार प्रकट करते हुए बाबूराम इशारा काफी उत्तेजक हो चुके हैं बात समाप्त करने पर जब वे हंसे तो उस हंसी में भी मुझे चिंगारियां सी चमकती नजर आयी।


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Mayapuri

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