अभिनय पहलवानों का अखाड़ा नही है – धर्मेन्द्र

1 min


aankhen

 

मायापुरी अंक 41,1975

अजंता आर्टस के डबिंग केटर में ‘प्रतिज्ञा’ की डबिंग के दौरान धर्मेन्द्र से भेंट हुई तो हमने उनसे पूछा, सुना है आप राजेश खन्ना के साथ काम करने से कतराते हैं क्योंकि वह सामने वाले पर छाने का भरपूर प्रयत्न करते हैं?”

अभिनय पहलवानों का अखाड़ा नही है जो कोई किसी पर छा जाए। यहां तो हर कोई अपना अपना रोल अदा करने आता है। मैंने आजतक सबके ही साथ काम किया है। मुझें किसी किस्म का ‘काम्पलेक्स’ नही है। कोई क्या कर रहा है मुझें इसकी कभी कोई परवाह नही रही। मैं अपने काम से काम रखता हूं आजतक राजेश के साथ ऐसी किसी फिल्म का ऑफर नही आई है। जब आएगी तो जरूर करूंगा। वैसे राजेश और मैं रिंकू फिल्म में काम कर रहे हैं। किंतु दोनों के रोल अलग हैं, सीन अलग हैं हमारा आमना सामना नही हुआ है धर्मेन्द्र ने बताया।

आज इस दौर में हर कोई किसी न किसी ढंग से अपने आप की एक खास इमेज स्थापित करने में व्यस्त रहता है। क्या इस प्रकार इमेज की स्थापना करना फिल्म स्टार के लिए अच्छा है?” हमने पूछा।

मेरे विचार में इमेज की स्थापना कलाकार की मौत होती है। इमेज बन जाने के बाद वह एक विशेष घेरे में कैद होकर रह जाता है। इसीलिए प्रदीप कुमार, भारत भूषण, शेखर आदि समय से पहले ही रिटारयर हो गए। इसलिए इस संबंध मे मैं अपने आपको बड़ा भाग्यशाली समझता हूं। मैंने अपने प्रांरभिक जीवन में गंभीर और रोमंटिक भूमिकाएं की हैं बंदिनी, ‘सत्यकाम’’अनुपमा’ से जो इमेज बनी वह सच्चाई और ईमानदार आदमी को इमेज थी। इस इमेज को बनाने में स्व. विमल राय, ऋषिकेश मुखर्जी का बड़ी हाथ रहा है। मेरी दूसरी इमेज ही मैंने की है जो ‘फूल और पत्थर’‘सीता और गीता’ लोफर आदि फिल्मों के कारण बनी। इसके बावजूद मैंने अपने आपको कभी इमेज का पाबंद नही होने दिया। सदा अच्छे-अच्छे रोल की तलाश में रहा। ‘चुपके चुपके’ इसका जिंदा सबूत है ‘प्रतिज्ञा’’चेताली’ और ‘शोले’ में भी आप एक नए धर्मेन्द्र के दर्शन करेंगे धर्मेन्द्र ने अपनी इमेज से विद्रोह करने का प्रमाण देते हुए कहा।

SHARE

Mayapuri