किस्सा तीन मसखरों का

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om-prakash

 

मायापुरी अंक 48,1975

पर्दे की दुनियां और उसके बाहर भी यह लोकप्रसिद्ध है कि अभिनेता ओम प्रकाश जरूरत से ज्यादा बातूनी हैं। ओम प्रकाश अभिनीत किसी भी फिल्म के सेट पर पहुंच जाइए, आप को इस बात का आभास भी नहीं हो पायेगा कि कब रात छिपी और कब दिन उगा। इतने किस्से, इतने संस्मरण वह सुनाए जायेंगा आपको, कि आप क्षण भर को भ्रम में पड़ जायेंगे यह शख्स इंसान है या कहानियों का पिटारा!

लेकिन कहानियों के इस पिटारे को भी जिंदगी में एक बार गूंगे का अभिनय करना पड़ा था और वह भी पर्दे की दुनियां में नहीं, पर्दे के बाहर तब तो फिल्म जगत से उनका संबंध भी नहीं था, तब पर्दे का सवाल भी कहां उठ सकता था उनके लिये! वैसे उन दिनों वेलाहौर रेडियो के स्थायी कलाकार थे, और उनकी आवाज से लोग काफी परिचित थे।

लड़ाई का जमाना रावलपिंडी से लाहौर का सफर। फौजी जवानों से ठसमठस रेलगाड़ियां, और उस भीड़ के बावजूद यात्रा की अनिवार्यता सोच लीजिए क्या हालत रही होगी उस जमाने में हम आप जैसे नागरिकों की!

थर्ड क्लास का टिकट था ओमप्रकाश के पास, जगह थी मात्र फर्स्ट में वह भी तीन चार अंग्रेज सैनिक अधिकारियों के मध्य। मरता क्या न करता, उसी में घुस कर जगह बनाने की कोशिश कर डाली उन्होंने। सैनिक अधिकारी अपनी अनजानी, अनचिन्हों टामी अंग्रेजी में गिटपिट किये जा रहे थे उस समय और ओमप्रकाश, उनकी उस घसीट जबान से अनभिज्ञ कुछ समझ नहीं पा रहे थे कि किसी तरह आखिर उन लोगों की वार्तालाप में वह योगदान करें?

तभी उन्होंने सोचा, क्यों नहीं इनके सम्मुख गूंगे का अभिनय कर डाला जाये, इज्जत तो बच जायेगी आखिर किस्सा यह था कि खानपान, सुरा सेवन आदि कृत्यों के बाद सैनिकों ने जब ओमप्रकाश से पूछा कि क्या वह जन्म से ही गूंगा हे, तो उन्होंने इस तरह अपना सिर हिलाया जिससे हां और ना दोनों ही प्रकट हो रही थी।

सैनिकों के दिल में उनके प्रति सहानुभूति जगी। उन्हें भी खिलाया पिलाया, आराम करने की जगह दी। सुबह होने पर नाश्ता भी उन्हें मिला, और खूब मजे के साथ उनकी वह यात्रा पूरी हुई।

लेकिन लाहौर पहुंचने पर इस अभिनय का भंडाफोड़ जब हुआ तो वे अंग्रेज सैनिक भी हंसी से सराबोर हो गये जिन्होंने उन्हें अपंग समझ कर ओमप्रकाश की इतनी खातिर तवज्ज़ो की थी। हुआ यह कि जो व्यक्ति ओमप्रकाश को लेने स्टेशन आया, उसने पूछ ही लिया: कहिए बर्खुरदार सफर कैसा कटा?

सैनिक अधिकारी घूर-घूर कर उन्हें देखे जा रहे थे, और ओम थे कि उनकी जुबान अपने में ही सिमटती जा रही थी।

तभी, अपने आत्मविश्वास का संचय करते हुए वह बोल उठे: क्षमा कीजिएगा बिरादर, आपकी यह टूटी-फूटी अंग्रेजी मेरे अक्ल के बाहर की चीज थी ना, इसीलिये आपके सामने गूंगा बन जाना पड़ा वैसे यह ना समझ लीजिएगा कि अंग्रेजी मुझे नहीं आती।

और यह सुनते ही उपस्थित व्यक्तियों के मध्य हंसी का जो दौर शुरू हुआ, उसकी समाप्ति स्टेशन से बाहर निकलने के बाद ही हो पायी।


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Mayapuri

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