में इश्क विश्क के चक्कर में नही पड़ता – किरन कुमार

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मायापुरी अंक 16.1975

फिल्म उद्योग में शायद ही कोई ऐसा कलाकार होगा, जिसे किसी हीरोइऩ का प्रेमी न बताया गया हो, और इन्ही फिल्मी अफवाहों के घेरे में आ फंसे किरन कुमार। इन्ही अफवाहों की सच्चाई परखने के लिए मैं किरन कुमार जी के घर की तरफ चल पड़ा आइए आप भी मेरे साथ किरऩ के घर चलिए।

यह देखिये, यह मुम्बई का एक उपनगर है और बान्दा स्टेशन से बहुत करीब ही है किरन का बंगला। मैं स्टेशन से पैदल चल पड़ा। लगभग दस मिनट लगे किरन के बंगले तक पहुंचने में।

यह रहा ‘जीवन किरन’ बंगले का नाम है। तीन मंजिली इमारत का मेनगेट खुला था। मैं तुरंत अंदर बढ़ चला। सीढियों चढ़कर ऊपर पहुंचा। दो पल सांस ली में हाफ रहा था, इतनी ढेर सारी सीढ़ियां जो चढ़ी थी।

फिर कॉल बेल दबायी दरवाजा खुला। गेट पर किरन स्वयं मौजूद थे। बोला, ‘आइए किरन ने लूंगी पहन रखी थी और अपने इस लंबे-चौड़े शरीर पर शर्ट, लाल रंग की पहन रखी थी, जिसके ऊपरी सभी बटन खुले हुए थे मुझे उन्हैंने अपने तिकोने ड्राइंग डनलप के नरम गद्दों पर बिठाया उस वक्त मुझे सामने वाली दीवार पर किरन का एक चित्र नजर आया। किसी चित्रकार ने बड़े परिश्रम से बनाया होगा। इसके पहले कि में चित्र के बारे में कुछ पूछता, वह हाथों में सिगरेट लिये आये और बड़े आराम से जमीन पर बैठ गये। वही जीवन साहब भी लूंगी लपेटे चश्मा लगाये, कुछ लिख पढ़ रहे थे किरन ने सिगरेट जलाते हुए कहा, कहिए क्या सेवा करूं आपकी? उत्तर में मैंने ‘मायापुरी’ उनके सामने रख दी। कवर देखते ही उनके मुंह से ‘वाह’ निकल गयी। मैंने कहा, यह भी आप ही की तरह नयी पत्रिका है।

लेकिन लग तो ऐसे रही है जैसे बहुत पुरानी हो। अजी यह हमारे पाठकों और आप जैसे कलाकारों की दुआ का असर है। बस अब अपने शुरू के संघर्ष के दिनों की कहानी सुना डालिये। ताबड़तोड़ किरन जवाब दे ही रहे थे कि एक साहब हाथ में एक फार्म लिये चले गये किरन ने कहा, ये मिस्टर लारी है मैं इन्हें पहचानता हूं, ये आपके सेक्रेटी है, मैंने उत्तर देते हुए लारी को नमस्ते की।

लारी कागज पर साइन करवा कर लौट गये तब किरन ने मेरे सवाल का उत्तर दिया, यार संघर्ष तो अब भी जारी है। कलाकार तो उम्र भर संघर्ष करता ही रहता है। लेकिन मैं तो शुरू के दिनों की बात कर रहा हूं।

‘शुरू में, मैं इंदौर के मशहूर डेली कॉलेज में पढ़ा फिर वहां से पानीपत चला गया, मैंने अपनी जमीन संभाली। खेती-बाड़ी की और साल भर बाद बम्बई लौट आया। ‘उसके बाद मैनें पूना फिल्म एंड टेलिविजन इंस्टीट्यूट में प्रवेश लिया। किरन भाई, सुना है आप वहां बहुत दादागिरी किया करते थठीक सुना है आपने। पूना में हम बहुत शैतानी, शैतानी तो नही कहेंगे, हां बदमाशी किया करते थे। रजा मुराद और मैं बहुत ही ज्यादा बदनाम थे। जानते हो हम अकेले एक साथ 20-20 लड़को को पकड़ कर पीट दिया करते थे।

इसका नतीजा यह रहा, कि हमें इंस्टीट्यूट से निकाल दिया गया। बेचारे वे भी क्या करते, बदमाश जो थे हम लेकिन इंस्टीट्यूट में स्ट्राइक हो गयी। इंस्टीट्यूट बंद एक दिन, दो दिन, तीन दिन चार दिन नही पूरे चालीस दिनों तक हमारा इंस्टीट्यूट बंद रहा। आखिरकार हमारे आधिकारियों ने हार मान ली और हमें वापस लिया गया।

सचमुच आप तो बहुत ज्यादा इसके पहले कि मेरा वाक्य पूरा होता, किरन ने कहा, मजे की बात यह है कि अब यही किरन बहुत शांत और सरल स्वभाव के हो गये हैं। यहां तक कि अब तो मैं भी डरता भी हूं।

‘अरे, किससे? मैं चौंका। पटाखों से..

धत्त तेरे की पटाखों से भी कोई डरता है भला। मैंने कहा तो किरन ने जवाब दिया, हां यार, बचपन में, मैं एक दुर्घटना से बहुत ज्यादा डर गया था। जिसका डर अब तक मुझ में समाया हुआ है। पूरी बात सुनाओ भाई। अधूरी समझ नही आ रही।

मै जब लगभग 7-8 साल का था। दिवाली की रात थी। हमारा घर जगमग-जगमग कर रहा था। हमारा ही क्या सारा शहर रोशन था। मैं दो-तीन अन्य लड़को के साथ पटाखों के मजे ले रहा था। मैंने कुर्ता-पाजमा पहन रखा था। काफी देर तक हमने पटाखों की ऐसी-तेसी की कि तभी एक पटाखे ने मेरी ऐसी-तेसी कर दी।

क्या मतलब?

मतलब यह कि मेरे खूबसूरत पजामे ने आग पकड़ ली। मैं बिल्कुलबेखबर था। लेकिन पल भर में जब आग घुटनों तक पहुंची तो मैं चिल्लाया। तुरंत मेरा पजामा खोला गया मैं बुरी तरह सहम गया था और फिर मुझे डॉक्टर के पास ले जाया गया। किसी तरह मैं बच गया, वरना यह किरन कुमार आज ऊपर की दुनिया का फिल्म-स्टार होता।

और तब आप फिल्मी हीरोइनों से इश्क-विश्क नही कर पाते ?

इश्क-विश्क के नाम पर गम्भीरता पूर्वक किरण ने कहा, सच मानो, मैं कभी इश्क विश्क के चक्कर में नही पड़ता। तो फिर ये बातें, ये कहानियां, मैंने पूछा, तो उन्हौंने उत्तर दिया। ‘सब बकवास है। कहकर किरन ने आगे कहा।

‘एक किस्सा और याद आ रहा है। सुना डालिए मैंने तुरन्त पाठकों का हित देखते हुए कहा।

‘बात पूना की है। मैं और रजा शक्लों सूरत से ईरानी लगते हैं, और दोनों ही बड़े तिकड़मी हैं। घर से भरपूर खर्चा आता था, लेकिन वह बहुत जल्दी साफ हो जाता था। 15-20 तारीख तक हम कड़के हो जाते थे। कभी-कभी तो खाने के भी लाले पड़ जाते थे। लेकिन ऐसे मौकों पर हमारा दिमाग खूब काम करता था। कड़की दिनों में हम सूट-बूट पहनते और अपने ईरानी चेहरे का लाभ उठाते,मतलब मैं समझा नही। पूना मे अक्सर ईरानी परिवारों की पर्टियों में हम दोनों पहुंच जाते और खूब भरपेट खाना खाते।

सचमुच आप तो बहुत खिलाड़ी हैं, लेकिन किरन भाई आपकी यह चतुराई यहां फिल्मों में क्यों नही काम आई?

किरन चौंके, पूछनें लगे, क्या मतलब है आपका ?

मेरा मतलब यह है कि इतनी प्रतिभा होने के बावजूद आपकी फिल्में फ्लॉप क्यों हुई? अपराधी इसका ताजा उदाहरण?

फिल्मों के फ्लॉप होने का दोषी कलाकार नही होते, फिर भी मैं तो यही कहूंगा कि फिल्में फ्लॉप जरूर होनी चाहिए ताकि हमें मालूम रहे कि हम में कितनी प्रतिभा, टैलेंट है।

और हम में घमंड पैदा न हो, हम जमीन पर रहें। ‘और शायद इसीलिए आप जमीन पर बैठे हैं।

‘जमीन कहां यार, यह तो कालीन है। वह भी मखमली।

मखमली तो हैं लेकिन में आगे कुछ कहता कि किसी का फोन आ गया किरन ने जाना चाहा तो मैंने कहां, मेरा इंटरव्यू भी पूरा हो गया हैं अब इजाजत दीजिए ‘ठीक है, फिर मिलेंगे। और यह कह कर किरन दरवाजे तक छोड़ने आया।

पूना फिल्म एण्ड टेलीविजन इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा लेकर आने से पहले ही किरन कुमार को सुप्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक लेखक ख्वाजा अब्बास ने अपनी फिल्म दो ‘बूंद पानी’ के लिए अनुबंधित कर लिया हालांकि फिल्म हिट नही हुई, लेकिन किरन के अभिनय की भूरि-भूरि प्रशंसा हुई।

इसके बाद आई ‘बिंदिया और बन्दूक, यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट साबित हुई। किरन को धड़ाधड़ फिल्में मिलती गयी।

सवेरा, ‘आज की ताजा खबर’‘ चालाक’ ‘जंगल में मंगल’ ‘राजा’ ‘काका’ ‘जलते बदन’ और ‘फ्री लव’‘हम जंगली’ है ‘अपराधी, किरन की प्रदर्शित फिल्में हैं। किरन की शीघ्र प्रदर्शित और निर्माणधीन फिल्में हैं ‘अंगार’ ‘रईस’ ‘ज्योतिषी’ ‘राजमहल’ ‘दो गुरू’ ‘अभी तो जीले’‘ भुलाभटका’ ‘बदचलन’ ‘दर्द का रिश्ता’ ‘अंदाजा’ ‘बगावत’ ‘गाल गुलाबी नैन शराबी’

किरन से बातचीत के बीच मुझे लगा कि पहले के और आज के किरन में जमीन आसमान का अंतर है। अब मुझे वह पहले से अधिक प्रतिभावान लगे।

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Mayapuri