जिंदगी इत्तफाक है –रीना रॉय

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मायापुरी अंक 19.1975

‘नई दुनिया नये लोग’की आउटडोर शूटिंग चल रही थी। पूरी यूनिट बैंगलौर से पचास मील दूर एक जंगल में डोरा डाले पड़ी थी। निकट से एक रेलवे लाइन गुजरती थी। सीन लेने की पूरी तैयारी हो चुकीं थी बस एक रेलगाड़ी के आने का इंतजार था। सीन की बैकग्राउंड में एक रेलगाड़ी चाहिए थी।

फिल्म के निर्माता-निर्देशक बी.आर.इशारा ने रीना रॉय और सत्येन को बुला कर समझाया देखों, मेरे पास पैसा बिल्कुल खत्म हैं। यहां पर चौबीस घंटे में सिर्फ एक ट्रेन गुजरती है। ब्रांच लाइन है। तुम दोनों अपने अपने डायलॉग अच्छी तरह दोहरा लो। ट्रेन के आने पर कुछ गड़बड़ हो गई तो मैं पूरे यूनिट को कल बैंगलौर से यहां लाने का खर्चा बर्दाश्त नही कर सकता।

रीना रॉय और सत्येन ने उन्हें विश्वास दिलाया कि ट्रेन आने दीजिए कोई गड़बड़ नही होगी।

दूर से गाड़ी की सीटी सुनाई दी पूरा यूनिट चुस्त मुस्तैद हो गया। गाड़ी समीप आई। रीना रॉय ने सत्येन की आंखो में देखा और अपना डायलॉग बोलनें लगी। इत्तफाक क्या हुआ कि रीना बीच में ही अपना डायलॉग भूल गईं और गाड़ी गुजर गई।

बी.आर.इशारा गुस्से में लाल पीले नीले हो रहे थे। रीना की आंखो में आंसू आ गयेकिन्तु गाड़ी तो गुजर चुकी थी। उनकी गैरजिम्मेवारी की हवा बैंगलौर से मुंबई तक ऐसी फैली कि रीना रॉय के हाथ में आई कई फिल्में दूसरी हीरोइन मार ले गईं।

रीना रॉय का नाम रीना नही है रूपा सिंह है इशारा ने कहा स्क्रीन पर रूपा नही चलेगा। इस नाम को सुन कर यूं लगता है जैसे चम्बल के किसी डाकू का जिक्र चल रहा हो। स्क्रीन पर तुम्हारा नाम होगा रीना।

अब इत्तफाक ऐसा हुआ कि जाने कैसे ‘जरूरत’ के क्रैडिट में रीना के पीछे रॉय चला गया। फिल्म रीना के लिए लक्की सिद्ध हुई इसलिए रॉय को भी रीना ने सदा के लिए अपना लिया। यूं रूपा सिंह बन गई रीना रॉय महज इत्तफाक से। रीना रॉय सुन कर लगता है जैसे रीना बंगाली होगी मगर रीना राजपूत हैं।

रीना की मां कभी नही चाहती थी कि उनके यहां लड़की पैदा हो। उनके पास एक लड़की पहले ही मौजूद थी। वह नित्य कामना करती थी कि है भगवान, इस बार मुन्ना देना। मगर आनी तो मुन्नी थी। हां मुन्नी के हाथ की रेखाएं सौभाग्यशाली थी। बड़ी होकर मुन्नी रीना बनी और उसने सीन में गाड़ी मिस कर दी।

रीना ने गाड़ी तो मिस कर दी थी मगर उसने कमर कस ली कि अब वह अपनी एक्टिंग पर जी-जान से ध्यान देगी। इत्तफाक ऐसा हुआ कि कुछ दिनों बाद एक वैसा ही सीन रीना को जरूरत के लिए देना था। सूरज ढल रहा था विजय अरोड़ा और रीना रॉय बातचीत कर रहे थे कि सूरज ढलने से पहले ही सीन पूरा हो जाना चाहिए था। पहले गाड़ी के साथ रेस थी इस बार सूरज के साथ मुकाबला था। ट्रेन भी चौबीस घंटे में एक बार आती थी, सूरज भी चौबीस घंटे में एक बार ढलता है।

रीना बड़े आत्म विश्वास के साथ इशारा के पास पहुंची और बोली इशारा जी, विजय अरोड़ा को सीन अच्छी तरह समझा दीजिए कही यह कोई गलती कर बैठें और हां, मेरा तो गलती करने का सवाल ही पैदा नही होता। मैनें बैंगलौर में गाड़ी गुजार दी थी मगर इस बार सूरज को नही ढलने दूंगी।

और सचमुच ही रीना ने ढलते सूरज की बैक-ग्राउंड में एक सुन्दर टेक दिया।

‘जरूरत’ रिलीज हुई। लोगों ने रीना को देखा वे उनके बोल्ड दृश्यों से इतने चकित हो गयें कि किसी ने नही देखा, इस लड़की ने फिल्म में एक्टिंग भी की है। लोग उनका शरीर ही देखते रह गए हैं न इत्तफाक

यह भी एक इत्तफाक ही है कि रीना के नैन नक्श आशा पारिख से मिलते जुलते हैं (आशा पारिख ने इस इत्तफाक के लिए आज तक उसे क्षमा नही किया) कहने वाले तो यह भी कह गए कि रीना एक्टिंग में भी आशा की नकल उतारती हैं और क्योंकि आशा एक्टिंग के नाम पर जीरो हैं इसलिए रीना रॉय की एक्टिंग डबल जीरो है। मगर रीना कहती हैं यह केवल इत्तफाक है कि मेरी शक्ल सूरत आशा पारिख से मिलती जुलती है मगर में आशा पारिख नही बनना चाहती। मैं रीना हूं और रीना रहना चाहती हूं।

आज सात जनवरी है और में रीना पर यह सब लिख रही हूं। और आज ही रीना का जन्म दिन है, है न इत्तफाक

यूं देखा जाए तो यह जिन्दगी ही इत्तफाक है।


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Mayapuri

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