फिल्म बनाना भी कुश्ती लड़ने की तरह है दारासिंह

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मायापुरी अंक 42,1975

लगातार सात सप्ताह की तपस्या के बाद दारा सिंह के दर्शन हुए पहली झलक में पहलवान लगे और कुछ खुलकर बातें हुई तो विश्वास नही हुआ कि यह पहलवान निर्माता निर्देशक-लेखक भी इतना नम्र और हंसमुख इंसान हो सकते हैं।

जुहू पर बसा ‘दारा विला’ टैक्सी वाले से लेकर हर ऐरे-गैरे नत्थू खैरे की नजर में है। जब मैं उनके यहां पहुंचा, उनके हाथ में एक लस्सी का बहुत बड़ा गिलास था। लुंगी लपेटे, कमीज पहने दारा सिंह ने कहा, लो जी बादशाहो। तुस्सी लस्सी पीओ।

बड़ी गर्जदार आवाज़ थी यह और फिर एक लम्बा ठहाका।

पल भर मैं हिचकिचाता रहा। लेकिन मिनटों में ही इस जादूगर ने अपनी बातों का जादू मुझ पर चला दिया था।

चर्चा चली ‘धर्मात्मा’ के रोल की। मैंने कहा,

फिल्म ‘धर्मात्मा’ में आपका अभिनय पहले से बहुत अच्छा है। काफी पसन्द किया जा रहा है, अगर कुछ और बड़ा होता तो..”

मेरी बात काटते हुए दारा सिंह बोले,

छोटे बड़े रोल की कोई बात नही। जितना भी काम मिले, उस ईमानदारी से करो यही हमारा कर्तव्य है और अक्लमंदी भी।“

मैंने पूछा,

आपको फिरोज खान से कोई शिकायत तो नही?”

पंजाबी लहजे में दारा सिंह बोले,

अजी नही। मैं भी निर्माता हूं। उन्होंने मुझे जितना काम दिया, उससे मैं बहुत खुश हूं। उनसे कोई शिकायत नही।“

मैंने पूछा,

पहलवान होने के बावजूद आपने फिल्मों में आना क्यों पसंद किया, जबकि यह लाइन अच्छी नही समझी जाती ?”

कौन कहता है यह लाइन बुरी है। अजी बुरे तो हम आप होते हैं, लाइन नही। फिर अच्छे बुरे से हमें क्या लेना देना हमें तो अपने काम से मतलब है और फिर मुझें तो यह लाइन बहुत पसंद है, और इसलिए जब मुझे फिल्म ‘किंग कांग’ में काम करने का ऑफर मिला तो मैंने इंकार नही किया, हां, सोचा जरूर कि कैसे क्या होगा ? अपन ठहरे पहलवान आदमी, हीरो कैसे बनेंगे ? लेकिन कुदरत का लिखा कौन मिटा सकता है। लिखा था एक्टिंग-वैक्टिंग भी करो सो एक्टर बन गए।

“फिर आपको यह निर्माता निर्देशक और लेखक बनने की क्या सूझी ?”

दारा सिंह अभिनेताओं के अदांज में बोले,

बहुत दिनों से मन में एक बात घर कर गयी थी कि एक धार्मिक फिल्म बनानी चाहिये, सो निर्माता बन गये। और फिल्म बनाई ‘नानक दुखिया सब संसार’ (पंजाबी) इसके बाद काम का सिलसिला ऐसा चला कि फिल्म बनाना अच्छा लगने लगा। ‘मेरा देश मेरा धर्म’ बनायी, जिसमें राज कपूर साहब ने भी काम किया। फिर आयी ‘किसान और भगवान’ इसे पंजाबी में ‘भगत धन्ना जाट’ के नाम से बनाया। ये फिल्में खूब चलीं। लेकिन साहब एक बात कहूंगा। फिल्म बनाना भी कुश्ती लड़ने की तरह है, और सचमुच फिल्म उद्योग एक अखाड़ा है। यहां बड़े-बड़े पहलवान हैं, लेकिन कभी-कभी यहां छोटे पहलवान भी नामी पहलवानों को पछाड़ जाते हैं। मेरा मतलब है बड़े निर्माता की फिल्म फ्लॉप हो जाती हैं और छोटे निर्माता की फिल्म हिट हो जाती हैं।“

इन दिनों आप कौन-सी फिल्म बना रहे हैं?” मैंने अगला सवाल पूछा।

दारा सिंह ने जवाब दिया,

अभी दो-तीन फिल्में एक साथ बनाने का मूड है। एक फिल्म के लिए महमूद और कल्याणजी आनंदजी को साइन किया है। बाकी कलाकारों के बारे में अभी तक निर्णय नही किया है दूसरी फिल्म बड़े पैमाने पर बनाने की इच्छा है, जितना रुपया खर्च होगा जी भरकर खर्च करूंगा लेकिन फिल्म एवन बनाऊंगा क्योंकि यह फिल्म महाराणा रणजीत सिंह के जीवन पर आधारित होगी। इसकी कहानी में खुशवंत सिंह के उपन्यास पर तैयार करवाऊंगा। खुशवंत सिंह जी ‘इलस्ट्रेड वीकली’ के सम्पादक हैं, बहुत ही बुद्धिमान और काबिल लेखक हैं वह इस फिल्म को मैं पंजाबी और हिंदी दोनों ही भाषाओं में बनाऊंगा।“

इन फिल्मों के अलावा आप बाहरी फिल्मों में भी अभिनय कर रहे हैं?” मैंने पूछा।

दारा सिंह ने उत्तर दिया,

जी हां, मेरे पासा बहुत-सी फिल्में है। पहले बीच में मैंने कुछ कम फिल्मों में काम किया है, लेकिन इन दिनों खासकर ‘जहरीला इंसान’ की रिलीज के बाद फिल्मों की संख्या बढ़ गयी है।“

मैंने अगला सवाल पूछा,

“क्या अब भी आपको कुश्ती का शौक है”

आप शौक की पूछते हैं, यह तो मेरा धर्म है। कुश्ती मुझें लड़नी पड़ती हैं और लड़ता रहूंगा। आज भी मेरा एक शो है। अभी पिछले दिनों भी कई प्रोग्राम हुए।

दारा सिंह की वजह से ही आज कई सी क्लास के निर्माता प्रथम श्रेणी के निर्माता बने बैठे हैं दारा सिंह खुश हैं क्योंकि उनके प्रशंसको का अपना एक अलग वर्ग है, जो उन्हें आज भी उतना ही चाहता है, जितना कि पहले चाहता था।

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Mayapuri