INTERVIEW!! यादों के फूल बातों के शूल – धर्मेन्द्र

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मायापुरी अंक, 56, 1975

अगर मैं आपसे यह कहूं कि मुझे दर्पण से डर लगता है तो शायद आप विश्वास नही करेंगे। लेकिन यह सच है। रोशनियों के सामने बार-बार आइना देख-देख कर डर लगने लगा है, हालांकि एक वक्त था जब में बचपन में हर वक्त दर्पण के सामने खड़ा रहता था और तरह-तरह के मुंह बनाया करता था। दरअसल मुझे अभिनय का बड़ा शौक था। इसलिए मैं हर फिल्म का पहला शो देखता था और देखने के बाद ऐसा लगता था कि इस हीरो से अच्छा अभिनय तो मैं ही कर सकता था और उसके बाद मैं घर जाकर आइने के सामने खड़ा हो जाता था।

एक बार मैं एक फिल्म देखकर आया था। उस फिल्म में एक कैरेक्टर बहुत ही डरावना था जिसने मुझे परेशान कर दिया था। मैं भयभीत होकर रात को बिस्तर पर पड़ कर सो गया। तभी मैंने सपने में देखा कि मैं आइने के सामने खड़ा हूं और दर्पण में अपने चेहरे की जगह उस डरावने चेहरे को देखकर मेरी चीख निकल गई मैं भयभीत हो गया और सुबह तक सो न सका। बस तब से ही मैं आइने के सामने जाने से डरने लगा। लेकिन फिल्में देखने और देखकर अभिनेताओं की नकल करने का शौक कम न हुआ बल्कि वह शौक दिन व दिन बढ़ता ही गया।

मैं उस जमाने में एक ट्यूबवैल कंपनी में काम कर रहा था, तभी फिल्म टेलेंट कॉन्टेस्ट का पता चला। मैंने भी प्रार्थना पत्र भर कर भेज दिया। मुंबई से बुलावा आ गया। फिल्म फेयर की प्रतियोगिता में सफलता भी मिल गई। लेकिन फिल्मों में काम न मिला। सफलता ने मेरे इस विचार को सिद्ध कर दिया था कि मैं वास्तव में सुन्दर, स्वस्थ तथा आकर्षक इंसान हूं और इसी अनुभूति के साथ मैं फिल्मालय स्टूडियो में निर्माता एस. मुखर्जी से जाकर मिला जिनको नए चेहरों की जरूरत थी लेकिन मुझे देखकर उन्होंने कहा हमें अभिनेता चाहिए फुटबॉल प्लेयर नही। बेकारी से तंग आकर मैंने आइना देखना छोड़ दिया।

फिल्म फेयर के संपादक स्वर्गीय एल.पी.राव को मुझसे बड़ा प्रेम था। सही मायनों मुझे फिल्म इंडस्ट्री में लाने वाले वही है। मैं एल.पी. राव के दिलों- दिमाग में ऐसा घुसा कि निकल न सका। उन्हीं की कोशिश से अर्जुन हिंगोरानी की फिल्म दिल भी तेरा हम भी तेरे मिली।

अब एक दिलचस्प बात आपको बताता हूं कि दिल भी तेरा हम भी तेरे की जब कुछ रीलें तैयार हो गई, और फिल्म के वितरण अधिकार बेचने के लिए निर्माता टी.एम. बिहारी ने ट्रायल शो का आयोजन किया तो फिल्म देखने के बाद वितरकों ने मेरी ही उपस्थिति में बिहारी से खुले शब्दों में कहा अगर आप इस नए लड़के हटा कर कोई काम का हीरो ले ले। तब तो बात बन सकती है।

निर्माता फिल्म बेचने को बड़ा उत्सुक था। वो वितरकों की बातों में आ गया और वितरकों के दबाव पर अर्जुन से कहा इसकी (मेरी) जगह दूसरा हीरो लेकर फिल्म पूरी कर दो। लेकिन अर्जुन हिंगोरानी नए होते हुए भी मेरे कहने के बावजूद अड़े रहे कि हीरो नही बदला जाएगा। मैंने बहुत समझाया, तुम्हें पहली बार डायरेक्शन का चांस मिल रहा है इसलिए दूसरा हीरो लेकर फिल्म पूरी कर दो। लेकिन अर्जुन हिंगोरानी ने हर बार ही कहा ऐसा नही हो सकता। अगर धर्मेन्द्र हटेगा तो मैं भी काम नही करूंगा। आखिर उनकी जिद का यह परिणाम निकला कि निर्माता ने अपना प्रस्ताव वापिस ले लिया।

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फिल्म बनी, रिलीज हुई, लेकिन बॉक्स ऑफिस की देवी मेहरबान न हुई और मुझे मजबूरन अपना बोरिया बिस्तर बांधना पड़ा और एक बार एल. पी. राव ने बिमल राय के लिए बुला भेजा। बंदिनी में काम मिला तो उसी दौरान रमेश सहगल की ‘शोला और शबनम’ भी शुरू हो गई। उन दिनों मैं मोहन स्टूडियो में फिल्म बंदिनी की शूटिंग कर रहा था दोपहर को खाने के वक्त पास के किसी सैट से दिलीप साहब भी हमारे पास आ गए दिलीप साहब को देख कर दिल खुशी से फूला न समाया। चाहा, उनसे लिपट जाऊं क्योंकि शहीद देखने के बाद से मैं उनकी पूजा कर रहा था और दिल ही दिल में उनसे मिलने को तड़प रहा था, वो मेरे सामने थे लेकिन मेरी शर्मीली तबियत दीवार बन गई। क्योंकि दिलीप साहब से किसी ने मेरा परिचय नही कराया और वह वापिस चले गए।

एक दिन फिल्म फेयर के संपादक स्वर्गीय एल.पी. राव ने अपने दफ्तर में मुझे बुलाया और वहां एक दुबली पतली लड़की से यह कह कर परिचय कराया कि वह दिलीप साहब की बहन है। तब मुझे अपनी मंजिल करीब आती नज़र आई। मैंने दिलीप साहब से मिलने की हार्दिक इच्छा प्रकट की ओर उन्होंने अगले दिन शाम के घर आने का निमंत्रण दे दिया। मैं अगले दिन साढ़े छ: बजे शाम को उनके घर पहुंच गया। दिलीप साहब इतने प्रेम और उत्साह से मिले कि दिल में जो अज्ञात भय और झिझक थी, वह खत्म हो गई। मैं भूल गया कि मैं किसी महान कलाकार से बात कर रहा हूं, एक बजे रात को मालूम हुआ कि साढ़े छ: घंटे बीत चुके है लेकिन यह पता न चल सका कि इतनी जल्दी इतना वक्त कैसे गुजर गया? मैं चलने लगा तो दिलीप साहब ने मौसम में नमीं देखकर अपना स्वेटर लाकर दिया। स्वेटर पहनने के बाद मैंने कहा कि मैं यह स्वेटर वापिस नही दूंगा। उन्होंने जवाब में कहा, मैंने वापिस लेने के लिए नही दिया।

खैर तो जनाब दिलीप साहिब का जिक्र तो इसलिए निकल आया कि वह बचपन से मेरे दिलों-दिमाग पर छाये रहे है। चर्चा मैं अपनी फिल्मों की कर रहा था हां, तो बंदिनी और ‘शोला शबनम’ दोनों ही फिल्मे जनता ने पसंद की। मेरे काम की सराहना हुई और कदम जमते चले गये। नई-नई फिल्मे मेरी झोली में आती चली गई। ‘ब्वॉयफ्रेंड’ ‘सूरत और सीरत’ ‘शादी’ ‘हकीकत’ ‘नीला आकाश’ ”आपकी परछाईयां ‘आई मिलन की बेला’ ‘देवर’ आदि फिल्मों में काम करने के बाद ओ.पी. रल्हन की फिल्म ‘फूल और पत्थर’ की। इसके बाद कल तक जो लोग कहते थे तुम पंजाब वापिस चले जाओ, एक्टिंग तुम्हारे बस का रोग नही। फिर वही लोग अपनी फिल्मों की ऑफर लेकर आने लगे। सच यहां लोग चढ़ते सूरज को ही सलाम करते हैं ऐसे में मुझे पता नही क्यों एक उर्दू शेर याद आ रहा है। नशा पिलाके गिराना तो, सब को आता है। मजा तो तब है कि गिरते को थाम ले साक़ी।।

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स्वर्गीय के. आसिफ ऐसे ही आदमी थे। वह कहते थे कि हिम्मत से काम लो तुम एक्टर जरूर बनोगे। उन्होंने ‘सस्ता खून महंगा पानी’ के लिए मुझे पसंद भी किया था लेकिन प्रकृति ने यह सपना पूरा होने से पहले ही आसिफ साहिब को हमसे छीन लिया।

समय धारा समान बहता चला जाता है और पीछे छोड़ जाता है यादें ये यादें कभी-कभी बहुत परेशान करती है यादें भी बहुत है बातें भी बहुत है। लेकिन उन सब को दोहराने का न समय है और न ही इतने ज्यादा पन्ने लेकिन उसके बावजूद मैं किसी का नाम लिए बगैर एक साहब का जिक्र जरूर करूंगा ताकि आपको इस इंडस्ट्री के स्वभाव का पता चल जाए हां तो साहब, वे जनाब मेरे शुरू के मेहरबानों में से है। उनके एहसान है मुझ पर और उन्हीं अहसानों के बदले में मैंने उनकी फिल्में कीं और अब वो कहते है मुझे काम नही आता कुछ लोग और भी इन बात का प्रोपेगेन्डा करते है। लेकिन मैंने कभी यह नही कहा कि मैं बहुत बड़ा अभिनेता हूं एक्टिंग में फिनोमिना हूं। मुझे स्वीकार है कि मैं केवल जीरों हूं जीरो उसके बावजूद भी पता नही लोग क्यों मेरे बारे में अंटशंट बातें फैलातें रहते है? लेकिन मुझ पर इन बातों का कोई असर नही होता क्योंकि मैं एक्टर हूं और यह एक्टिंग जो कभी केवल एक शौक था अब कैरियर बन गई और मुझे अपने कैरियर से प्यार है। इसीलिए आज दर्पण के सामने जाते हुए डर लगता है क्योंकि उसमें ऐसे करम फर्मोओं के चेहरे भी उभर आते है उनके चेहरे देखके माज़ी की कड़वाहटें हाल को बदमज़ा कर देती है और इसके बावजूद मुझे मुस्कुराना पड़ता है मैं एक्टर जो ठहरा।


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Mayapuri

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