जितेन्द्र- एक – कलाकार- एक इंसान

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Jeetendra

 

मायापुरी अंक 11.1974

जीतेन्द्र नाम है एक ऐसे कलाकार का, जिसके साथ आप कोई विशेषण नही जोड़ सकते। ‘गीत गाया पत्थरों ने, ‘बूंद जो बन गई मोती, मेरे हुजूर, ‘जीने की राह’ और ‘परिचय’ का धीर-गम्भीर युवक एक तरफ और ‘फर्ज, ‘जिगरी दोस्त। वारिस व गहरी चाल और जैसे को तैसा का झटकेदार अभिनय करने वाले खिलंदड़ युवक दूसरी तरफ-जीतेन्द्र कभी सीमाओं में नही बंधे, कभी टाईप्ड नही हुए। पर वह हमेशा एक कश्मकश में फंसा रहे है। ’फर्ज हिट होती है तो जीतन्द्र जेम्स-बांड हीरो बन जाते है, ‘परिचय और ‘मेरे हुजूर’ की प्रशंसा होती है तो जीतेन्द्र आगे से चुनी हुई कलात्मक फिल्में ही साईन करने की घोषणा कर देते है।

केवल अभिनय ही नही व्यक्तित्व में भी जीतेन्द्र एक अजीब कश्मकश में फंसे है। जब उनकी फिल्में धड़ाधड़ हिट हो रही थी तब हीरोइन को अपने आगे पीछे चक्कर काटने के लिये वह मजबूर करते थे। और फिर जब उनकी फिल्में वैसे ही धड़ाधड़ पिट गई तो यह उन हिरोइनों के पीछे चक्कर काटने में भी पीछे चक्कर काटने में भी पीछे नही हटे।

दरअसल जीतेन्द्र एक महत्वाकांक्षी युवक है। वह हर दशा में दर्शकों की नजरों में बना रहना चाहते है। फिर चाहे उन्हें इसके लिये मुमताज या हेमा को ही सीढ़ी क्यों न बनाना पड़े प्यार वह निश्चय ही शोभा सिप्पी से करते थे और अब तो शादी भी हो गई। पर अगर उसे पब्लिसिटी के लिये हेमा से शादी भी करनी पड़ती तो वह भी कर सकते थे।

हर रंग के अभिनेता जीतेन्द्र को फिल्मों में लाने का श्रेय जाता है। वही शांताराम को. अपनी फिल्म ‘गीत गाया पत्थरों ने में उन्होंने जीतेन्द्र राजश्री की नई जोड़ी को प्रस्तुत किया था. इस फिल्म में पत्थर की मूर्तियों को तराशने वाले कलाकार की भूमिका मे जीतेन्द्र ने अपने अनगढ़ पर अच्छे अभिनय से प्राण डाल दिये थे. परन्तु इस कलात्मक और उत्तम फिल्म को दर्शकों ने स्वीकार नही किया और इसकी बॉक्स आफिस पर असफलता ने जीतेन्द्र को भी असफल अभिनेता घोषित कर दिया। कई वर्षो तक जीतेन्द्र समय की परतों में खोया रहें और इससे पहले कि फिल्मी दर्शक ‘जीतेन्द्र’ नाम को भुला बैठते, अचानक ‘गीत गाय पत्थरों ने के गम्भीर कलाकार ने ‘फर्ज’ में जेम्स बांड के रुप में पर्दे पर उभर कर हिंदी सिने के दर्शकों को चौंका दिया। कला के नाम पर फिल्म में कुछ भी नही था और सारी फिल्म मार-धाड़ और तेज व हाट गीतों से भरी हुई थी। जीतेन्द्र और बबीता के झटकेदार अभिनय ने फिल्म में अश्लीलता सीमा से भी अधिक भर दी थी। इन सब बातों के बावजूद फिल्म सुपर हिट हुई और कल का असफल जीतेन्द्र भी सुपर स्टार बन बैठे।

‘फर्ज की अत्याधिक सफलता से प्रभावित होकर जीतेन्द्र ने ‘वारिस’ हिम्मत’ ‘अनोखी अदा, ‘गहरी चाल, ‘जिगरी दोस्त, जैसे को तैसा एक के बाद एक कई फार्मूला प्रधान फिल्मों में अभिनय किया। कुछ फिल्में हिट हुई और कुछ फ्लॉप साथ ही जीतेन्द्र भी कभी उठे और कभी गिरे। अभिनय के नाम पर फिल्मों में कही कुछ करने के लिये था और न ही जीतेन्द्र ने अभिनय के किसी नए क्षितिज को खोला। ‘गीत गाय पत्थरों ने’ के कलाकार की कला फार्मूला फिल्मों की चकाचौंध में खो कर रह गई। हां ‘सुहागरात, ‘मेरे हुजूर और जीने की राह में’ जीतेन्द्र ने अवश्य लीक से हटकर कुछ विशेष करने का प्रयास किया।

वही शांताराम के साथ जीतेन्द्र के पुराने अनुबन्ध के कारण शांताराम की एक और कलात्मक फिल्म बूंद जो बन गई मोती’ में जीतेन्द्र सामने आए। परन्तु उस फिल्म ने एक बार फिर जीतेन्द्र और शांताराम को असफल बना दिया। फिल्म भले ही कलात्मक रही हो परन्तु तब जीतेन्द्र पर फार्मूला फिल्मों में अभिनय करते समय जीतेन्द्र अपने जेम्स बांड को नकाब को पूरी तरह न उतार सका और वही शांताराम जैसे सुलझे हुए निर्देशन के निर्देशक में भी अभिनय द्धारा प्रभावित नही कर सका।

इसके बाद जीतेन्द्र ने जहां प्रशंसा प्राप्त की वह फिल्म थी ‘मेरे हुजूर’ राजकुमार के सामने टिक पाना सरल काम नही। कहते है राजकुमार अपने उत्तम अभिनय का प्रदर्शन तभी करता है जब टक्कर में कोई बड़ा अभिनेता सामने हो। और इस टक्कर में राज हमेशा विजयी रहा है. अपने सशक्त अभिनय के बल पर ‘पैगाम’ में दलीप ‘उजाला’, में शम्मीकपूर, ‘मर्यादा’ में राजेश खन्ना, ‘वक्त’ में सुनीलदत्त और ‘काजल’ में धर्मेन्द्र को शिकस्त देने वाले इस अभिनय के राजा को ‘मेरे हुजूर’ में जीतेन्द्र ने कुछ जगह बराबर की चोट दी। इस फिल्म के गायक अख्तर हुसैन ‘अख्तर’ जीतेन्द्र द्धारा रेडियो पर गाये गीत, “गम उठाने के लिये …” दर्शकों के आंसुओं को आंखों में उतर आने के लिये विवश कर दिया था जीतेन्द्र के इस अभिनय की प्रशंसा स्वयं राजकुमार ने की थी। परन्तु बॉक्स आफिस की इमेज और फार्मूला फिल्मों के आकर्षण ने जीतेन्द्र की आंखों पर काला पर्दा डाल रखा था। फलस्वरूप कहानी पर विचार किये बिना ही जीतेन्द्र भले ही धड़ा धड़ फिल्में साईन करता रहा हो परन्तु कला के पारखियों ने न इन फिल्मों को स्वीकारा और न ही जीतेन्द्र के अभिनय को सरहाया।

वैसे तो आठवें दशक की शुरूआत ने ही जीतेन्द्र के फिल्मी जीवन के अन्त की घोषणा कर दी थी और शायद जीतेन्द्र का सितारा अस्त हो ही जाता परन्तु ‘परिचय’ में जीतेन्द्र ने अपने अभिनय और फिल्मी रूप का एक नया और सुखद परिचय दिया तथा समीक्षकों को उसके अभिनय के प्रति अपने विचार बदलने पर विवश कर दिया।

गुलजार के निर्देशक में बनी परिचय में जीतेन्द्र ने अपनी पुरानी इमेज को तोड़ते हुए अपने अन्दर छुपी अभिनय कला को विकसित रूप देकर फिल्म के पात्र को संवारा था।

नटखट और उपद्रवी बालकों को शिक्षा देने के साथ साथ सही राह पर लाने वाले मास्टर के रूप में जीतेन्द्र के सशक्त और प्रभावशाली अभिनय को वर्षो तक नही भुलाया जा सकता और शायद जीतेन्द्र की भी यही इमेज उसे कई वर्षो तक फिल्मी दुनिया में जीवित रहने में सहायता देती रहेगी।

फिल्मी जीवन से हटकर अगर जीतेन्द्र के व्यक्तिगत जीवन को परखें तो अन्य कलाकारों की तरह उसके नाम पर अधिक अफवाहे नही उड़ाई गई। इसका प्रमुख कारण यह भी हो सकता है कि फिल्मों में प्रवेश के कुछ वर्षो बाद से ही जीतेन्द्र एयर होस्टेस शोभा सिप्पी से प्रेम करते आ रहे थे और ‘फर्ज’ के प्रदर्शन के पहले ही यह प्रेम मंगनी का रूप ले चुका था। फिर भी समय समय पर राजश्री, मुमताज, बबीत, लीना और हेमा से जीतेन्द्र के प्रेम को सच्ची-झूठी खबरों ने जोर पकड़ा है.

हेमा के साथ जीतेन्द्र को प्रेम कहानी में कही न कही सच अवश्य है स्वयं हेमा की मां ने कहा था जीतेन्द्र हेमा से प्यार करते है और उससे शीघ्र ही शादी करने का इच्छुक है लेकिन शायद शोभा के सच्चे प्रेम में ताकत थी जिससे जीतेन्द्र धर्मेन्द्र के कारण हेमा से शादी न कर सका। मद्रास में दुल्हन की शूटिंग के समय हेमा जीतेन्द्र की वास्तविक शादी न होने के कारण जीतेन्द्र की इमेज को चोट पहुंची थी और उनकी प्रतिष्ठा गिर रही थी। इधर प्रसाद प्रोडक्शन की ‘विदाई’ प्रदर्शित हो चुकी थी और इस फिल्म से जीतेन्द्र को कई आशाएं थी साथ ही डर भी था कि कही हेमा कांड के कारण ‘विदाई’ की सफलता पर प्रभाव न पड़े।

कई मित्रों और प्रसाद के कहने पर जीतेन्द्र ने समझदारी से काम लेते हुए अपनी मंगेतर शोभा सिप्पी से 31 अक्टूबर को शादी करके अपनी गिरती प्रतिष्ठा को सम्भाल लिया।


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Mayapuri

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