डैनी के कमरे में कबाडा किया परवीन बॉबी ने

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Parveen Babi

मायापुरी अंक 10.1974

जैसे ही दरवाजा खुला सामने डैनी खड़े थे डैनी डैंजीगप्पा। उसी के साथ पाश्चात्य संगीत की स्वर लहरियों ने मुझे अपने घेरे में ले लिया।
कुछ क्षण बाद ही मैं डैनी के फ्लैट मे उसके सामने बैठा था।
“क्या आप परवीन बॉबी से प्रेम करते है ? मेरा पहला सवाल था। यह सवाल मैंने डैनी को चौकाने के लिये किया था। परन्तु डैनी ने निर्विकार भाव से इसे सुना और मुस्करा दिया। तभी कमरे का द्धार खुला और प्रवेश किया परवीन बॉबी ने टांग-दर्शना मैक्सी में झूलती परवीन बॉबी ने एक उड़ती नजर मुझ पर डाली और चली गई पीछे के कमरे की और। उन क्षणों में जिस नजर से डैनी ने परवीन को निहारा, वह अपने आप में मेरे सवाल का पूरा जवाब रखती थी।
डैनी को मैं तब से जानता हूं जब वह इशारा की ‘जरूरत’ और गुलजार की ‘मेरे अपने’ में आये थे। दोनों ही फिल्मों में डैनी का अभिनय पात्रों के चरित्रों के अनुरूप था। इन फिल्मों के बारे में पूछने पर डैनी ने बताया
“इन दोनों फिल्मों मे मेरा काम दर्शकों ने पसन्द किया और आलोचकों ने सराहा था। परन्तु यह फिल्में मुझे काम न दिला सकी। इशारा जी की ‘जरूरत’ से तो मुझे यह भी आशा थी कि शायद हीरो बनने का ही चांस बन जाए। परन्तु फिल्म प्रदर्शन के बाद सारी आशाएं मिट्टी में मिल गई। उसके बाद आई चोपड़ा जी की धुन्ध। देखी थी आपने मेरे स्वीकृति में सर हिलाने के बाद डैनी बोले, ‘धुन्ध में मैं जीनत अमान का अपंग पति बना था। बिना एक कदम चले ही मुझे फिल्म में काम करना था। मैंने किया। बस वही से मेरी गाड़ी चल पड़ी उसी के बाद मेरे पास कई फिल्मों के ऑफर आए जिनमें से अधिकतर मैंने स्वीकार कर लिए।
मुझे याद है ‘धुन्ध’ के प्रदर्शन से पूर्व ही डैनी के गुरु रौशन तनेजा ने मुझ से कहा था, “गुरु की नजर में उसके सारे शिष्य एक से होते है। वह उनको समान रूप से ही स्नेह करता है पर डैनी के बारे में एक बात कहे बिना मैं नही रह सकता. इस लड़के में पात्र के चरित्र को पकड़ने की जैसी खूबी है वैसी मेरे हर छात्र मे नही है। धुन्ध में बेबस अपंग पति के पात्र की बेबसी को डैनी ने बखूबी से उतारा है। एक दृश्य जिस में वह कोई चीज सामने के शीशे पर मार कर चीखता है लाजवाब है.”
फिल्म देखने के बाद उस दृश्य के बारे में मैं तनेजा की रॉय से सहमत था।
यह ठीक है कि ‘धुन्ध’ में प्रदर्शित होते ही डैनी ने कई फिल्में साइन की। ऐसा होना फिल्म इंडस्ट्री में कोई नई बात नही। जैसे ही कोई नया चेहरा ‘हिट’ होता है निर्माता लोग कम पैसों में उसे साइन कर लेते है अगर वह अपनी मेहनत से आगे बढ़ जाता है तो वह फिल्में उसे मिल जाती है। अगर वह पिट जाता है तो निर्माता लोग हाथ जोड़ लेते है। ऐसा डैनी के साथ नही हुआ। इन फिल्मों के साइन करते ही उन्हें पीलिया की बीमारी ने घेर लिया. लम्बे समय तक वह बीमार पड़ रहे। परन्तु उनके प्रोड्यूसरों ने उनकी जगह और किसी को नही लिया. (लेते भी कैसे ? डैनी का जोड़ तो सारी इंडस्ट्री में कोई नही है ) जब डैनी ठीक हुए तो वे फिल्में बननी शुरू हुई.
“धुन्ध के बाद आपकी दूसरी कौन-सी फिल्म उल्लेखनीय है” यह दूसरा सवाल था। मेरा डैनी के लिए। “छत्तीस घंटे इस फिल्म में भी मेरा अभिनय ‘धुन्ध’ की तरह कठिन था। फिल्म में मैं सुनीलदत्त और रंजीत का डाकू साथी था। इसमें मुझे अविकसित बुद्धि वाले पशु समान खूंखार आदमी की भूमिका करनी थी एक ऐसे पात्र को जीना था जो आम जीवन में नही दिखता। यह एक परीक्षा थी मेरे लिए और मैं सही ऊतरा दर्शकों ने मुझे इस रोल में धुन्ध से भी एक कदम आगे पाया।
अपनी आने वाली फिल्मों के विषय में डैनी ने बताया, “पहली तो है फिरोज खान की ‘धर्मात्मा’ दूसरी है, शिलाकार की ‘काला सोना’ तीसरी है, संजय की ‘चांदी सोना’ फिल्में तो और भी कई है परन्तु यह उल्लेखनीय है।
तभी मेरे दिल में एक सवाल उठा और चाहा कि पूंछू जब परवीन बॉबी आपके सामने दूसरों के साथ प्रेम दृश्य करती है, जैसे कि उन्होनें चांदी-सोना में किए है, तो आपको कैसा लगता है।
तभी परवीन बॉबी अन्दर से निकल कर हमारे बीच आ बैठी। डैनी ने मेरा परिचय कराया। हमारी बातें शुरू हो गई। ‘चांदी-सोना की मॉरीशस शूटिंग के बारे में जहां आशा सचदेव ‘बिल शायर’ नामक एक अमरीकन स्टंट मैन के प्रेम में पड़ गई थी।
और चरित्र अभिनेता इफ्तिकार के दूसरे विवाह की अफवाह उड़ गई थी। पर इन सब बातों को लिखने का क्या फायदा ? परवीन ने आखिर में इन्टरव्यू का कबाड़ा तो कर ही दिया था।

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Mayapuri

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