साहस का दूसरा नाम–प्राण

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045-19 pran

 

मायापुरी अंक 45,1975

प्राण की हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी। अभी भी टांग पूरी तरह ठीक नही हुई। लाठी के सहारे चलना पड़ता है। लेकिन शूटिंग करना शुरू कर दिया है। उस दिन सुबहघर पर मिले, मैंने टांग के बारे में पूछा तो उत्तर दिया,

अब तो लगभग ठीक है। ‘राहू केतु’ के सैट पर चोट लगी थी। उस वक्त तो डाक्टरों ने कहा था कि छ: सात दिन की बात है लेकिन अब ऐसा लगता है कि पूरे चार महीने लग जायेंगे..

आप चल तो सकते नहीं। तो शूटिंग कैसे करते हैं?

वैसे तो लाठी का सहारा लेना पड़ता है, लेकिन शॉट के समय हिम्मत करके थोड़े बहुत कदम चल लेता हूं।

इतने में टेलीफोन की घंटी बजी प्राण ने उठा कर बातचीत शुरू की। पता चला कि टेलीफोन निर्देशक देवेन्द्र गोयल का था। उसने पूछा कि क्या प्राण एक आदमी को उठाकर सीढ़ियां उतार सकेगा?

कितनी सीढ़ियां उतरना पड़ेगा?

यही कोई छ: सात होंगी।

ठीक है कर लूंगा लेकिन वह आदमी ज्यादा वजनदार नही होना चाहिए। कहकर प्राण ने टेलीफोन रख दिया।

मैनें इतनी हिम्मत दिखाने की सराहना की। फिर बात बदलते हुए पूछा, आपने खलनायक का रोल अदा करना तब छोड़ना जब प्रेम चोपड़ा मखोटे में आ गये थे?

जी नहीं! जब मैंने खलनायक का रोल अदा करना छोड़ दिया। तब प्रेम चोपड़ा मार्केट में आये।

हम दोनों हंस पड़े। चलते समय प्राण ने मुझे ‘दो झूठ’ देखने के लिए कहा क्योंकि उस में बहुत अच्छा काम किया है उन्होंने, और मैं झूठा वायदा करके चल दिया।


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Mayapuri

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