बेजान भूमिकाओं में जान डालने वाला अभिनेता प्राण

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film warrant pran

मायापुरी अंक 7.1974

फिल्म उपकार के लिए मनोज कुमार को एक ऐसे खलनायक की जरूरत थी जिसके चेहरे से दर्शक घृणा करे लेकिन उसके दिल, उसके जज्बातों से स्नेह इस पात्र के लिए मनोज के निर्देशक ने सभी खलनायकों पर गौर किया और अंत में उसकी आंख का कैमरा प्राण पर जाकर ठहर गया। और इस तरह उपकार में मलंग चाचा के रूप में प्राण आया। अब आप इसी बात को प्राण के नजरिये से सुनिए मैं विलेन की घिसी-पिटी बरसों पुरानी हरकतें करके तंग हो चुका था। यहां तक कि मुझे अपनी एक्टिंग एक ऐसी गली में पहुंच गई लगती जो एकाएक तंग होती चली जा रही हो, मैं किसी ऐसे मौके की तलाश में था जिसमें दर्शकों को विलेन प्राण के अंदर छिपे उस दूसरे आदमी का भी पता चल सके जो सिर्फ प्राण तक ही महदूद था। लेकिन मैनें पाया कि मेरे इंतजार की गली भी तंग होती जा रही है, और इसी बीच एक दिन मनोज कुमार मुझे गया जिसने मुझे उपकार के मलंग चाचा का रोल सुनाया। मलंग का रोल सुनकर मुझे लगने लगा कि एकाएक वह विलेन जो एक अर्से से घिसी-पिटी भूमिकाओं की तंग गली में फसता चला जा रहा था एकाएक ही गली में निकल कर खुले मैदान में आ गया है। और इस तरह प्राण मलंग चाचा बन गया। लेकिन मलंग की भूमिका मिल जाना जितना सरल उतना ही निभाना कठिन था. इसके लिए प्राण ने कई बार मनोज कुमार से डिस्कस की। कई-कई बार इस भूमिका की पृष्ठभूमि को गहराई से कुरेदा दरअसल प्राण को यह पात्र इस कदर अच्छा लगा कि वह अपने अंदर के विलेन को खत्म करके उसमें से एक दूसरे आदमी को जन्म देना चाहता था जिसे दर्शक मलंग चाचा का नाम दे सकें जो दर्शकों के दिलों में प्राण की विलेन वाली इमेज को तोड़कर एक अच्छे आदमी की इमेज बना सके। और इसके लिए प्राण ने अपने बंगले, अपनी कार से बाहर उन मलंगों का अध्ययन करना शुरू कर दिया जो सड़को और फुटपाथों पर जिंदगी जीते है। ठीक उसी तरह जिस तरह उसने जिस देश में गंगा बहती है के राका को खोज निकाला था। उस राका की एक खास हरकत को। यह प्राण का ही दम था कि उसने राका के खतरनाक किरदार को पर्दे पर इस तरह जिया कि जब वह कालर पर हाथ फेरता तो दर्शकों के मुंह से सी की आवाज़ निकल जाती। उनके दिल कांपने लगते। लगता वह अभी किसी का खून कर देगा फिर उपकार में इसी प्राण को दर्शकों ने मलंग चाचा के सिम्पैथेटिक किरदार में देखा और गले लगा लिया। यह प्राण के अभिनय का ही कमाल था कि उसने हिन्दी फिल्मों के विलेन के लिए एक नये रास्ते का निर्माण किया। उपकार में प्राण की इस भूमिका के बाद ही हमारी फिल्मों ने बुरे आदमी के अंदर अच्छे आदमी की तलाश की। हाल ही में फिल्म धर्मा की रजत जयंति पार्टी में प्राण को यह श्रेय दिया गया कि इस फिल्म का सारा बोझ प्राण ने अपने कन्धों पर उठाया है वरना यह एक स्टंट फिल्म थी जो कभी सिल्वर जुबली नही हो सकती थी। प्राण ही वह कलाकार निकले जिन्होंने धर्मा की भूमिका की इस सीमा तक जानदार बना दिया कि वह पर्दे से उतर कर हाल में बैठे दर्शकों के दिल में पहुंच गया। यहां तक कि वे धर्मा को साथ लेकर चले गए। इसी तरह जंजीर में भी प्राण ने एक पठान की तलाश अपने भीतर की और उसे बाहर पर्दे पर साकार कर दिया इस हद तक कि दर्शक हाल से बाहर निकल कर जया भादुड़ी और अमिताभ बच्चन को भूल गए थे लेकिन प्राण पठान के रूप में उनकी आंखों से होता हुआ उनके दिलों में उतर गया। प्राण से एक बार छोटी सी मुलाकात के दौरान मैने पूछा था कि वे किस प्रकार अपनी भूमिकाओं को इस सीमा तक सजाकर पेश कर देते है कि वहां प्राण का सारा अस्तित्व उस पात्र में परिवर्तित हो जाता है जिसे वे पर्दे पर जी रहे हो। और प्राण ने बताया था कि वे अपने पात्रों को अपने आस-पास तलाश करके उनकी सारी हरकतों को चुरा लेते है चाहे फिर वह उनके घर का माली ही क्यों न हो जिसके कालर सहलाने की हरकत को उन्होंने जिस देश में गंगा बहती है में उतार कर राका को प्रदान कर दिया था और दर्शक इंतजार करने लगे थे कि राका अभी बस अभी किसी का खून कर देगा लेकिन प्राण फिल्म दुनिया का वह कलाकार है जो अपने किरदारों को अपने अभिनय का खून देकर जिंदा करता है।


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Mayapuri

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