एक प्रख्यात छायाकार राधू कर्माकर

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Radhu-Karmakar

 

मायापुरी अंक 49,1975

आवारा, बूट पॉलिश, श्री 420, जिस देश में गंगा बहती है, संगम, मेरा नाम जोकर और बॉबी। राधू से मिलते ही ये फिल्में जैसे एकाएक कौंध जाती हैं दिलो दिमाग़ में। उन चित्रों की मुखर प्रकाश और छाया, उनकी थिरकन वे सब जानी अनजानी चीजें जो कैमरे के माध्यम से रूपहले परदे को प्राणदान करती है।

वैसे, आम जनता ने राधू को भले ही “जिस देश में गंगा बहती है” जैसे चित्र के निर्देशन के रूप में पहले पहल जाना हो, लेकिन मूलत: वे फोटोग्राफर ही हैं। उस चित्र के प्रदर्शन के पहले तक अधिकांश दर्शक उनके नाम से प्राय: अपरिचित ही थे, हालांकि “बरसात” के बाद राजकपूर के जितने चित्रों का भी निर्माण हुआ, उनमें प्रमुख छायाकार के रूप में राधू का नाम ही मोटे मोटे अक्षरों में परदे पर आता रहा था। यों ऐसा होना कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। क्योंकि परदे के पीछे काम करने वाले लोगों का प्राय: यही हश्र रहता आया है हिंदुस्तान की इस फिल्मी दुनियां में। एक लम्हें के लिये माना जा सकता है कि उनकी दृष्टि में टेक्नीशियंस का महत्व अभी अंकित नहीं हो पाया है लेकिन अफसोस तो तब होता है जब फिल्म उद्योग के अपने रहनुमा भी हमारी तरफ से आंखे मूंद लेते हैं। राधू ने कहा था।

और राधू के इस निष्कर्ष में तथ्य था। क्योंकि टेक्नीक की दृष्टि से भले ही हमारे देश के फिल्म उद्योग ने आशातीत उन्नति कर ली हो, लेकिन इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि जिन लोगों के माध्यम से यह विकास संभव हुआ है, वही व्यक्ति सर्वाधिक उपेक्षित है आज हमारी फिल्मी दुनिया में।

लेकिन कल तक ऐसी स्थिति नहीं थी राधू ने इसी बात को आगे बढ़ाते हुए बताया था। तब फिल्म उद्योग के ढांचे में निश्चित ही टेक्नीशियंस का एक विशिष्ठ महत्व हुआ करता था और बड़े से बड़े कलाकार के लिये भी यह संभव नहीं था कि वह उसे ओवर शैडो कर सके। आज तो कलाकार ही सब कुछ बन बैठे हैं इस फिल्मी दुनिया में और हम, जो उन्हें सजा संवार कर पेश करते हैं दर्शको के सम्मुख, उनके हाथ की कठपुतली भर है।

सच ही कहा था राधू कर्माकार ने ऐसी हालत में दूसरे किसी के लिये अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का प्रश्न ही कहां उठ पाता है?

वैसे सिर्फ कलाकार ही इस पतन के जिम्मेदार नहीं! राधू कहते जा रहे थे अधकचरे दिमाग वाले निर्देशक भी उतने ही व्यवधान डाल देते हैं हमारे काम में कि फिर नयी कोई चीज़ पेश करने की प्रेरणा नहीं हो पाती।

विदेश में स्थिति यहां से सर्वथा भिन्न है। वहां फोटोग्राफर अपने कैमरे के कौणो का चुनाव करता है, अभिनेता या निर्देशक नहीं। इसी से विदेशी फिल्म उद्योग में विकास की संभावनाएं भी यहां की अपेक्षा कहीं अधिक रहती हैं।

राधू कर्माकार फिल्म उद्योग में सन् 1936 से हैं। प्रारंभ के कुछ बरसों वे कलकत्ता स्थित राधा फिल्म्स के संलग्न रहे थे। और 1941 में उनकी नियुक्ति हुई मुंबई के कारदार स्टूडियो में। आर.के. फिल्म्स में उन्होंने प्रवेश किया था सन् 1950 के आसपास “आवारा” निर्माण के निकटवर्ती काल में। तब से अब तक वे राज कपूर के साथ हैं।

तभी रंगीन और सफेद फिल्मों पर पहुंच कर टिक गयी। आज कल तो निन्यानवे प्रतिशत फिल्में रंगीन बन रही है, लेकिन एक बहुत बड़ी कमी महसूस होती रही है। इन रंगीन फिल्मों में वह यह कि उनके माध्यम से वह गहराई, वह गंभीरता हमें नही मिल पा रही जो श्वेत-श्याम फिल्मों में सहज ही सन्निहित रहा करती थी। पहली रंगीन फिल्म से लेकर आज की अंतिम रंगीन फिल्म में वह प्रभाव नहीं आ पाया है जो सादी फिल्मों में अनायास देखा जा सकता था। क्या कारण है इसका? इस प्रभाव का जिम्मेदार निर्माता है, या उसके रंग?

मेरे इस प्रश्न के उत्तर में राधू कर्माकार बोले थे रंगीन फिल्मों का निर्माण अधिक मुश्किल होता है, क्यों कि उसमें रंगो का बहुमूल्य फिल्म की अनायास खूबियों को सहज ही दबा डालता है।

तो क्या इससे हम यह समझें कि रंगीन फिल्मों में अपेक्षित गंभीरता या गहराई लाना संभव नहीं? राधू से मैंने पूछा था।

हां, रंगीन फिल्मों में वह गहराई आसानी से नहीं लायी जा सकती। एक्शन, डांस ड्रामा जैसी चीजें ही उसमें ज्यादा भली लगी हैं और आज ऐसी ही फिल्में बाहुल्य है। वैसे इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि रंगीन फिल्में अच्छी बन ही नहीं सकती रंगो को फिल्म के अन्याय कलातत्वों पर हावी होने से यदि बचा लिया जाये, तो अच्छी रंगीन फिल्मों का निर्माण किया जा सकता है इसी वर्ष प्रदर्शित ‘गर्म हवा’ ’अंकुर’ या ’रजनीगंधा’ अपनी गहराई में किन श्वेत श्याम फिल्मों से कम है?

वैसे फिल्में रंगीन हों या सादी, जब तक स्टार सिस्टम का भूत हमारे निर्माताओं पर सवार है, तब तक किसी में भी अपेक्षित गहराई नहीं आ सकती है यह राधू का रेखांकित मत है लेकिन भारत में व्यक्ति विशेष की तानाशाही प्रवृति फिल्म संसार में भी बखूबी घर कर गयी है, और इसी से मैं समझता हूं कि हमारा फिल्म उद्योग उस समय तक सर्वाग प्रगति नही कर सकता, जब तक उससे संबंधित प्रत्येक विशेषज्ञ को अपेक्षित मान्यता नहीं दी जाती।


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Mayapuri

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