मुझे अपना परिवार बहुत प्यार है।“ शर्मिला टैगोर

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sharmila

 

 

मायापुरी अंक 43,975

आदेश मिला कि शर्मिला टैगोर का इंटरव्यू किया जाये। कला केन्द्र ने अपने खास लेखक पत्रकार को यह जिम्मा सौंपा और कहा कि इसी सप्ताह इंटरव्यू किया जाये, ताकि ‘मायापुरी’ के पाठकों को शीघ्र शर्मिला टैगोर का इंटरव्यू पढ़ने को मिले।

कला केन्द्र की ओर से शर्मिला टैगोर को फोन (367556) किया गया। फोन पर विपिनचन्द्र नामक सज्जन ने बताया कि शर्मिला जी कश्मीर में शूटिंग कर रही हैं और 24 मई को लौट रही हैं। फोन पर इतना ही मालूम हो सका।

तीन-चार दिन बीतें, 25 मई को ‘कला केन्द्र’ ने शर्मिला को फोन करने की बजाय, मिलना अधिक उचित समझा और मन में निर्णय करके उनके घर में पहुंचे लेकिन हमें निराशा का सामना करना पड़ा, क्योंकि शर्मिला जी कश्मीर से लौटी नही थीं।

आशा निराशा और प्रतीक्षा में तीन दिन निकल गये।

आखिर एक सुबह शर्मिला टैगोर ‘कला केन्द्र’ की गिरफ्त में आ ही गयीं।

बल्लाह, क्या हुस्न पाया है! क्या खूबसूरती है!

बंगाली स्टाइल की प्लेन साड़ी में वे बड़ी भली लग रही थीं। चेहरे पर बला की मासूमियत। एक बच्चे की मां होने के बावजूद पतली दुबली और आकर्षक लग रही थीं। अन्य नयी पुरानी हीरोइनों की तरह उनका पेट फूल कर कुप्पा नही हो रहा था। भला, यह रूप देखकर कौन चुप रह सकता है। सर्वप्रथम कला ‘केन्द्र’ की ओर से शर्मिला से यही सवाल पूछा गया,

आपका यह रूप दिन व दिन निखरता जा रहा है, क्या राज़ है?

खिलखिलाकर मानो जलतरंग बज उठीं हो, हंसते हुए शर्मिला ने उत्तर दिया,

राज! इसमें राज़ की क्या बात है। खूबसूरती मन की शांति से कायम रहती है और मैं बहुत खुश हूं। किसी भी बेकार की बातों से अपना दिमाग खराब नही करती। इसके अलावा मेरा पारिवारिक जीवन बहुत सुखमय है। पैट यानि नवाब साहब मुझें बहुत प्यार करते हैं मेरा बेटा सैफ वह तो मेरे लिए वरदान है। ये दोनों मेरे लिए बहुत जरूरत बन गये हैं और इन्हीं के प्यार का नतीजा है कि शर्मिला टैगोर अभी भी वैसी ही नजर आती हैं, जैसी आरंभ में नजर आती थीं।

‘कला केन्द्र’ का अगला सवाल

इन दिनों यह खबर गर्म है कि आप गर्भवती हैं.. कुछ लोग यह कहते हैं कि कुछ दिनों तक आप गर्भवती थी, अब नही हैं.. यह कैसी पहेली है यह सुन कर नाराज होने की जगह पर शर्मिला बोलीं, वह एक ऐसी पहेली है, जिसकी खोज पत्रकार ही करते हैं और उसका हल भी पत्रकार ही कर देते हैं, एक तरफ स्वंय खबर फैलाएगें कि अमुक अभिनेत्री गर्भवती है और दूसरी ओर स्वंय ही उसका खंडन कर देंगे। बहरहाल मैं गर्भवती नही हूं। और ये सब बेकार की बातें हैं। मुझें तो हैरत होती है कि ये लोग ऐसी बे सिर पैर की खबरें छाप कैसे देते हैं?

मन ही मन आप ऐसे पत्रकारों से नाराज तो होती होगीं?

बिल्कुल नही। हां, शुरू-शुरू में बुरा जरूर लगता था, लेकिन नही अब नहीं, क्योंकि मैं अच्छी तरह जान गयी हूं, समझ गयी हूं कि कुछ पत्रकारों का यही पेशा है कि वे ऐसी खबरें फैलाएं, हा, इस बात का अवश्य दुख रहता है कि कई जिम्मेदार पत्र-पत्रिकाएं भी ऐसी खबरें छाप कर अपने आप के साथ ज्यादती करती हैं, जबकि ऐसा नही होना चाहिए। हिंदुस्तान में अभी तक कोई ऐसी फिल्मी-पत्रिका नही निकली है, जो सिर्फ सही खबरें छापें।

पत्रकारों की आलोचना से दुख तो होता है, लेकिन शर्मिला टैगोर की बात काफी सही थी। अत: इस विषय पर बहस करने की अपेक्षा ‘कला केन्द्र’ ने अपना अगला सवाल इसी निमित पूछा,

एक बात बताइए, ऐसी खबरों से पटौदी साहब पर क्या प्रभाव पड़ता है? तुरंत शर्मिला ने उत्तर दिया,

कुछ नही हम दोनों बड़े मजे ले लेकर ऐसी खबरें पड़ते हैं। मुझे खुशी है कि सैफ और पैट मेरे लिए सरदर्द नही, बल्कि हमदर्द और सुखदायक है। पैट हमेशा मुझें पूर्णतया सहयोग देता है। मैं तो हमेसा उनसे सलाह मशविरा किया करती हूं। यह मेरे लिए गर्व की बात है कि मैं नवाब खानदान की बहूं हूं। यह कोई मामूली बात नही है। उस पर मेरे पैट (नवाब पटौदी) आम आदमी नही है, वे असाधारण प्रतिभा के मलिक हैं। उन्होंने हमेशा मुझें उत्साहित किया है।

कभी-कभार तो उनसे अनबन तो होती ही होगी?

होती भी है और नही भी.. क्योंकि पैट कोई साधारण व्यक्ति नही है। फिर भी जब कभी हमारे बीच कोई बात होती है तो अगले क्षण ही हमारी हंसी कमरे में गूंजने लगती है। वे बहुत शांत स्वभाव के व्यक्ति हैं। और वे मेरे बहुत बड़े गाइड हैं और कोई भी अपने गाइड से अनबन करना पसंद नही करेगा।

‘कला केन्द्र’ ने इंटरव्यू का विषय बदलते हुए अपना अगला सवाल पूछा,

फिल्म उद्योग में आपने कई कला केन्द्र के साथ काम किया है। इन कलाकारों में से आपको सबसे अधिक किस कलाकार से प्रभावित किया है। मतलब यह कि आप किस कलाकार को बहुत अधिक पसंद करती हैं?

आज तक मैंने कई फिल्मों में अभिनय किया है। कई कलाकारों के साथ किया है। लेकिन फिल्म में आने से पूर्व से मुझें शशिकपूर बहुत अच्छे लगते थे। शशि को मैंने पहली बार ‘प्रेमपत्र’ में देखा था। बाद में ‘कश्मीर की कली’ के सेट पर उनसे मुलाकात हुई। काफी मजेदार आदमी हैं। माहौल में बहारें ला देते हैं। धर्मेन्द्र भी इसी किस्म के कलाकार हैं। मु़झे बहुत अच्छे लगते हैं। बड़े शरीफ व्यक्ति हैं। साथी कलाकारों से वे बहुत हंसी खुशी के साथ बात करते हैं। शशि और धर्मेन्द्र के अलावा एक और कलाकार हैं, जो मुझे बहुत पसंद हैं वह हैं राजेश खन्ना शशि और धर्मेन्द्र जितने मस्त तबीयत के कलाकार हैं, राजेश उतने ही शांत स्वभाव के हैं।

इन तीनों कलाकारों से कभी आपकी अनबन तो नही हुई?

जी नही। हां, कभी-कभार किसी विषय पर बहस जरूर हो जाती है। और यह बहस मुझे बहुत अच्छी लगती है।

‘कला केन्द्र’ का अगल सवाल था,

आपने अब तक ‘ग्लैमर गर्ल’ की भी भूमिकाएं निभायीं हैं और भारतीय नारी के महान रूप को भी पर्दे पर प्रस्तुत किया है। इस तरह की भूमिकाओं में आप किस तरह की भूमिका को सर्वश्रेष्ठ मानती हैं?

मैनें आज तक जितनी भी भूमिकाएं निभायी हैं, मैं उन सभी को श्रेष्ठ मानती हूं, क्योंकि भूमिकाएं सभी श्रेष्ठ होती हैं। भूमिका कोई अच्छी बुरी नही होती। अच्छ-बुरा तो होता है हमारा अभिनय। लेकिन प्रसन्नता की बात तो मेरे लिए यह है कि दर्शकों ने मेरे हर रूप को स्वीकार किया। शर्मिला को दर्शकों ने ‘इवनिंग इन पैरिस’ में पसंद किया तो उसी शर्मिला को ‘अनुपमा’ ’अराधना’ जैसी फिल्मों में भी बेहद सराहा अभिनय क्षमता हममें होनी चाहिए कि हम हर भूमिका को अपने अभिनय से उभार कर रख दें।

सुना है कि आजकल आप बहुत कम फिल्में स्वीकार रही है, क्या यह सच है?

जी हां, क्योंकि मैं अभिनेत्री के साथ-साथ किसी की मां भी हूं तो किसी की पत्नी भी। उनके प्रति भी मेरा कुछ कर्तव्य है। मुझें अपना परिवार बहुत प्यारा है। और इसलिए मैं अब तीन-तीन शिफ्टों में काम करने की बजाय एक शिफ्ट में काम करना पसंद करती हूं, यही वजह है कि आजकल मैं चुनी हुई चंद फिल्मों में अभिनय कर रही हूं इससे सिर्फ मुझें ही नही मेरे दर्शकों को भी लाभ होगा और वे मेरी अच्छी फिल्में देख सकेंगे।

‘कला केन्द्र’ ने शर्मिला से और भी कई बातें पूछी। मसलन जन्म से लेकर फिल्मों में प्रवेश तक के बारे शर्मिला ने बताया

उनका जन्म कलकत्ता में हुआ। घर का नाम उनका पैट नाम है रिंकू। और नन्ही रिंकू जब जवान हुईं तो सबसे पहले उसे प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक सत्यजीत रे जैसे महान निर्देशक ने अपनी फिल्म ‘अपुर संसार’ में नायिका बनाकर पेश किया।

हिंदी फिल्मों में सबसे पहले शक्ति सामंत ने उन्हें ‘कश्मीर की कली’ में प्रस्तुत करके हंगामा मचा दिया। इस फिल्म में उन्होंने गांव की भोली-भाली लड़की की भूमिका निभायी थी। और इसके बाद अगली फिल्म ‘सावन की घटा’ में एक बार फिर दोहरी भूमिकाएं निभायी। एक भूमिका में वह गांव की सीधी-सादी मासूम लड़की थी तो दूसरी भूमिका में वह शहर की चंचल बाला बनीं।

इसके बाद ‘इवनिंग इन पैरिस’ के ग्लैमर रोल में शर्मिला ने तहलका मचा दिया। इसके बाद शर्मिला के सामने फिल्मों की लाइन लग गयीं। ‘आमने सामने’ ‘दिल और मौहब्बत’ ‘तलाश’ ‘प्यासी शाम’ ‘माई लव’ ‘ ‘देवर’ ‘सुहाना सफर’ ‘मालिक’ ‘छोटी बहु’ ‘अनुपमा’ ‘सत्यकाम’ ‘दास्तान’ ‘राजा रानी’ ‘दाग’ ‘अनाड़ी’ ‘आ गले लग जा’ आदि और भी कई फिल्में हैं। पिछले दिनों ‘अमानुष’ और ‘चुपके चुपके’ फिल्में प्रदर्शित हुई है। ये दोनों फिल्में शर्मिला के प्रभावशाली अभिनय का प्रमाण है।

शर्मिला टैगोर बहुत मूडी अभिनेत्री हैं। बच्चों जैसी मुस्कुराहट सदैव उनके होंठो पर छायी रहती है। बड़ी खूबसूरत आंखे हैं। ऋषिकेश मुखर्जी की दृष्टि में वह बड़ी अजीव लड़की है। अव्वल दर्जे की मूडी बिगड़ैल और बच्चे जैसी हैं। वह अपने काम के प्रति तनिक भी गंभीर नही रहती। शूटिंग से पूर्व हंसी-मजाक, खेल तमाशे, लगाती रहती हैं। एकाग्रचित होने का कभी प्रयास नही करेंगी। हालांकि वह काम के प्रति गंभीर नही रहती, लेकिन वह काम के प्रति ईमानदार बहुत हैं। शूटिंग के आरंभ होते ही वह इतनी गंभीर हो जाती हैं कि कोई कह नही सकता है कि यह पल भर पहले हंसी मजाक कर रही होंगी। कई निर्देशकों का कहना है कि अगर शर्मिला कुछ गंभीर हो जाये तो वह संसार की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री बन सकती हैं।

बहुत उत्तम प्रकार के सेट का प्रयोग करना शर्मिला का शौक है। यह शौक पागलपन की हद तक कायम है। इसके अलावा उन्हें होटलों के ‘मीनू’ एकत्र करने का भी शौक है। तरह तरह की शैतानियों करने में अभी भी उसे उतना ही आनंद मिलता है, जितना कि बचपन में बगीचे में कच्ची केरियां चुराने में आता था।

शर्मिला की आने वाली फिल्मों में ‘एक महल हो सपनो का’ और ‘त्याग’ शीघ्र प्रदर्शित हो रही हैं। इनके अलावा इस वक्त वह दस बारह अन्य फिल्मों में अभिनय कर रही हैं।


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Mayapuri

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