हर निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी तो नही बन सकता – बिन्दु

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044-10 film Shankar Shambhu bindu

 

मायापुरी अंक 44,1975

इस बार बिन्दु से मुलाकात हुई तो मैंने पूछा क्या आपने ‘अभिमान’ फिल्म के बाद सभ्य भूमिकाओं को करने का इरादा त्याग दिया है?

नही, बिंदु के मानो चेहरे पर ताज़गी छा गई वह बोलीं ऐसा नही है, अब तो मैं नायिका के रूप में भी दो तीन फिल्मों में आ रही हूं। कुछ दृश्य सभ्य मिलेंगे ही। वास्तव में, हमारी फिल्म लाइन ही ऐसी है जहां कोई रिस्क उठाने को तैयार ही नही होता। अब हर निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी तो बनने से तो रहा।

लेकिन आपने सावन कुमार टाक की फिल्म ‘हवस’ में तो काफी रिस्क उठाया था?

हमारी बात छोड़िये मैं तो फिल्म ट्रेंड के बिजनेस की बात कर रही थी।

और यहां बिंदु जी की इस बात पर मुझे लगता है कि पूरी फिल्म इंडस्ट्री में सावन कुमार टाक से ज्यादा समझदार व्यापारी नही हो सकता। यही बात सावन कुमार के निर्देशक के बारे में भी कही जा सकती है। ‘हवस’ के दौरान उन्हें एक ऐसी औरत (अभिनेत्री कम) चाहिए थी जिसके हर हिस्से से फिल्म का टाइटल ‘हवस’ बैलेंस हो सके। कई औरतों से बात नही बनी। कई एक्ट्रेस इस ‘हवस’ की मारी औरत की भूमिका करने से पीछे हट गईं। हालंकि पर्दे के पीछे वे सबसे ज्यादा ‘हवस’ की बीमार हैं। आखिर में यह चैलेंज बिंदु ने ही स्वीकार किया। सावन कुमार ने भी बिंदु के इस चैलेंज का पूरा फायदा उठाया। उन्होंने बिंदु के पूरे व्यक्तित्व को फिल्म के कई फ्रेमों में बांट दिया। अब दर्शक एक फ्रेम में बिंदु के पाव देखता तो दूसरे में पिंडलियां, तीसरे और चौथे फ्रेम से होता हुआ वह कमर और गर्दन तक पहुंच जाता और आखिरी फ्रेम में उसे सिर्फ बिंदु का चेहरा दिखाई देता। चेहरे पर एक्सप्रेशन उस ‘हवस की मारी’ औरत के मिले जिसके तलाश में सावन कुमार टाक ने कई औरतों में की, कई एक्ट्रेसों में की, लेकिन वास्तव में सब एक्ट्रेसें नही ‘एक्स्ट्रा’ थी जिनका काम एक्ट्रेस के पीछे खड़े या बैठे रहना होता है।

सच तो यह था कि ‘हवस’ की नायिका को अध्ययन करना एक मुश्किल काम था मुझें तो इस बात की खुशी थी कि मैं एक ‘ऑफ बीट’ रोल में काम कर रही हूं। जिसमें चेहरे से नही मुझें अपनी पर्सनलिटी के हर हिस्से से काम लेना था। जहां एक्सप्रेशन से डायलॉग का काम लेना था।

बिंदु का यह कहना कतई गलत नही कि ‘हवस’ में सिर्फ उनका चेहरा ही नही बल्कि हर शरीर कर हर भाग बोलता था। जैसे जिस्म का हर हिस्सा अभिनय बन गया था। या यूं कहें कि अभिनय बिंदु के हर भाग में प्रदर्शित होता था। यहां तक कि दर्शकों ने बिंदु की आंखो में भी अभिनय का आभास पाया। वे खुद भी कहती हैं।

‘हवस’ मेरी वह फिल्म है जिसमें पहली बार मैंने जी जान से काम किया था। मैं कोशिश कर रही थी कि इस फिल्म के बाद दर्शक और निर्माताओं तक को यह अहसास पहुंचा सकूंगी कि मैं सिर्फ बुरी औरत के लिए कैब्रे ही नही करती बल्कि अच्छी औरत के लिए तकलीफ भी उठा सकती हूं। मैंने कई निर्माताओं से कहा कि मुझें अच्छी भूमिकाएं दें। क्योंकि बुरी औरत के अंदर भी कहीं न कहीं एक अच्छी औरत भी ज़रूर होती है। जिस तरह हर अच्छी औरत के अंदर भी कहीं न कही एक बुरी औरत रहती है। लेकिन मेरी मुसीबत यह रही है कि यहां कोई भी किसी भी फिल्मों की बुरी औरत में अच्छी औरत को देखने के लिए तैयार ही नही होता। जिसे देखो, वही मुझसे कैबरे का ‘हंगामा’ करवाना चाहता है, वैंप के सिवा कोई मुझें दूसरा रोल देने की कतई तैयार नही है।

बिंदु की यह शिकायत बिल्कुल ठीक नही तो बिल्कुल गलत भी नहीं है। दरअसल यह हार बिंदु की नही फिल्मों की उस बुरी औरत की हार है जिसके जिस्म को आज भी हिंदी फिल्मों के निर्माता सीढ़ी के तौर पर काम में ला रहे हैं। हालांकि हमारे भोले (या चालाक) निर्माता कई बार इन सीढ़ियों से फिसलकर बुरी तरह गिर चुके हैं, फिर भी वे बार-बार यह सीढ़ियां लेकर नई फिल्मों में खड़ी कर देते हैं। कभी इन सीढ़ियों का नाम ज़ीनत अमान होता है, कभी परवीन बॉबी। नाम जरूर बदलते हैं पर सीढ़ियां वही काम करती हैं जो हमारे निर्माता चाहते हैं।

यू बिंदु के लिए मैं यह ‘सीढ़ी’ शब्द इस्तेमाल करना पसंद नही करूंगा। आप पूछेंगे क्यों? तो जवाब यह है कि बिंदु के पास वह सब कुछ है जिसे पर्दे पर दिखाकर निर्माता दर्शक को मनोरंजन के नाम पर संतुष्ट कर सकता है, लेकिन दूसरी एक्ट्रेसों के पास तो वह सब कुछ सिरे से ही गायब है।

मेरी कोशिश तो छोटी से छोटी फिल्म में भी यही रहती है कि उसे पूरा महत्व दिया जाए। यूं मैं खुद नही जानती कि बुरी औरत की सही ‘डैफीनेशन’ (परिभाषा) क्या है? मैं तो सिर्फ अभिनय की भाषा जानती हूं क्योंकि यह वह भाषा है जो शब्दों से नही भाव प्रदर्शन से एक दूसरे इंसान को नजदीक लाती है। कुछ निर्देशक मुझें खूबसूरत नये नये ढंग के कपड़े पहनाकर ‘आकर्षक’ बनाने की कोशिश करते हैं, मैं उनसे कहती हूं ‘आकर्षण’ कपड़ों में नहीं अभिनय में होता है, लेकिन वे नही मानते हैं। ऐसे में मुझें खुद को ही समझाना पड़ता है..वे तुम्हें कहां उस बुरी औरत को कपड़ो से सजा रहे हैं जो फिल्म में विलेन की शिकार हैं। या जिसे इन कपड़ो में कैबरे करना है। दर्शकों का मनोरंजन करना है और इस ‘कैबरे’ गर्ल या बुरी औरत से तुम्हारा पर्सनल कोई वास्ता नही है। लेकिन क्या आप इस बात को मानेंगे कि एक अभिनेत्री का उसकी भूमिकाओं से कही कोई संबंध नही होता।

नही, मैं यह बात नही मान सकता। हर अभिनेत्री का उसकी भूमिकाओं से गहरा संबंध होता है। चाहे ‘हवस’ की बुरी औरत की भूमिका हो या फिर ‘अभिमान’ की अच्छी औरत की।

बस इसीलिए शायद मुझें ‘अभिमान’ की भूमिका का दुख अभी तक है कि इस रोल के बाद भी मेरे पास वही निर्माता आए जो ‘अभिमान’ से पहले आते थे। मेरे ‘प्रशंसको’ में कुछ ऐसे भी हैं जा कहते हैं मुझें अब वैंप के रोल एकदम बंद कर देने चाहिए।

तो फिर आप बंद क्यों नही कर देतीं ?

क्योंकि वैंप की भूमिका हीरोइन से कहीं ज्यादा कठिन होती है। हीरोइन जो बात डायलॉग्स और आंसू बहाकर कहती है वही बात वैंप पर आंसू पीकर और ‘एक्सप्रेशन’ देकर कहनी पड़ती है। जिस्म खोल देने या कैब्ररे नाच लेने का मतलब वैंप हो जाना नही हो जाता। वैंप तो एक ऐसा कैरेक्टर है जिसके एक-एक ‘एक्सप्रेशन’ पर कई-कई कैरेक्टर्स जीते हैं। जिसे एक ‘एक्सप्रेशन’ (भाव) के साथ कई मतलब समझाने होते हैं। इसीलिए कभी-कभी तो लगता है कि फिल्मों की बुरी औरत मेरी एक्ट्रेस के अभिनय को अच्छा बना रही है। फिर भी मैं कहना चाहूंगी कि फिल्मों में सबसे अच्छी बात यही होगी जब हमारे निर्माता-निर्देशक बुरी औरत में एक अच्छी औरत भी ढूंढ निकालेंगे क्योंकि आज भी एक सवाल बुरी औरत के मन में उठ रहा है कि फिल्मों में आखिर वह कितनी सदियों तक बुरी रहेंगी? क्या बुरी औरत वास्तव में कभी अच्छी नही होती, कभी नही सुधरतीं?

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Mayapuri